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बेटी पराई नहीं आपकी ही है... लाडो के इशारों में छिपे दर्द को समझें, जब वो ससुराल से वापस आने को कहे तो सबसे पहले क्या कदम उठाएं

Dowry Harassment: जब बेटी दहेज प्रताड़ना या मानसिक शोषण से परेशान होकर मायके लौटना चाहती है, तब मां-बाप को क्या करना चाहिए। जानिए क्यों समाज के डर से ज्यादा जरूरी है बेटी की सुरक्षा, सम्मान और जिंदगी।

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लाडो को अबला नहीं, सबला बनाएं- दहेज को ना बढ़ाएं
Authored by: Medha Chawla
Updated May 27, 2026, 17:20 IST
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Dowry Harassment: ट्विशा शर्मा, अनु मीणा, श्वेता सिंह, पलक रजक, दीपिका नागर... दहेज के मामलों के जितने केस सामने आते हैं, उनको देखकर यही समझ आता है कि हर दहेज प्रताड़ना की कहानी खबर बनकर शुरू नहीं होती। उसकी शुरुआत अक्सर घर के किसी शांत कमरे में होती है, जहां एक बेटी धीरे से अपने मां-बाप से कहती है -

‘मम्मी, मैं बहुत परेशान हूं…’

‘पापा, अब मुझसे नहीं हो रहा…’

‘मैं वहां वापस नहीं जाना चाहती…’

लेकिन दुख की बात यह है कि ऐसे समय में भी बहुत सी बेटियों को सबसे पहले सहने की सलाह दी जाती है। उन्हें समझाया जाता है कि शादी में ऐसा चलता है, थोड़ा झुकना पड़ता है, हर घर में समस्याएं होती हैं। कई बार तो मां-बाप खुद डर जाते हैं कि अगर बेटी वापस आ गई तो समाज क्या कहेगा।

और यहीं उनसे सबसे बड़ी गलती हो जाती है।

भारत में न जाने कितनी बेटियां इसलिए अपनी जिंदगी हार जाती हैं क्योंकि उन्होंने समय रहते मदद मांगी थी, लेकिन मायके में शायद उनकी तकलीफ को उतनी गंभीरता से नहीं लिया गया। उन्हें यह समझाया गया कि शादी टूटना बदनामी है। उन्हें बार-बार याद दिलाया गया कि अब वही उनका घर है, चाहे वहां सम्मान मिले या नहीं।

सच तो यह है कि हमारे समाज ने बेटियों को बचपन से सहना सिखाया है और मां-बाप को समाज से डरना।

हर तकलीफ शरीर पर दिखाई नहीं देती

आज भी बहुत से लोग यह मानते हैं कि जब तक किसी लड़की के शरीर पर चोट के निशान न हों, तब तक मामला इतना गंभीर नहीं है। जबकि मानसिक और आर्थिक प्रताड़ना कई बार किसी भी शारीरिक हिंसा से ज्यादा खतरनाक होती है।

रोज-रोज के ताने, हर बात पर अपमान, मायके वालों को नीचा दिखाना, सैलरी पर अधिकार जताना, बार-बार पैसों की मांग करना या लड़की को यह एहसास दिलाना कि वह बोझ है- ये सब धीरे-धीरे इंसान को भीतर से तोड़ देते हैं।

कई लड़कियां इस दबाव में खुद को ही गलत मानने लगती हैं। उन्हें लगता है कि शायद वही अच्छी पत्नी नहीं हैं, शायद उनसे ही रिश्ता नहीं संभल पा रहा। यही मानसिक प्रताड़ना का सबसे खतरनाक असर है। ऐसे समय में मां-बाप का काम बेटी को दोषी महसूस कराना नहीं, बल्कि उसकी बात को गंभीरता से सुनना होना चाहिए।

शादी हुई तो क्या, बेटी आपकी है, उसकी तकलीफ समझें

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‘समझौता कर लो’ जैसी सलाह कई बार जानलेवा साबित होती है

हमारे समाज में शादी बचाने का पूरा बोझ अक्सर लड़की के कंधों पर डाल दिया जाता है। उसे कहा जाता है कि थोड़ा और सह लो, समय के साथ सब ठीक हो जाएगा।

लेकिन हर बात समझौते से ठीक नहीं होती।

अगर किसी घर में आपकी बेटी की इज्जत खत्म हो रही है, उसकी मानसिक शांति छिन रही है, उसे लगातार आर्थिक और भावनात्मक दबाव में रखा जा रहा है, तो वहां सिर्फ रिश्ता नहीं टूट रहा होता… वहां एक इंसान धीरे-धीरे टूट रहा होता है।

मां-बाप को यह समझना होगा कि हर कीमत पर शादी बचाना जरूरी नहीं है। बेटी की जिंदगी और मानसिक सुरक्षा किसी भी रिश्ते से ज्यादा महत्वपूर्ण है।

समाज से डरना बंद करना होगा

बहुत से परिवार सिर्फ इसलिए बेटी को वापस नहीं बुलाते क्योंकि उन्हें रिश्तेदारों और समाज की बातें सुनने का डर होता है। उन्हें लगता है कि लोग सवाल करेंगे, बेटी को दोष देंगे या परिवार की परवरिश पर उंगली उठाएंगे।

लेकिन सच यह है कि समाज कभी किसी बेटी की पीड़ा अपने हिस्से में नहीं लेता।

जब लड़की ससुराल में अपमान सह रही होती है, तब यही समाज चुप रहता है। लेकिन अगर वह वापस आने का फैसला कर ले, तो वही लोग सबसे ज्यादा चर्चा करते हैं।

ऐसे में मां-बाप को खुद से एक सवाल जरूर पूछना चाहिए—

क्या समाज आपकी बेटी की सुरक्षा की जिम्मेदारी लेगा?

क्या वही लोग उसकी मानसिक हालत संभालेंगे?

क्या वे उसकी जिंदगी वापस लौटा पाएंगे?

अगर जवाब ‘नहीं’ है, तो फिर समाज का डर बेटी की जिंदगी से बड़ा नहीं होना चाहिए।

बेटी को सम्मान दें, उसकी जिंदगी आपके हाथ में है...

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बेटी अगर वापस आना चाहती है, तो उसे सुरक्षित महसूस कराइए

कोई भी लड़की अचानक अपना घर छोड़ने का फैसला नहीं करती। वह यह कदम तब उठाती है जब वह लंबे समय तक मानसिक दबाव, अपमान या डर में जी चुकी होती है।

ऐसे समय में अगर वह मायके लौटना चाहती है, तो उसे अपराधी की तरह महसूस नहीं कराया जाना चाहिए।

बहुत से घरों में बेटी से सबसे पहले यही पूछा जाता है -

‘अब आगे क्या होगा?’

‘लोगों को क्या जवाब देंगे?’

‘तुम थोड़ा और एडजस्ट नहीं कर सकती थी?’

जबकि उस समय उसे सवाल नहीं, सहारे की जरूरत होती है।

उसे यह महसूस होना चाहिए कि उसके मां-बाप उसके साथ खड़े हैं। कि अगर उसने गलत के खिलाफ आवाज उठाई है, तो उसका अपना घर उसके लिए बंद नहीं होगा।

कानूनी और मानसिक मदद लेने में देरी न करें

अगर मामला लगातार बिगड़ रहा है, मानसिक या शारीरिक हिंसा बढ़ रही है या आर्थिक शोषण हो रहा है, तो कानूनी सलाह लेने में हिचकिचाना नहीं चाहिए। बहुत से परिवार बदनामी के डर से शिकायत करने से बचते रहते हैं। लेकिन कई बार यही चुप्पी स्थिति को और खतरनाक बना देती है।

बेहतर होता है कि आप अपने सर्कल और पूरे परिवार को इसमें इंवॉल्व करें। जरूरत पड़ने पर महिला हेल्पलाइन, काउंसलर या कानूनी विशेषज्ञ की मदद लेना बिल्कुल गलत नहीं है। इसके साथ ही बेटी की मानसिक स्थिति पर भी ध्यान देना जरूरी है। लगातार प्रताड़ना किसी भी व्यक्ति को भीतर से तोड़ सकती है। इसलिए उसकी मानसिक स्थिति पर भी ध्यान दें और उसका मन और बातों में लगाने की कोशिश करें।

तलाक जिंदगी का अंत नहीं है

भारतीय समाज में आज भी तलाक को डर की तरह देखा जाता है। यही वजह है कि कई मां-बाप अपनी बेटी को सिर्फ इसलिए गलत रिश्ते में वापस भेज देते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि शादी टूटना सबसे बड़ी असफलता है। लेकिन अब यह सोच बदलनी होगी।

एक तलाकशुदा बेटी फिर से अपनी जिंदगी शुरू कर सकती है। वह काम कर सकती है, आत्मनिर्भर बन सकती है, सम्मान के साथ जी सकती है। लेकिन जो बेटी लगातार प्रताड़ना सहते-सहते जिंदगी हार जाए, उसके बाद सिर्फ पछतावा बचता है।

इसलिए हर मां-बाप को यह समझना होगा कि जिंदा बेटी तलाकशुदा हो सकती है, लेकिन मरी हुई बेटी कभी वापस नहीं आती।

बेटी बचेगी तो ही समाज में इज्जत रहेगी

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आखिर में सबसे जरूरी बात

अगर आपकी बेटी कभी डरते हुए यह कहे कि वह अब उस घर में सुरक्षित महसूस नहीं करती, तो सबसे पहले उसकी बात पर भरोसा कीजिए।

उसे यह मत कहिए कि लोग क्या कहेंगे।

उसे यह मत समझाइए कि थोड़ा और सह लो।

उसे यह मत महसूस कराइए कि वह आपके लिए बोझ बन जाएगी।

क्योंकि कई बार एक बेटी की पूरी जिंदगी इस बात पर टिकी होती है कि उसके मां-बाप उसकी आवाज सुनते हैं या नहीं।

और सच यही है- शादी से बड़ा समाज नहीं होता, समाज से बड़ी इज्जत नहीं होती… लेकिन एक बेटी की जिंदगी इन सबसे कहीं ज्यादा बड़ी होती है।

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