Bilva Nimantran: नवरात्र में सप्तमी, अष्टमी और नवमी पूजा से पहले क्यों दिया जाता है बिल्व निमंत्रण? जानें इसका धार्मिक महत्व

Bilva Nimantran: शारदीय नवरात्रि में षष्ठी तिथि पर बिल्व निमंत्रण की परंपरा निभाई जाती है। इसमें बेल वृक्ष की पूजा कर मां दुर्गा का आह्वान होता है। जानें इसका धार्मिक महत्व और सप्तमी, अष्टमी, नवमी की पूजा से जुड़ी मान्यताएं।

Bilva Nimantran: शारदीय नवरात्रि में मां दुर्गा की आराधना का हर दिन विशेष महत्व रखता है। षष्ठी से लेकर महानवमी तक बंगाल समेत देश के कई हिस्सों में देवी उपासना की विशिष्ट परंपराएं निभाई जाती हैं। इन्हीं में एक महत्वपूर्ण अनुष्ठान है बिल्व निमंत्रण, जिसमें मां दुर्गा को बेल के वृक्ष पर आमंत्रित किया जाता है। यह केवल एक धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि देवी के आगमन, प्रकृति के प्रति श्रद्धा और शक्ति की उपासना से जुड़ी आस्था का प्रतीक भी है। मान्यता है कि महासप्तमी, महाअष्टमी और महानवमी की विशेष पूजा से पहले देवी को विधिवत निमंत्रण (Navratri Bilva Nimantran) देने की यह परंपरा भक्तों के लिए विशेष महत्व रखती है।

Bilva Nimantran

नवरात्रि में विल्व निमंत्रण का महत्व

क्या होता है बिल्व निमंत्रण?

बिल्व निमंत्रण को बिल्व आमंत्रण भी कहा जाता है। इसमें शारदीय नवरात्रि की षष्ठी तिथि पर बेल के वृक्ष की पूजा करके मां दुर्गा का आह्वान किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, बिल्व वृक्ष को पवित्र माना जाता है और इसकी पत्तियां भगवान शिव की पूजा में विशेष रूप से अर्पित की जाती हैं। दुर्गा पूजा की परंपराओं में भी इस वृक्ष का विशेष स्थान है। इस अनुष्ठान के दौरान भक्त देवी से अगले दिनों की पूजा स्वीकार करने और अपने ऊपर कृपा बनाए रखने की प्रार्थना करते हैं। इसे देवी के स्वागत की तैयारी के रूप में भी देखा जाता है।

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