Difference Between Ghazal and Nazm in Hindi: शेर-ओ-शायरी के शौकीन लोग अकसर गज़ल और नज़्म भी सुनते होंगे। तमाम नग़मानिगारों ने एक से बढ़कर एक गजल और नज्मों से लोगों का दिल बहलाया है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि गज़ल और नज़्म में क्या अंतर होता है। क्या ये दोनों एक ही होती हैं या फिर दोनों को कहने और लिखने का तरीका भी अलग है। आइए जानते हैं कि क्या होती है गज़ल और किसे कहते हैं नज़्म:
नज़्म किसे कहते हैं? (What is Nazm)
नज़्म को उर्दू कविता का एक फ्रीस्टाइल रूप कहा जा सकता है। नज़्म एक कहानी की तरह है। यह हमेशा ही किसी एक टॉपिक पर लिखी जाती है। उसे नज़्म का उन्वान (टाइटल) कहा जाता है। उसके पीछे एक कहानी होती है कि किस मौके पर ये नज़्म लिखी गई है और पूरी की पूरी नज़्म अपने उन्वान को निभाती है। यानी पूरी नज़्म अपने टाइटल से जुड़ी हुई होती है और टॉपिक से भटकती नहीं है।
गज़ल किसे कहते हैं? (What is Ghazal)
ग़ज़ल शेरों से बनती है। एक शेर में दो मिसरे(लाइन) होते हैं। मिसरों में तुक जिसे राइमिंग कहते हैं, होना आवश्यक है। ग़ज़ल के दो शेर एक दूसरे से रिश्ता नहीं रखते। एक शेर दूसरी बात कह सकता है और अगली शेर पहली शेर से बिल्कुल हट कर कुछ और कह सकता है। मतलब कि पूरी ग़ज़ल में शायर एक टॉपिक पर ही बात करे ऐसा नहीं होता। इसलिए ग़ज़ल का कोई टॉपिक नहीं होता। इसमें दो लाइनों में ही शायर को पूरी और असरदार बात कहनी होती है। कुछ शायर एक ही थीम पर कई शेर वाली ग़ज़ल भी लिखते हैं जिसे ग़ज़ले मुसलसल कहते हैं।
गज़ल और नज़्म में अंतर (Difference Between Nazm and Ghazal)
ग़ज़ल में मुखड़ा और बाकी शेर एक ही शाब्दिक अक्षर(Rhyme Scheme) से अंत होते हैं। हर शेर का अपना अलग ख्याल और मुकम्मल विचार होता है। एक शेर के विचार किसी दूसरे शेर से नहीं जुड़ते ।
वहीं गज़ल के विपरीत नज़्म के शेरों में कोई भी शाब्दिक सम्बन्ध(Rhyme Scheme) नहीं होता और नज़्म के सारे शेरों में एक ही ख्याल सूत्रबद्ध किया जाता है । नज़्म एक मुक्तसर संगीतमय कहानी सी होती है।
