Dowry Deaths in India: इन दिनों खबरों में देश की तीन बेटियां छाई हैं- ट्विशा शर्मा, दीपिका नागर, पलक रजक। इन पर आता हर नया अपडेट कलेजा चीर देता है। इनकी हर नई तस्वीर चीख-चीख कर कहती है कि ये बेटियां जीना चाहती थीं, खुश होकर, परिवार के साथ। लेकिन जहां उम्मीद थी, वहीं से चुभन भी मिली। इन बेटियों के शहर और चेहरे अलग हैं लेकिन कहानी एक जैसी दुखद है। हजारों अरमान के साथ जो बेटियां घर से डोली में विदा हुईं, अब अर्थी पर वापस हैं। दहेज के लोभी इन मासूस जिंदगियों को निगल गए।
कचोटने वाला सवाल ये है कि इनकी जान इतनी आसानी से कैसे गई। क्या मां बाप को नहीं बताया। क्या किसी से दर्द साझा नहीं किया। क्या किसी को नहीं बताया कि ससुराल में वो क्या झेल रही हैं। बताया- कई सिग्नल दिए। मां को कहा लेने आओ, मां का मेसेज किया मुझे ले जाओ। लेकिन समझाने-बुझाने के बीच वे खुद ही बुझ गईं।
सबसे दर्दनाक बात यह है कि ज्यादातर बेटियां जाने से पहले संकेत देती हैं। वे चुपचाप नहीं मरतीं। वे रोती हैं, डर बताती हैं, फोन करती हैं, घर आने की बात करती हैं, सहेलियों से घुटन साझा करती हैं। लेकिन उनकी चीखें अक्सर 'समझौता कर लो' जैसी सलाहों में दब जाती हैं। मां-बाप की आंखों पर समाज के डर, रिश्तों की इज्जत और सब ठीक हो जाएगा जैसी सोच का पड़ा पर्दा कुछ समय बाद बेटी के ठंडे पड़े शरीर के साथ खुलता है।
बेटियां अचानक नहीं टूटतीं, उन्हें धीरे-धीरे तोड़ा जाता है
ऐसा क्या है कि बेटी की तकलीफ जानने के बावजूद मां-बाप अपनी लाडो को बचा नहीं पाते हैं। कोई भी लड़की एक दिन में आत्महत्या जैसा कदम नहीं उठाती। उसके भीतर डर, अपमान, ताने, अकेलापन और मानसिक दबाव की परतें धीरे-धीरे जमा होती हैं। शुरुआत अक्सर छोटी बातों से होती है - गाड़ी नहीं दी, इतना ही सामान भेजा, तुम्हारे घर वालों ने हमारी इज्जत नहीं रखी।
धीरे-धीरे टूटती हैं बेटियां
फिर ये बातें तानों में बदलती हैं। ताने मानसिक प्रताड़ना में बदलते हैं और धीरे-धीरे लड़की खुद को दोषी मानने लगती है। उसे ऐसा महसूस कराया जाता है जैसे हर परेशानी की वजह वही है। कई बार ससुराल वाले इतने सामान्य तरीके से मानसिक टॉर्चर करते हैं कि लड़की खुद समझ नहीं पाती कि वह प्रताड़ना झेल रही है।
सबसे खतरनाक बात यही है कि समाज ने बेटियों को अपने लिए लड़ना कम और रिश्ते बचाना ज्यादा सिखाया है। और यहीं से उसकी घुटन शुरू होती है।
थोड़ा सह लो, सब ठीक हो जाएगा - यही शब्द कई बेटियों की जान ले लेते हैं
जब कोई बिटिया फोन पर रोते हुए कहती है, मम्मी मुझे घर ले जाओ तो कई घरों में जवाब मिलता है - हर शादी में ऐसा होता है, लोग क्या कहेंगे, थोड़ा एडजस्ट करो, बेटी का घर तो ससुराल ही होता है। और इसी समझाने में सबसे बड़ी गलती हो जाती है।
थोड़ा झुक जाओ, हर घर में ऐसा होता है, कुछ दिनों में सब ठीक हो जाएगा, ससुराल में तो ऐसा होता ही है। देखने में ये भले ही सामान्य सलाह लगती है, लेकिन मनोवैज्ञानिक तौर पर ये बातें एक लड़की को अकेला कर देती हैं। उसे अंदर से तोड़ देती हैं।
हर बार सहना सही नहीं होता
गाजियाबाद के शंभू दयाल डिग्री कॉलेज की सोशियॉलजी की प्रफेसर डॉ. रीमा शर्मा कहती हैं कि मां-बाप बुरे नहीं होते, लेकिन वे समाज से डर जाते हैं। यहां वे कमजोर पड़ जाते हैं। उन्हें लगता है कि अगर बेटी वापस आ गई तो रिश्तेदार बातें बनाएंगे। उन्हीं की बेटी पर सवाल उठाएंगे। छोटी बहन की शादी पर असर पड़ेगा। समाज ताने देगा। लेकिन सच ये है कि समाज कुछ दिन बात करेगा, जबकि बेटी पूरी जिंदगी या तो टूटकर जिएगी या फिर हमेशा के लिए चली जाएगी।
लेकिन वे भूल जाते हैं कि ताने समाज से बड़े नहीं होते। इज्जत बेटी की सांसों से बड़ी नहीं होती।
हालांकि कई बार मां-बाप आर्थिक तौर पर भी इतने मजबूत नहीं होते कि बेटी को वापस अपने घर ले जा सकें। जब मायके से लड़की को सपोर्ट नहीं मिलता तो उसे लगता है कि अब उसके पास लौटने की जगह नहीं बची। वह अपने दर्द को छोटा मानने लगती है। कई बार मानसिक हिंसा इतनी धीरे-धीरे बढ़ती है कि लड़की खुद भी समझ नहीं पाती कि वह टॉक्सिक रिश्ते में फंस चुकी है।
नोएडा गवर्नमेंट हॉस्पिटल में मनोवैज्ञानिक डॉ. नीति सिंह का कहना है कि लगातार ताने, तुलना, अपमान और आर्थिक मांगें बेटियों का आत्मविश्वास खत्म कर देती हैं। लड़की धीरे-धीरे खुद को दोष देने लगती है। उसे लगता है शायद वही अच्छी पत्नी नहीं बन पा रही या मां-बाप पर बोझ है। यही मानसिक थकान उसे भीतर से तोड़ देती है और नतीजा अक्सर वो होता है - जो बाद में एक बड़ी खबर बन जाता है।
पढ़ी-लिखी और कमाने वाली लड़कियां भी क्यों फंस जाती हैं
सबसे हैरानी की बात यही है कि आज आत्मनिर्भर, नौकरी करने वाली और मॉडर्न सोच रखने वाली लड़कियां भी दहेज के इस जाल में फंस जाती हैं। वजह सिर्फ आर्थिक निर्भरता नहीं है। असली वजह मानसिक दबाव, इमोशनल मैनिपुलेशन और अकेलापन है।
साउथ एशियन यूनिवर्सिटी में फैकल्टी ऑफ आर्ट्स एंड डिजाइन के प्रफेसर और सामाजिक मामलों के जानकार डॉ. अंबरीष सक्सेना का कहना है कि ऐसे मामलों में कई लड़कियां भी सोचती रहती हैं कि शायद बाद में सब ठीक हो जाएगा। कुछ को डर होता है कि अगर शादी टूट गई तो लोग उन्हें ही गलत ठहराएंगे। कुछ को बचपन से इतना 'समझदार' बनने की ट्रेनिंग दी जाती है कि वे अपने दर्द को भी छोटा समझने लगती हैं।
यही वजह है कि बाहर से मजबूत दिखने वाली कई लड़कियां अंदर से पूरी तरह टूट चुकी होती हैं।
फेमिनिज्म सिर्फ आजादी नहीं, बेटी का दर्द समझना भी है
डॉ. रीमा शर्मा बेटी के दर्द के समझने को फेमिनिज्म से भी जोड़ती हैं। उनका कहना है कि आजकल अक्सर फेमिनिज्म को सिर्फ कपड़ों, पार्टी या नौकरी की आजादी से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन असली बराबरी तब होगी जब एक बेटी बिना डर अपने घरवालों से कह सके कि मैं खुश नहीं हूं और उसे तुरंत जज करने के बजाय समझा जाए।
फेमिनिज्म का मतलब सिर्फ यह नहीं कि बेटी रात में बाहर जा सकती है, नौकरी कर सकती है, जींस पहन सकती है। असली मतलब यह है कि अगर उसकी शादी में अत्याचार हो रहा है तो परिवार बिना समाज से डरे उसके साथ खड़ा हो।
बेटी को सिर्फ मजबूत बनने की सलाह मत दीजिए, उसे यह भरोसा भी दीजिए कि अगर वह टूटेगी तो उसका घर उसके साथ खड़ा मिलेगा।
परिवार का साथ बेटियों को मजबूत रखेगा
कई बार दोस्त और भाई-बहन पहले समझ जाते हैं दर्द
कई मामलों में लड़की अपने मां-बाप से पहले सहेली, भाई या दोस्त को अपनी तकलीफ बताती है। यही लोग उसके सबसे बड़े अलार्म होते हैं। लेकिन अक्सर उनकी बातों को भी 'छोटी-मोटी लड़ाई' कहकर नजरअंदाज कर दिया जाता है।
मनोवैज्ञानिक डॉ. नीति सिंह का कहना है कि अगर कोई बेटी बार-बार कह रही है कि वह डर रही है, घुट रही है या जीने का मन नहीं करता, तो इसे इमोशनल ड्रामा मत समझिए। यह मदद की पुकार हो सकती है।
जरूरत इस बात की है कि दोस्त, भाई-बहन और करीबी लोग सिर्फ सांत्वना न दें, बल्कि एक्शन लें। पेरेंट्स को समझाएं। जरूरत पड़े तो बेटी को तुरंत उस माहौल से बाहर निकालें। क्योंकि कई बार पहला कदम ही जिंदगी बचा सकता है।
दहेज सिर्फ पैसे की मांग नहीं, इंसानियत की हार है
दहेज आज सिर्फ नकद या गाड़ी तक सीमित नहीं रह गया। अब यह स्टेटस, दिखावे और सोशल प्रेशर का हिस्सा बन चुका है। शादी अब कई जगह रिश्ते से ज्यादा 'इवेंट' बन गई है। कौन सा बैंक्वेट था, कितने गिफ्ट मिले, कितनी जूलरी आई- इन बातों ने रिश्तों की गर्माहट को निगल लिया है।
विडंबना देखिए… एक तरफ लोग बेटी को 'लक्ष्मी' कहते हैं और दूसरी तरफ उसी बेटी की कीमत गाड़ी, फ्लैट और कैश में तय करने लगते हैं।
NCRB के आंकड़े बताते हैं कि 2024 में देशभर में 5737 महिलाओं की मौत दहेज से जुड़े मामलों में दर्ज हुई। उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा 2038 बेटियों ने जान गंवाई। ये सिर्फ नंबर नहीं हैं। ये हजारों अधूरे सपने हैं। हजारों मां-बाप की जिंदगीभर की टीस हैं।
2024 में दहेज हत्याओं का NCRB ने जारी किया है डेटा
आखिर बदलाव आएगा कैसे
महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार के प्रफेसर डॉ. सुनीत मुखर्जी का कहना है कि दहेज को रोकने के लिए एक बड़े सामाजिक बदलाव की जरूरत है। साथ ही जरूरत सभी पक्षों को जागरूक करने की भी है। कानून इसमें मदद कर सकता है लेकिन इसका समाधान नहीं निकाल सकता। जब तक लोग दहेज लेने वालों को सम्मान देना बंद नहीं करेंगे, तब तक बदलाव अधूरा रहेगा। जिस दिन शादी में दहेज लेने वाले लड़के को लोग 'सेटल्ड' नहीं बल्कि 'लोभी' कहने लगेंगे, उसी दिन असली बदलाव शुरू होगा।
वहीं डॉ. अंबरीष सक्सेना का तर्क है कि मां-बाप को अपनी बेटियों को सिर्फ शादी के लिए नहीं, जिंदगी के लिए तैयार करना होगा। उन्हें यह सिखाना होगा कि शादी जिंदगी का हिस्सा है, पूरी जिंदगी नहीं। अगर कहीं सम्मान नहीं है, सुरक्षा नहीं है, मानसिक शांति नहीं है, तो वहां से लौट आना हार नहीं होती।
क्योंकि एक टूटी हुई शादी से ज्यादा दर्दनाक एक बुझी हुई जिंदगी होती है।
अनमोल हैं बेटियां, इनको दहेज की बलि न चढ़ने दें
आखिर कब समझेगा समाज
हर बार किसी ट्विशा, दीपिका या पलक की मौत के बाद लोग कुछ दिन दुख जताते हैं, सोशल मीडिया पर गुस्सा दिखाते हैं और फिर अगली खबर का इंतजार करने लगते हैं। लेकिन सवाल अब भी वहीं खड़ा है - आखिर कितनी बेटियों की चीखें खामोश होंगी, तब जाकर समाज सच में जागेगा। कब मां-बाप समय रहते एक सख्त कदम लेंगे।
ध्यान रखें कि बेटियां बोझ नहीं होतीं। वे घर की हंसी होती हैं। मां की सहेली, पिता की धड़कन, भाई की सबसे प्यारी दोस्त होती हैं। उन्हें सिर्फ विदा मत कीजिए… इतना भरोसा भी दीजिए कि अगर जिंदगी कहीं उन्हें तोड़ने लगे, तो उनका घर हमेशा उनके साथ खड़ा मिलेगा।
