Dowry Laws in India: लखनऊ में श्वेता सिंह की मौत ने एक बार फिर देश को उसी दर्दनाक सवाल के सामने खड़ा कर दिया है, जिससे भारत दशकों से जूझ रहा है। छह महीने पहले शादी हुई थी। अब मायके पक्ष ससुराल वालों पर दहेज प्रताड़ना और हत्या जैसे गंभीर आरोप लगा रहा है। परिवार का कहना है कि स्कॉर्पियो गाड़ी को लेकर श्वेता को लगातार ताने दिए जाते थे। पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है और जांच जारी है।
कुछ दिन पहले ट्विशा शर्मा, दीपिका नागर, पलक रजक, अनु मीणा के ऐसे मामले सामने आए थे। इन सभी बेटियों को मां-बाप ने बड़े अरमानों के साथ विदा किया था। लेकिन ससुराल में मायके सा मान-सम्मान मिलना तो दूर, ये सभी लगातार शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना का शिकार होती रहीं। वजह- ससुरालियों को जो मिला वो बहुत नहीं था, उन्हें और दहेज चाहिए था।
बेटियों को खोने पर एक सवाल - कानून कहां है। ऐसे मामलों को देखने-सुनने पर एक ही सवाल उठता है कि जब देश में दहेज विरोधी कानून मौजूद हैं, तब भी बेटियां आखिर क्यों नहीं बच पा रहीं? क्यों वे ससुराल के लालच का शिकार बनती रहती हैं।
कानून हैं, लेकिन डर तब भी कम क्यों नहीं होता
भारत में दहेज विरोधी कानून मौजूद हैं। दहेज प्रतिषेध अधिनियम (Dowry Prohibition Act) से लेकर घरेलू हिंसा कानून और IPC की धारा 498A व 304B तक, महिलाओं को सुरक्षा देने के लिए कई कानूनी रास्ते बनाए गए हैं। कागजों पर देखें तो कानून कमजोर नहीं दिखते।
लेकिन जमीनी सच्चाई अक्सर अलग होती है। मजबूत कानून होने के बावजूद लड़कियां अपनी जान गंवा रही हैं। दहेज की बलि चढ़ रही हैं। सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है?
ऐसे कई मामलों को करीब से देख चुके एडवोकेट प्रदीप मित्तल कहते हैं कि सबसे बड़ी समस्या कानून की मौजूदगी नहीं, बल्कि कानून तक पहुंचने में होने वाली देरी है।
उनके मुताबिक, अधिकांश मामलों में लड़की शुरुआत में पुलिस तक पहुंच ही नहीं पाती। परिवार की बदनामी का डर, शादी टूटने का भय और सामाजिक दबाव उसे शिकायत दर्ज कराने से रोकते रहते हैं। कई बार उसका अपना परिवार भी उसे यही समझाता रहता है कि ‘थोड़ा सह लो’, ‘समय के साथ सब ठीक हो जाएगा’, 'घर-घर की बात है'।
यानी लड़की और उसका परिवार पहले रिश्ते को बचाने की कोशिश करते रहते हैं। इसी वजह से मामलों में शिकायत दर्ज कराने में देरी होती है। जब मामला बहुत ज्यादा बिगड़ जाता है, तब जाकर पुलिस और कानून की तरफ कदम बढ़ते हैं।
जब तक मामला पुलिस तक पहुंचता है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। दहेज प्रताड़ना के अधिकांश मामलों में यही सबसे बड़ा पैटर्न दिखाई देता है। शुरुआत तानों से होती है। फिर मानसिक दबाव बढ़ता है। फिर आर्थिक अपेक्षाएं जुड़ती जाती हैं। फिर हाथ उठता है, और धीरे-धीरे लड़की भीतर से टूटने लगती है।
लेकिन इस पूरे दौरान मामला अक्सर घर की चारदीवारी के भीतर ही दबा रहता है। कई लड़कियां सोचती रहती हैं कि शायद चीजें बदल जाएंगी। कई परिवार यह मानने को तैयार नहीं होते कि उनकी बेटी सच में प्रताड़ना झेल रही है। उन्हें लगता है कि हर शादी में थोड़ी बहुत समस्या होती है।
यही सोच सबसे खतरनाक साबित होती है। क्योंकि जब तक स्थिति पुलिस तक पहुंचती है, तब तक मानसिक प्रताड़ना कई बार असहनीय स्तर पर पहुंच चुकी होती है।
बेटियों को क्यों नहीं मिलती दहेज मामलों में कानूनी मदद
जांच प्रक्रिया पर भी उठते रहे हैं सवाल
सोशियॉलजी की प्रफेसर डॉ. रीना शर्मा इस बारे में कहती हैं कि लड़की के लिए कानून की राह पकड़ना आसान नहीं होता। परिवार का दबाव, या मायके के लोगों का साथ न देना, एडजस्ट करने का प्रेशर, सोशल इमेज, बच्चे आदि की वजह से महिला आसानी से दहेज की शिकायत करने नहीं पहुंच पाती है।
वहीं एडवोकेट प्रदीप मित्तल का कहना है कि कई बार जांच प्रक्रिया भी पीड़िता के पक्ष में उतनी मजबूत नहीं दिखाई देती, जितनी होनी चाहिए। उनके अनुसार, कुछ मामलों में जांच अधिकारी संवेदनशीलता से काम नहीं करते। कहीं रिश्वतखोरी के आरोप लगते हैं, कहीं शुरुआती शिकायतों को गंभीरता से नहीं लिया जाता। कई बार परिवार सामाजिक दबाव में समझौता करने या केस वापस लेने के बारे में सोचने लगता है।
यही वजह है कि कानून होने के बावजूद उसका वास्तविक सपोर्ट कई पीड़ित महिलाओं तक पहुंच नहीं पाता।
दहेज प्रताड़ना के मामलों में सबसे बड़ी चुनौती सबूत जुटाने की भी होती है। मानसिक दबाव, ताने, अपमान और अप्रत्यक्ष आर्थिक मांगों को साबित करना आसान नहीं होता। अगर कोई परिवार सीधे पैसे न मांगे, लेकिन लगातार लड़की को गाड़ी, पैसे या ‘सपोर्ट’ के लिए मानसिक रूप से परेशान करे, तो उसके सबूत इकट्ठा करना बेहद मुश्किल हो जाता है।
पैसा दोगी तो अच्छी बहू बनोगी... ये दबाव बनाता है शोषण का शिकार
दहेज ने भी बदला रूप, 'अच्छी होने' के चक्र में फंसी बहू
वक्त के साथ दहेज का स्वरूप भी अब बदल चुका है। अब शायद ही कोई परिवार खुलेआम दहेज मांगता दिखाई देता हो। अब यह मांग बहुत ‘सभ्य’ तरीके से सामने आती है।
कहीं कहा जाता है—
‘इतना तो आजकल सब देते हैं।’
कहीं पति की EMI को ‘फैमिली सपोर्ट’ कहा जाता है।
कहीं बहू की सैलरी को घर की जिम्मेदारी बना दिया जाता है।
कहीं गाड़ी या महंगे गिफ्ट को लेकर लगातार ताने दिए जाते हैं।
धीरे-धीरे लड़की को यह महसूस कराया जाता है कि अगर वह इन अपेक्षाओं को पूरा नहीं कर रही, तो वह अच्छी बहू नहीं है। यानी आज का दहेज सिर्फ शादी वाले दिन का लेन-देन नहीं रहा। वह शादी के बाद हर महीने मानसिक और आर्थिक दबाव के रूप में सामने आ रहा है। ऐसे मामलों में लड़की कई साल 'एडजस्ट करने' और 'अच्छी बहू की जिम्मेदारी' निभाने में ही निकाल देती है। और अंत में घर, पैसा, सुरक्षा, सुकून - हर ओर से खाली ही रहती है।
कानूनी मदद का लंबा रास्ता और समाज का दबाव करता है मुश्किल हालात
पढ़ी-लिखी बेटियां भी क्यों नहीं निकल पातीं इस जाल से
अक्सर लोग सवाल पूछते हैं कि अगर लड़कियां पढ़ी-लिखी और आत्मनिर्भर हैं, तो वे ऐसे रिश्तों से बाहर क्यों नहीं आ जातीं? लेकिन यह सवाल जितना आसान दिखता है, जवाब उतना आसान नहीं है।
डॉ. रीना शर्मा का कहना है कि शादी के बाद लड़की सिर्फ एक रिश्ते में नहीं होती, वह पूरे सामाजिक ढांचे के बीच फंसी होती है। उसे शादी टूटने का डर दिखाया जाता है। परिवार की इज्जत का दबाव होता है। कई बार माता-पिता की चिंता उसे चुप रहने पर मजबूर करती है।
यही वजह है कि आर्थिक रूप से मजबूत महिलाएं भी मानसिक रूप से अकेली पड़ जाती हैं। वही, इसकी एक वजह हमारे देश की पुलिस की छवि का विमेन फ्रेंडली ना होना भी है। इस वजह से भी प्रताड़ित महिलाएं चाह कर भी कानूनी मदद नहीं ले पाती हैं।
समाज अब भी दहेज को ‘सामान्य’ मानता है
यह सबसे बड़ी विडंबना है कि एक तरफ लोग दहेज हत्या की खबरों पर दुख जताते हैं। दूसरी तरफ शादी तय करते समय लड़के की नौकरी, पैकेज, गाड़ी और स्टेटस पर चर्चा भी करते हैं।
कई परिवार आज भी बेटे की पढ़ाई और नौकरी को ‘इन्वेस्टमेंट’ की तरह देखते हैं। उन्हें लगता है कि शादी के बाद बहू के जरिए उस खर्च की भरपाई होना गलत नहीं है। यानी समस्या सिर्फ अपराधियों की नहीं है। समस्या उस सोच की भी है, जिसने दहेज को सामाजिक स्वीकृति दे रखी है।
दहेज मामलों में कानूनी मदद पाने के लिए क्या ध्यान में रखें
आखिर लड़की को कैसे मिलेगी कानूनी मदद
एडवोकेट प्रदीप मित्तल की सलाह है कि दहेज प्रताड़ना के मामलों में समय रहते शिकायत करना और सबूत संभालकर रखना बेहद जरूरी है। लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी यह है कि लड़की को शुरू से यह भरोसा मिले कि अगर वह गलत के खिलाफ खड़ी होगी, तो उसका परिवार उसके साथ रहेगा।
सिर्फ कानून बना देने से दहेज खत्म नहीं होगा। जब तक समाज बेटियों को ‘समझौता’ और बेटों को ‘हक’ सिखाता रहेगा, तब तक कानून भी अधूरे साबित होंगे।
क्योंकि हर दहेज मौत की शुरुआत मौत से नहीं होती… उसकी शुरुआत छोटे-छोटे तानों, दबावों और चुप्पियों से होती है। और जब तक समाज इन संकेतों को सामान्य वैवाहिक जीवन समझता रहेगा, तब तक बेटियां कानून होने के बावजूद सुरक्षित नहीं हो पाएंगी।
