सुना है कभी आपने ऐसी रामलीला के बारे में, जिसमें रामदल के स्वागत में फूल नहीं, बारूद बरस रहा हो? जहां शंख और मजीरे की आवाज दब गई हो और हवा में सिर्फ गोलियों की सनसनाहट और तलवारों की खनक तैर रही हो?
प्रयागराज का पजवा रामलीला (AI Generated and newsroom verified image)
बात उन दिनों की है जब देश अंग्रेजों की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था और संगम नगरी प्रयागराज की सर्द हवाओं में भी बगावत की गर्मी सुलग रही थी। यह कहानी है आज से करीब दो सौ साल पुरानी, साल 1801-1802 के आसपास की। उन दिनों शहर में एक ऐसी अनूठी रामलीला की नींव पड़ी, जिसके किस्से सुनकर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं। लोग इसे 'पजावा रामलीला' के नाम से जानते हैं। पजावा रामलीला मौत की आंखों में आंखें डालकर अपनी संस्कृति को बचाने की एक जिद थी।
वह फौलादी संत और पहलवान बाबा हाथीराम
वह ऐसा दौर था जब चारों तरफ अंग्रेजों का खौफ था। ऐसे में शाहगंज के एक प्रसिद्ध राम मंदिर के महंत थे - बाबा हाथीराम। बाबा कोई साधारण संत नहीं थे। वे गजब के ताकतवर पहलवान थे, जिनका सीना फौलाद का और इरादा चट्टान जैसा था।
जब उन्होंने रामलीला निकालने का बीड़ा उठाया, तो शहर के हालात बता रहे थे कि यह आसान नहीं होगा। अंग्रजी पहरे के साथ ही शहर में साम्प्रदायिक तनाव फैला हुआ था, लेकिन बाबा ने ठान लिया तो ठान लिया। वे खुद भगवान राम, लक्ष्मण और हनुमान का रूप धरने वाले छोटे-छोटे मासूम बच्चों को अपने मजबूत कंधों पर उठाते थे। उनके पीछे-पीछे अखाड़े के सैकड़ों पहलवान, लाठी, गदेरे और हथियारों से लैस होकर चलते थे। पुराने लोग बताते हैं कि वो सब देख ऐसा लगता था जैसे धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए रणबांकुरे युद्ध के मैदान में उतर रहे हों।
जब छतों से बरसने लगी थीं गोलियां
यह रामदल जैसे-जैसे शहर के पुराने और संकरे रास्तों से गुजरता, वैसे-वैसे अंग्रेज अफसरों की नींद उड़ जाती थी। गोरे हाकिमों को डर था कि इतनी बड़ी भीड़ कहीं उनके खिलाफ क्रांति का बिगुल न फूंक दे। इसलिए उन्होंने हर कदम पर कांटे बिछाए।
असली आफत तो तब टूट पड़ी जब रास्ते में घात लगाए बैठे दंगाइयों ने इस यात्रा को रोकने की ठान ली। इतिहास के पन्नों को पलटिए तो सीने में सिहरन दौड़ जाएगी। कई बार ऐसा हुआ कि जब रामदल आगे बढ़ रहा था, तो अचानक छतों से अंधाधुंध गोलियां बरसने लगीं।
आसमान गोलियों की गड़गड़ाहट से कांप उठा। लोग लहूलुहान होकर सड़क पर गिरने लगे। चीख-पुकार मच गई, चारों तरफ धुआं और मौत का साया फैल गया। कोई भी आम इंसान होता तो जान बचाकर भाग खड़ा होता। लेकिन मजाल है कि उस रामदल का एक कदम भी पीछे हटा हो! खून से सने रास्तों से गुजरते हुए वह रामदल अपनी मंजिल तक पहुंच कर ही माना।
लाहौर से आए वे जादुई और अनमोल मुकुट
इस रामलीला का एक और किस्सा बड़ा दिलचस्प है। आज भी इस लीला में भगवान को जो मुकुट पहनाए जाते हैं, वे साधारण नहीं हैं। वे सौ साल से भी ज्यादा पुराने हैं। किस्सा यह है कि ये सोने-चांदी के चमचमाते मुकुट उस दौर में लाहौर के सबसे बेहतरीन और माहिर कारीगरों ने अपने हाथों से गढ़े थे। इन्हें लाने वाले थे लाला मनोहर दास 'बच्चा जी' का परिवार।
वक्त बदला, देश बंटा और लाहौर हमसे कोसों दूर एक दूसरी दुनिया बन गया। फिर भी पजावा रामलीला ने उन बिछड़े हुए कारीगरों के हुनर और अपनी इस अमूल्य धरोहर को आज भी अपनी पलकों पर बिठाकर रखा है। आज भी जब रामलीला शुरू होती है, तो सबसे पहले उन 'लाहौरी मुकुटों' को बहुत अदब से बाहर निकाला जाता है, चमकाया जाता है और पूजा जाता है।
खून से सींची गई विरासत
आज हम और आप मॉल में घूमते हैं, मल्टीप्लेक्स में फिल्में देखते हैं और किसी भी त्योहार पर एसी पंडालों में कुर्सियों पर बैठकर मजे से रामलीला देखते हैं। लेकिन सच मानिए, हमें कभी यह ख्याल भी नहीं आता कि जिस संस्कृति पर आज हम गर्व करते हैं, उसे जिंदा रखने के लिए हमारे पुरखों ने अपनी छाती पर गोलियां खाई थीं।
अंग्रेजों की बंदूकें, प्रशासन के पहरे और हर मोड़ पर मौत का साया..इन सबके बीच जिन दीवानों ने अपनी जान की बाजी लगाकर इस मशाल को बुझने नहीं दिया, वे असल जिंदगी के बाहुबली वही थे।
प्रयागराज पजावा रामलीला उस अदम्य जज्बे की जीवंत कहानी है जो हमें याद दिलाती है कि जब अपनों की आस्था और पहचान पर आंच आती है, तो एक समाज कैसे लोहे की दीवार बनकर खड़ा हो जाता है। गोलियों के धुएं और तलवारों की खनक के बीच शुरू हुई वह दास्तान आज भी प्रयागराज की गलियों में जिंदा है और हमेशा जिंदा रहेगी।
