पजावा रामलीला: जब गोलियों की बौछार के बीच निकला 'रामदल', 200 साल बाद भी नहीं भूला प्रयागराज

अंग्रेजों की बंदूकें, प्रशासन के पहरे और हर मोड़ पर मौत का साया..इन सबके बीच जिन दीवानों ने अपनी जान की बाजी लगाकर इस मशाल को बुझने नहीं दिया, वे असल जिंदगी के बाहुबली वही थे।

सुना है कभी आपने ऐसी रामलीला के बारे में, जिसमें रामदल के स्वागत में फूल नहीं, बारूद बरस रहा हो? जहां शंख और मजीरे की आवाज दब गई हो और हवा में सिर्फ गोलियों की सनसनाहट और तलवारों की खनक तैर रही हो?

Pajawa Ramlila Comittee

प्रयागराज का पजवा रामलीला (AI Generated and newsroom verified image)

बात उन दिनों की है जब देश अंग्रेजों की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था और संगम नगरी प्रयागराज की सर्द हवाओं में भी बगावत की गर्मी सुलग रही थी। यह कहानी है आज से करीब दो सौ साल पुरानी, साल 1801-1802 के आसपास की। उन दिनों शहर में एक ऐसी अनूठी रामलीला की नींव पड़ी, जिसके किस्से सुनकर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं। लोग इसे 'पजावा रामलीला' के नाम से जानते हैं। पजावा रामलीला मौत की आंखों में आंखें डालकर अपनी संस्कृति को बचाने की एक जिद थी।

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