Dowry Deaths: इन दिनों खबरों में ट्विशा शर्मा का मामला छाया हुआ है। रोज नए खुलासे, नए बयान और सोशल मीडिया पर गुस्से की नई लहर दिखाई देती है। लोग दोषियों को सजा देने की मांग कर रहे हैं। लेकिन नोएडा की वो बेटी, जो सपनों और उम्मीदों के साथ दुल्हन बनकर अपने नए घर गई थी और शादी के महज पांच महीने बाद फंदे पर झूलती मिली - क्या उसकी जिंदगी अब किसी बहस या बयान से लौट सकती है।
ट्विशा ने अपना दर्द छिपाया नहीं था। उसने मां से रोते हुए घर ले जाने की बात कही, भाई से अपनी घुटन साझा की, सहेली को अपनी तकलीफ बताई। लेकिन कई बार बेटियों की आवाजें सुन तो ली जाती हैं, समझी नहीं जातीं। ट्विशा शर्मा केस में दहेज प्रताड़ना का एंगल भी जांच के दायरे में है।
अभी लोग इस मामले को समझ ही रहे थे कि ग्रेटर नोएडा की दीपिका नागर की मौत ने सबको झकझोर दिया। गांव की सबसे खूबसूरत लड़कियों में गिनी जाने वाली दीपिका की जिंदगी कथित तौर पर गाड़ी और पैसों की मांग की भेंट चढ़ गई। उसने भी अपने परिवार को प्रताड़ना की बातें बताई थीं। इसी बीच ग्वालियर की पलक रजक की संदिग्ध मौत ने एक और सवाल खड़ा कर दिया। शादी को एक साल भी नहीं हुआ था और मायके पक्ष ने ससुराल वालों पर दहेज के लिए प्रताड़ना और हत्या का आरोप लगाया।
दहेज आज भी बेटियों को क्यों 'खा' रहा है
नाम बदलते हैं, कहानियां नहीं
कभी ट्विशा, कभी दीपिका, कभी पलक… चेहरे बदल जाते हैं, शहर बदल जाते हैं, लेकिन खबरों का दर्द वही रहता है। कहीं बहू ने आत्महत्या कर ली, कहीं संदिग्ध हालात में मौत हो गई, कहीं मानसिक प्रताड़ना ने जिंदगी खत्म कर दी।
अक्सर ऐसे मामलों में मृतक महिला के व्यवहार, मानसिक स्थिति या चरित्र पर सवाल उठाए जाने लगते हैं। सोशल मीडिया और परिवारों के बीच आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो जाते हैं। लेकिन इन सबके बीच सबसे जरूरी सवाल कहीं पीछे छूट जाता है — आखिर इतनी कम उम्र में एक लड़की अपनी जिंदगी खत्म करने की स्थिति तक पहुंचती ही क्यों है?
जवाब कई बार एक ही जगह जाकर टिकता है - दहेज, सामाजिक दबाव और शादी को प्रतिष्ठा का सौदा बना देने वाली मानसिकता पर।
हैरानी की बात यह है कि 21वीं सदी की पढ़ी-लिखी, आत्मनिर्भर और नौकरी करने वाली महिलाएं भी इस दबाव से मुक्त नहीं हैं। कहीं छत से कूदकर, कहीं फांसी लगाकर, कहीं जहर खाकर और कहीं संदिग्ध आग में जलकर उनकी जिंदगी खत्म हो जाती है। हर घटना के बाद कुछ दिन बहस होती है, फिर समाज अगली खबर का इंतजार करने लगता है।
दहेज एक अभिशाप है
दहेज के आंकड़े डराते हैं
दहेज से होने वाली मौतों के आंकड़े ऐसी भयावह तस्वीर दिखाते हैं कि उन्हें पढ़ते ही मन सिहर उठता है। NCRB के अनुसार, साल 2024 में देशभर में 5737 महिलाओं की मौत दहेज से जुड़े मामलों में दर्ज की गई।
राज्यों की बात करें तो उत्तर प्रदेश सबसे ऊपर है, जहां एक साल में 2038 बेटियों ने अपनी जान गंवाई। दूसरे नंबर पर बिहार है, जहां 1078 मौतें दर्ज की गईं।
इसके बाद मध्य प्रदेश में 450, राजस्थान में 386 और पश्चिम बंगाल में 337 महिलाओं की मौत दहेज से जुड़े मामलों में दर्ज हुई। झारखंड में 206, ओडिशा में 200 और हरियाणा में 177 महिलाओं की जान गई।
तेलंगाना 144 मौतों के साथ नौवें और महाराष्ट्र 143 मामलों के साथ दसवें स्थान पर है। देश की राजधानी दिल्ली में भी 2024 के दौरान 109 दहेज हत्याएं दर्ज की गईं।
ये सिर्फ आंकड़े नहीं हैं। इनके पीछे हजारों अधूरे सपने, टूटे परिवार और वो बेटियां हैं जो शायद सिर्फ सम्मान और सुरक्षित जिंदगी चाहती थीं।
डोली में विदा, अर्थी में वापसी क्यों
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या बेटियां सपने देखने के लिए विदा होती हैं या सिर्फ सहने के लिए। जिस घर में एक लड़की मुस्कुराते हुए डोली में जाती है, उसी घर में उसकी आवाज इतनी कमजोर क्यों पड़ जाती है?
दहेज की भूख आखिर इतनी बड़ी कैसे हो गई कि इंसानियत, रिश्ते और एक लड़की की जिंदगी तक छोटी पड़ने लगी? शादी, जो कभी दो परिवारों का रिश्ता मानी जाती थी, कई जगह अब स्टेटस, दिखावे और लेन-देन का इवेंट बनती जा रही है।
महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के प्रोफेसर डॉ. सुनीत मुखर्जी कहते हैं कि ये आंकड़े समाज के सामने गंभीर सवाल खड़े करते हैं। उनका मानना है कि पढ़ाई, नौकरी और आत्मनिर्भरता के बावजूद अगर महिलाएं सुरक्षित महसूस नहीं कर रहीं, तो समस्या सिर्फ कानून की नहीं बल्कि सामाजिक सोच की भी है।
वे कहते हैं कि शादी को धीरे-धीरे रिश्ते से ज्यादा 'इवेंट'बना दिया गया है। जहां प्यार और समझ से ज्यादा चर्चा गिफ्ट्स, जूलरी, खर्च और स्टेटस की होती है। यही मानसिकता दहेज जैसी कुरीति को खत्म नहीं होने देती।
2024 में 5700 से ज्यादा बेटियां दहेज की बलि चढ़ गईं
बेटियों को जीना नहीं, 'शादी बचाना' सिखाया जाता है
दहेज प्रताड़ना का शिकार होने वाली ज्यादातर लड़कियां अचानक मौत के मुंह में नहीं पहुंचतीं। वे पहले संकेत देती हैं। फोन पर रोती हैं, घर आने की बात करती हैं, अपने डर और तनाव को साझा करती हैं। लेकिन कई बार परिवार भी समाज के डर, रिश्तेदारों की बातों और “लोग क्या कहेंगे” जैसी सोच में उलझ जाता है।
प्रफेसर डॉ. अंबरीष सक्सेना, जो साउथ एशियन यूनिवर्सिटी में फैकल्टी ऑफ आर्ट्स एंड डिजाइन से जुड़े हैं, कहते हैं कि आज भी बड़ी संख्या में परिवार लड़कियों को यही सिखाते हैं कि शादी किसी भी हालत में बचानी है।
उनका कहना है कि कई बार दहेज उत्पीड़न या मानसिक प्रताड़ना को 'सामान्य वैवाहिक झगड़ा' मानकर नजरअंदाज कर दिया जाता है। यही चुप्पी धीरे-धीरे खतरनाक रूप ले लेती है। शायद यही वजह है कि नए दौर की कई लड़कियां अब शादी को लेकर असुरक्षित और असहज महसूस करने लगी हैं।
इन राज्यों ने पेश की अलग तस्वीर
जहां देश के कई हिस्सों में दहेज आज भी बेटियों की जिंदगी पर भारी पड़ रहा है, वहीं कुछ राज्य उम्मीद की तस्वीर भी दिखाते हैं।
NCRB के 2024 आंकड़ों के अनुसार, हिमाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, सिक्किम, अंडमान-निकोबार, दादरा और नगर हवेली व दमन-दीव, लद्दाख, लक्षद्वीप और पुडुचेरी में दहेज हत्या का एक भी मामला दर्ज नहीं हुआ।
बेशक ये आंकड़े बताते हैं कि अगर समाज, परिवार और कानून मिलकर संवेदनशीलता के साथ काम करें तो बदलाव संभव है। दहेज कोई परंपरा नहीं, बल्कि रिश्तों और इंसानियत को खा जाने वाली सोच है।
राहत देते हैं इन राज्यों के आंकड़े
बदलाव तभी आएगा जब समाज बदलेगा
वैसे सवाल सिर्फ इतना नहीं कि दहेज कब खत्म होगा। सवाल ये भी है कि आखिर कितनी ट्विशा, दीपिका और पलक के बाद समाज सचमुच बदलना चाहेगा।
प्रोफेसर डॉ. अंबरीष सक्सेना मानते हैं कि दहेज सिर्फ एक पारिवारिक बुराई नहीं, बल्कि पूरे सामाजिक ढांचे की विफलता का नतीजा है। उनके मुताबिक, जब तक शादी को प्रतिष्ठा, दिखावे और लेन-देन से जोड़कर देखा जाता रहेगा, तब तक बेटियां इस दबाव की कीमत चुकाती रहेंगी। वह उम्मीद जरूर जताते हैं कि नई पीढ़ी धीरे-धीरे इस सोच के खिलाफ खड़ी हो रही है और आने वाले समय में दहेज को सामाजिक शर्म की तरह देखा जाएगा, न कि स्टेटस सिंबल की तरह।
वहीं प्रोफेसर सुनीत मुखर्जी का मानना है कि सिर्फ कानून बना देने से बदलाव नहीं आएगा। इसके लिए समाज के भीतर एक बड़े सामाजिक आंदोलन की जरूरत है, जहां लोग खुलकर दहेज लेने वालों का विरोध करें, बेटियों को समझौते नहीं बल्कि आवाज उठाना सिखाएं और शादी को सौदे की जगह बराबरी के रिश्ते की तरह स्वीकार करें।
