क्या आपने कभी गौर किया है कि आप अपने बच्चे के साथ वही काम क्यों करते हैं, जो आपके माता-पिता आपके बचपन में करते थे? कोई पिता हर साल बच्चों को दशहरे का मेला दिखाने ले जाता है। कोई मां अपने बच्चे के जन्मदिन पर वही नाश्ता बनाती है, जो उसकी मां उसके लिए बनाया करती थी। कोई परिवार हर छुट्टी में उसी जगह जाता है या बच्चों को वही कहानी सुनाता है, जो उसने बचपन में सुनी थी।
जो बचपन में आपके माता-पिता ने किया, वही आप अपने बच्चों के साथ क्यों दोहराते हैं? (Photo: iStock)
मनोविज्ञान के मुताबिक, ऐसी पारिवारिक परंपराएं बच्चे के लिए यादों से कहीं ज्यादा मायने रखती हैं। ये परिवार के मूल्यों, पहचान और अपनापन महसूस करने की भावना को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाने का काम कर सकती हैं। रिसर्च यह भी बताती है कि बचपन में मिले कुछ परवरिश के अनुभव आगे चलकर हमारे अपने पैरेंटिंग स्टाइल को प्रभावित करते हैं।
बच्चे देखकर भी बहुत कुछ सीखते हैं
मनोवैज्ञानिक अल्बर्ट बंडूरा की सोशल लर्निंग थ्योरी के मुताबिक, बच्चे सिर्फ समझाने से नहीं, बल्कि दूसरों को देखकर भी व्यवहार सीखते हैं। माता-पिता उनके सबसे महत्वपूर्ण रोल मॉडल होते हैं। इसलिए अगर कोई बच्चा बचपन से देखता है कि हर रविवार घर में दादी की रेसिपी बनती है और पूरा परिवार साथ बैठकर खाना खाता है, तो यह अनुभव उसके मन में गहराई से बैठ सकता है।
बड़ा होने पर वही बच्चा अपने बच्चों के साथ भी ऐसा कर सकता है। उसे किसी ने यह नहीं सिखाया कि परंपरा जारी रखनी है। उसने इसे बार-बार देखा और वह उसके लिए परिवार का सामान्य हिस्सा बन गई।
हर चीज की नकल नहीं होती
इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि इंसान अपने माता-पिता की हर आदत अपने बच्चों में दोहराता है। रिसर्च के मुताबिक पीढ़ियों के बीच ऐसा जुड़ाव सीमित होता है। व्यक्ति अपने अनुभवों के आधार पर कुछ परंपराओं को आगे बढ़ा सकता है, कुछ को बदल सकता है और कुछ को पूरी तरह छोड़ भी सकता है।
यानी एक मां अपने बचपन की वह परंपरा जारी रख सकती है, जिसने उसे प्यार और सुरक्षा का एहसास दिया था, लेकिन वह अपने माता-पिता की ऐसी आदतों को दोहराना जरूरी नहीं समझेगी, जो उसे पसंद नहीं थीं।
रोज की आदत और परिवार की रस्म में फर्क
मनोवैज्ञानिक परिवार की ‘रूटीन’ और ‘रिचुअल’ में भी फर्क करते हैं। रोज रात 8 बजे खाना खाना एक रूटीन है, लेकिन हर रविवार दादी की खास रेसिपी बनाना और उस दौरान परिवार की पुरानी बातें करना एक रिचुअल बन सकता है। इसमें सिर्फ काम नहीं होता, बल्कि भावनात्मक जुड़ाव भी होता है।
ऐसी छोटी-छोटी परंपराएं बच्चे को यह एहसास दे सकती हैं कि वह एक परिवार और उसकी कहानी का हिस्सा है। रविवार का खास नाश्ता, स्कूल के पहले दिन फोटो खींचना या हर साल एक ही फिल्म साथ देखना आगे चलकर बचपन की खास याद बन सकता है।
