Balaposh Quilt: सर्दियों में ठंड से निपटने के लिए लगभग हर घर में रजाई या कंबल जरूर होते हैं। जरा सोचिए कि क्या हो जब रजाई ओढ़ने पर गरमाहट तो मिले ही, भीनी-भीनी फूलों की खुशबू भी महसूस हो। रजाई भी इतनी हल्की कि उसका वजन ही ना पता चले। यह रजाई सदियों पुराने भारतीय हुनर की अद्भुत पहचान है और इसका नाम है बालापोश।
कहानी बालापोश रजाई की (AI Generated and newsroom verified image)
बालापोश रजाई की कहानी हमें उस दौर में ले जाती है, जब किसी चीज की खासियत उसकी कीमत तय नहीं होती थी। ये तय होती थी उसे बनाने वाले हाथों के हुनर से।
नवाबों की ख्वाहिश से जन्मी एक खास रजाई
बालापोश का इतिहास बंगाल के मुर्शिदाबाद से जुड़ा है। 18वीं सदी में मुर्शिदाबाद बंगाल की सत्ता और संस्कृति का एक प्रमुख केंद्र था। यहां नवाबों और अमीर परिवारों के बीच ऐसी चीजों की मांग थी, जो आराम के साथ शाही पसंद का एहसास भी कराएं।
Get Bengal की एक रिपोर्ट के मुताबिक, बालापोश के जन्म को नवाब शुजाउद्दीन मुहम्मद खान के समय से जोड़ा जाता है। कहा जाता है कि उन्हें उस दौर में इस्तेमाल होने वाले ऊनी कंबल पसंद नहीं थे। वो ओढ़ने के लिए कुछ ऐसा चाहते थे, जो मां की गोद जैसा मुलायम हो, शरीर को गर्म रखे, हल्का हो और उसमें फूलों जैसी खुशबू भी हो।
बताया जाता है कि अतिर खान नाम के एक स्थानीय कारीगर ने इस चुनौती को स्वीकार किया। कई प्रयोगों के बाद ऐसी रजाई तैयार की गई, जो सामान्य रजाइयों से बिल्कुल अलग थी।
रेशम, रुई और इत्र का अनोखा मेल
बालापोश को खास बनाने वाली पहली चीज है इसकी बनावट। इसे तैयार करने में महीन रेशम, साफ की गई रुई और बेहतरीन फूलों के इत्र का इस्तेमाल किया जाता है। रुई को खास तरीके से साफ किया जाता है, ताकि वह हल्की और मुलायम बने। इसके बाद रेशम और रुई की तहों को इस तरह जमाया जाता है कि रजाई का आकार बना रहे और इस्तेमाल के साथ भीतर की रुई एक जगह इकट्ठी होकर गांठें न बना ले।
सामान्य रजाइयों में रुई को अपनी जगह बनाए रखने के लिए जगह-जगह सिलाई की जाती है, लेकिन पारंपरिक बालापोश में तहों को संभालने का तरीका अलग है। यूनेस्को के भारतीय शिल्प संबंधी दस्तावेज में भी इसकी खास तकनीक का जिक्र है। इसमें रुई की परतों को रेशम के बीच इस तरह जमाया जाता है कि रजाई की मुलायम बनावट लंबे समय तक बनी रहे।
यही वह हिस्सा है, जिसने बालापोश को साधारण रजाई से अलग पहचान दी। इसे बनाने का पूरा तरीका लंबे समय तक परिवार के भीतर ही सिखाया जाता रहा।
रजाई में खुशबू कैसे कैद रहती है?
बालापोश की दूसरी खासियत है इसकी खुशबू। इसमें इस्तेमाल होने वाला इत्र सिर्फ ऊपर से छिड़ककर काम पूरा नहीं कर देता। खुशबू को रजाई की परतों के भीतर सहेजने का तरीका भी इस शिल्प का हिस्सा है।
इसे तैयार करते समय इत्र का इस्तेमाल किया जाता है। फूलों से मिलने वाली खुशबू के लिए फिदरूस अत्तर जैसे इत्र की मांग रही है। कुछ खास मौकों पर गुलाब की खुशबू वाला इत्र भी इस्तेमाल किया जाता है। असली चुनौती यह होती है कि खुशबू कपड़े और रुई की परतों के भीतर टिक सके। इस के लिए इत्र की सही परख, तहों का सही संतुलन और खुशबू को सहेजने का अनुभव भी जरूरी है।
करीब 300 साल तक परिवार के भीतर रहा राज
बालापोश की कहानी में सबसे दिलचस्प बात इसका पारिवारिक रहस्य है। इसे बनाने की तकनीक पीढ़ियों तक एक ही परिवार में आगे बढ़ती रही। अतिर खान के वंशजों ने इस हुनर को संभालकर रखा। यूनेस्को के दस्तावेज के मुताबिक, इस शिल्प की जानकारी लंबे समय तक उसी परिवार तक सीमित रही।
मुर्शिदाबाद के सखावत हुसैन खान को इस परंपरा का प्रमुख कारीगर माना जाता था। उनके बाद उनके बच्चों ने भी इस हुनर को आगे बढ़ाया। परिवार की अगली पीढ़ी के लिए यह केवल कमाई का जरिया नहीं, बल्कि विरासत को बचाए रखने की जिम्मेदारी भी है।
सोचने वाली बात है कि आज जब किसी काम को सीखने के लिए वीडियो, ऑनलाइन कोर्स और डिजिटल जानकारी उपलब्ध है, तब भी कुछ पारंपरिक शिल्प ऐसे हैं जिनकी असली बारीकी केवल हाथ से काम करते हुए, किसी अनुभवी कारीगर के साथ रहकर ही सीखी जा सकती है।
शाही पहचान से बाजार की चुनौती तक
कभी बालापोश को शाही जीवनशैली और संपन्नता से जोड़कर देखा जाता था। समय के साथ बाजार बदल गया। मशीनों से बनने वाले सस्ते बिस्तर और रजाइयां आसानी से उपलब्ध होने लगीं। ऐसे में हाथ से बनने वाली इस खास रजाई की मांग और उसे तैयार करने वाले कारीगरों के सामने नई चुनौतियां खड़ी हुईं।
इसका निर्माण भी आसान नहीं है। रुई को तैयार करने से लेकर अलग-अलग तहों को जमाने और रजाई को अंतिम रूप देने तक कई चरण होते हैं। इसमें समय, धैर्य और खास कौशल की जरूरत होती है। यही कारण है कि पारंपरिक बालापोश का उत्पादन सीमित रहता है।
हुनर को सहेज कर रखने की है जरूरत
बालापोश के हर कारीगर को पता होता है कि रुई को कितना साफ करना है, तहों को किस तरह जमाना है और खुशबू को कैसे सहेजना है। इन छोटे-छोटे फैसलों का मेल ही एक साधारण से काम में आने वाली चीज को बेहद खास उत्पाद में बदल देता है।
आज बालापोश जैसी हर उस पारंपरिक हस्तकला को सहेज कर रखने की सख्त जरूरत है। इन्हें सेजने का मतलब है उस हुनर को बचाना, जो पीढ़ियों से हाथों के जरिए आगे बढ़ा है। अगर यह ज्ञान खत्म हो गया, तो उसकी जगह कोई मशीन एक जैसी दिखने वाली रजाई तो बना सकती है, लेकिन उसके साथ जुड़ा इतिहास और अनुभव दोबारा तैयार करना आसान नहीं होगा।
