सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि इंटरनेट का इस्तेमाल करना हर व्यक्ति का मौलिक अधिकार है और बच्चों को भी यह अधिकार हासिल है। अदालत ने साफ किया है कि ऑनलाइन होने वाले बाल यौन शोषण और दुर्व्यवहार से बचाने के नाम पर बच्चों को इंटरनेट से पूरी तरह दूर नहीं रखा जा सकता। इसके बजाय हानिकारक सामग्री बनाने और फैलाने वालों के साथ-साथ ऐसी सामग्री को हटाने में नाकाम रहने वाले सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर कार्रवाई जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट (फाइल फोटो)
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन एलायंस एवं अन्य बनाम एस. हरीश एवं अन्य मामले में यह अहम फैसला सुनाया। अदालत ने केंद्र सरकार को बाल यौन शोषण एवं दुर्व्यवहार सामग्री (CSEAM) की पहचान करने और उसे हटाने के लिए राष्ट्रीय डेटाबेस बनाने का निर्देश दिया। साथ ही, सोशल मीडिया कंपनियों के लिए सामग्री की पहचान करने, उसे हटाने और पुलिस को इसकी सूचना देने की प्रक्रिया स्पष्ट की।
136 पन्नों के इस फैसले में अदालत ने कहा कि मौजूदा व्यवस्था में एक प्लेटफॉर्म से हटाई गई सामग्री दूसरे प्लेटफॉर्म पर मौजूद रह सकती है। इससे निपटने के लिए साझा डेटाबेस और बेहतर तकनीकी व्यवस्था जरूरी है। अदालत ने बच्चों के सोशल मीडिया खातों के लिए 'चाइल्ड मोड' का सुझाव भी दिया, जिसमें माता-पिता की सहमति, निगरानी और बच्चों को दिखाई जाने वाली सामग्री पर नियंत्रण जैसे उपाय शामिल हो सकते हैं।
इंटरनेट का इस्तेमाल मौलिक अधिकार क्यों?
सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 19(1)(ए) का हवाला देते हुए कहा कि इंटरनेट तक पहुंच और उसका इस्तेमाल हर व्यक्ति का मौलिक अधिकार है। बच्चों को भी, उनकी उम्र चाहे जो हो, यह अधिकार प्राप्त है।
अदालत ने कहा कि बच्चों की सुरक्षा और उनकी स्वतंत्रता एक-दूसरे के खिलाफ नहीं हैं। बच्चों को सुरक्षित रखने के लिए जरूरी कदम उठाए जाने चाहिए, लेकिन इसके लिए उन्हें इंटरनेट से पूरी तरह दूर रखना सही रास्ता नहीं है।
कोर्ट ने माना कि इंटरनेट पर बच्चों के लिए कई खतरे मौजूद हैं। हालांकि, ऐसे खतरों का समाधान उन लोगों और प्लेटफॉर्म के खिलाफ कार्रवाई करना है, जो उनके शोषण से जुड़ी सामग्री बनाते, फैलाते या उसे हटाने में नाकाम रहते हैं। अदालत के मुताबिक, उनकी विफलता की सजा बच्चों को इंटरनेट से दूर रखकर नहीं दी जा सकती।
अदालत ने यह भी कहा कि बच्चों पर पूरी तरह रोक लगाने से यह साबित नहीं होता कि वे अधिक सुरक्षित हो जाएंगे। ऐसे प्रतिबंध बच्चों को दूसरे, कम सुरक्षित प्लेटफॉर्म या वेबसाइटों की ओर ले जा सकते हैं। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि बच्चों को नुकसान पहुंचाने वाली खास तरह की सामग्री और सेवाओं, जैसे एडल्ट कंटेंट वाली वेबसाइटों, तक उनकी पहुंच पर रोक लगाने की जरूरत है।
केंद्र सरकार बनाएगी बाल यौन शोषण सामग्री का राष्ट्रीय डेटाबेस
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को CSEAM की पहचान और उसे हटाने के लिए राष्ट्रीय डिजिटल आइडेंटिटी एवं यूआरएल डेटाबेस बनाने का निर्देश दिया है। इसे मौजूदा सहयोग पोर्टल के भीतर बनाया जा सकता है या अलग व्यवस्था के तौर पर शुरू किया जा सकता है।
इस डेटाबेस में आपत्तिजनक तस्वीरों और वीडियो को सीधे स्टोर नहीं किया जाएगा। इसमें उनकी डिजिटल पहचान यानी हैश और संबंधित वेबसाइट के यूआरएल दर्ज होंगे। इनकी मदद से सोशल मीडिया कंपनियां अपने प्लेटफॉर्म पर मौजूद सामग्री का मिलान कर सकेंगी।
अभी अलग-अलग कंपनियां अपने प्लेटफॉर्म पर मिली सामग्री की पहचान करती हैं। एक कंपनी के सामग्री हटाने से दूसरी कंपनियों को जरूरी नहीं कि उसी सामग्री की जानकारी मिल जाए। राष्ट्रीय डेटाबेस बनने से सभी प्लेटफॉर्म पहले से पहचानी और सत्यापित सामग्री का पता लगाकर उसे हटा सकेंगे।
अदालत ने केंद्र सरकार से यह भी कहा कि वह बताए कि सहयोग पोर्टल को इस काम के लिए किस तरह इस्तेमाल किया जा सकता है और उसे इस भूमिका के लिए कब तक तैयार किया जा सकता है।
डेटाबेस में सामग्री जोड़ने से पहले तीन विशेषज्ञ करेंगे जांच
सुप्रीम कोर्ट ने डेटाबेस में गलत सामग्री दर्ज होने की आशंका को रोकने के लिए जांच की प्रक्रिया तय की है। किसी शिकायत या रिपोर्ट के आधार पर सामग्री को सीधे डेटाबेस में शामिल नहीं किया जा सकेगा।
पहले विशेष सॉफ्टवेयर की मदद से सामग्री की शुरुआती जांच की जा सकती है। इसके बाद कम से कम तीन प्रशिक्षित विशेषज्ञों को स्वतंत्र रूप से यह तय करना होगा कि संबंधित सामग्री बाल यौन शोषण एवं दुर्व्यवहार सामग्री की श्रेणी में आती है या नहीं।
सामग्री की पुष्टि होने के बाद ही उसका हैश या यूआरएल डेटाबेस में दर्ज किया जाएगा। अदालत ने निर्देश दिया कि डेटाबेस में जानकारी सुरक्षित, एन्क्रिप्टेड माध्यम से दर्ज हो और उसमें केवल सत्यापित सामग्री की डिजिटल पहचान रखी जाए।
इसका उद्देश्य यह है कि डेटाबेस में किसी सामग्री को गलत तरीके से शामिल न किया जाए और उसके आधार पर वैध सामग्री को हटाने की आशंका कम हो।
डेटाबेस से मेल खाने वाली सामग्री तुरंत हटानी होगी
अदालत ने बच्चों से जुड़े ऑनलाइन कंटेंट को हटाने के लिए दो अलग स्थितियां स्पष्ट की हैं।
1. पहले से पहचानी गई सामग्री
अगर किसी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर ऐसी सामग्री मिलती है, जिसका हैश या यूआरएल राष्ट्रीय डेटाबेस में पहले से दर्ज है, तो कंपनी को उसे तुरंत निष्क्रिय कर हटाना होगा। उसे अपनी ओर से दोबारा पुष्टि करने का इंतजार नहीं करना होगा।
2.पहली बार मिली सामग्री
अगर किसी प्लेटफॉर्म पर ऐसी सामग्री मिलती है, जो डेटाबेस में दर्ज नहीं है, तो कंपनी को अपनी जांच और जरूरी पुष्टि के आधार पर कार्रवाई करनी होगी। सामग्री हटाने के बाद उसे संबंधित पुलिस या उचित सरकारी प्राधिकारी और डेटाबेस के रखरखाव के लिए जिम्मेदार निकाय को सूचना देनी होगी।
हालांकि, अदालत ने यह भी माना कि डेटाबेस में गलती हो सकती है। इसलिए हटाई गई सामग्री को समय समय पर रिव्यू करना जरूरी है, ताकि गलत प्रविष्टियों को सुधारा जा सके और किसी वैध सामग्री को गलत पहचान के कारण हटाए जाने से बचाया जा सके।
सोशल मीडिया कंपनियों को दो घंटे के भीतर पुलिस को देनी होगी सूचना
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बाल यौन शोषण सामग्री को केवल हटाना पर्याप्त नहीं है। कानून के तहत संबंधित पुलिस अधिकारियों को इसकी सूचना देना भी जरूरी है।
अदालत ने अनजान सोर्स से आने कंटेंट के मामले में सूचना देने की समयसीमा तय की है। अगर सामग्री हटाने का फैसला शिकायत के निपटारे के बाद लिया गया है, तो पुलिस या संबंधित अथॉरिटी को सूचना शिकायत का निपटारा होने के तुरंत बाद और किसी भी स्थिति में दो घंटे के भीतर देनी होगी। अगर कंपनी अपनी जांच के आधार पर सामग्री हटाती है, तो उसे हटाने के दो घंटे के भीतर रिपोर्ट करना होगा। अदालत या सक्षम सरकारी प्राधिकारी के निर्देश पर सामग्री हटाने के मामले में भी दो घंटे के भीतर सूचना देनी होगी।
वहीं, राष्ट्रीय डेटाबेस में पहले से दर्ज सामग्री से मेल खाने के कारण हटाई गई सामग्री के बारे में कंपनियों को डेटाबेस के रखरखाव के लिए जिम्मेदार प्राधिकारी को साप्ताहिक संयुक्त रिपोर्ट देनी होगी।
अदालत ने यह भी कहा कि सोशल मीडिया कंपनियों को ऐसी शिकायतों के लिए अलग व्यवस्था रखनी चाहिए। शिकायत दर्ज कराने का विकल्प साफ और आसान होना चाहिए, ताकि लोग बिना परेशानी के ऐसी सामग्री की रिपोर्ट कर सकें।
हर प्लेटफॉर्म पर शिकायत दर्ज करने का विकल्प साफ दिखना चाहिए
सुप्रीम कोर्ट ने सोशल मीडिया कंपनियों को निर्देश दिया कि वे अपनी वेबसाइट या ऐप के होम पेज पर शिकायत अधिकारी का नाम और शिकायत दर्ज कराने की प्रक्रिया प्रमुखता से दिखाएं। यह जानकारी समय-समय पर अपडेट भी होनी चाहिए।
हर प्लेटफॉर्म की शिकायत व्यवस्था में बाल यौन शोषण सामग्री की रिपोर्ट करने के लिए अलग विकल्प होना चाहिए। उसका नाम इतना सरल हो कि कोई भी व्यक्ति, चाहे उसकी उम्र या तकनीकी जानकारी कुछ भी हो, आसानी से समझ सके।
अदालत ने कहा कि संबंधित सामग्री, प्रोफाइल, ग्रुप या लिंक से शिकायत दर्ज करने का विकल्प अधिकतम दो चरणों में उपलब्ध होना चाहिए। केंद्र सरकार को इस प्रक्रिया को सभी प्लेटफॉर्म पर एक समान बनाने के लिए दिशा-निर्देश तैयार करने को कहा गया है।
कंपनियों को शिकायतों की जांच करते समय सिर्फ तस्वीर या वीडियो नहीं देखना चाहिए। उन्हें उससे जुड़े कैप्शन, शब्दों, लिंक और प्रचारित ऐप या टूल की भूमिका भी समझनी होगी, ताकि अप्रत्यक्ष रूप से बच्चों के शोषण को बढ़ावा देने वाली सामग्री की पहचान की जा सके।
सोशल मीडिया कंपनियों के लिए सख्त नियम बनाने का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को सोशल मीडिया कंपनियों के लिए दिशा-निर्देश और मानक संचालन प्रक्रिया तैयार करने को कहा है। इनमें सामग्री की पहचान और उसे हटाने के लिए इस्तेमाल होने वाले तकनीकी उपायों को स्पष्ट किया जाना चाहिए।
अदालत ने 'हैश मैचिंग' और 'यूआरएल लिस्टिंग' जैसे उपायों के बारे में आदेश में लिखा है। हैश मैचिंग के जरिए तस्वीर या वीडियो की डिजिटल पहचान बनाकर उसकी दूसरी प्रतियों का पता लगाया जा सकता है। परसेप्चुअल हैशिंग में सामग्री की विजुअल ऑडियो पहचान को भी देखा जा सकता है, ताकि तस्वीर या वीडियो में कुछ बदलाव करने के बावजूद उसकी पहचान संभव हो।
यूआरएल लिस्टिंग से उन वेबसाइटों के पते पहचाने जा सकते हैं, जहां ऐसी सामग्री उपलब्ध है। यह इसलिए जरूरी है, क्योंकि कई बार सोशल मीडिया पर सामग्री सीधे अपलोड नहीं होती, बल्कि उसके लिंक साझा किए जाते हैं।
अदालत ने केंद्र सरकार को जरूरत पड़ने पर सूचना प्रौद्योगिकी कानून और उससे जुड़े नियमों में बदलाव करने का भी निर्देश दिया है। इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय को इन दिशा-निर्देशों की समय-समय पर समीक्षा करनी होगी।
इस मामले में याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता एच.एस. फुल्का ने कहा कि सरकार के सहयोग से भारत अब बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा के लिए दुनिया के सबसे मजबूत ढांचों में से एक तैयार कर सकता है। उन्होंने कहा, ''सुप्रीम कोर्ट ने एक स्पष्ट और व्यावहारिक रोडमैप दिया है। इसमें सामग्री को तत्काल हटाना, दो घंटे के भीतर पुलिस को इसकी सूचना देना, समर्पित शिकायत अधिकारियों की नियुक्ति और शिकायत दर्ज कराने के लिए एक समान व्यवस्था लागू करना शामिल है।''
सुप्रीम कोर्ट के आदेश का स्वागत करते हुए जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन एलायंस की ओर से पेश अधिवक्ता रचना त्यागी ने कहा, ''सुप्रीम कोर्ट ने 2024 के अपने फैसले की बात को सबसे स्पष्ट शब्दों में दोहराया है। बच्चों की सुरक्षा के मामले में कोई भी प्लेटफॉर्म, चाहे वह कितना ही बड़ा या ताकतवर क्यों न हो, कानून से ऊपर नहीं है। अदालत ने साफ कर दिया है कि बाल यौन शोषण सामग्री को चुपचाप हटा देना ही पर्याप्त नहीं है। पॉक्सो कानून के तहत इसकी सूचना पुलिस को देना अनिवार्य है। कानूनी संरक्षण की आड़ में चुप्पी साधने की छूट नहीं मिल सकती।''
बच्चों के सोशल मीडिया खातों के लिए 'चाइल्ड मोड' का सुझाव
सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा के लिए सोशल मीडिया खातों में विशेष 'चाइल्ड मोड' शुरू करने का सुझाव दिया है। अदालत के मुताबिक, इस व्यवस्था में बच्चों के खाते डिफॉल्ट रूप से निजी रखे जा सकते हैं।
इसके तहत कोई अपरिचित एडल्ट या वयस्क की ओर से बच्चों को मैसेज भेजने या उनसे संपर्क करने की कोशिश करे तो उस पर रोक लगाई जा सके। बच्चों को दिखाई जाने वाली विज्ञापन सामग्री और अन्य कंटेंट पर भी नियंत्रण रखा जा सकता है।
अदालत ने खास तौर पर टीनेज(13 से 19 साल) से पहले के बच्चों के लिए ऐसे उपायों पर विचार करने को कहा। इसके लिए माता-पिता की कंसेंट वेरिफाई करने का उचित तरीका अपनाया जा सकता है। हालांकि सिस्टम को किस तरह लागू किया जाएगा, इसका फैसला केंद्र सरकार पर छोड़ा गया है।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि बच्चों की सुरक्षा के लिए बनाए गए राष्ट्रीय डेटाबेस और दूसरे तकनीकी उपायों का इस्तेमाल किसी अन्य उद्देश्य से नहीं किया जाना चाहिए। इनका इस्तेमाल बाल यौन शोषण एवं दुर्व्यवहार सामग्री की पहचान और उसे हटाने तक सीमित रहना चाहिए।
बच्चों और माता-पिता को भी ऑनलाइन सुरक्षा के बारे में जागरूक करना होगा
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बच्चों की सुरक्षा सिर्फ आपत्तिजनक सामग्री हटाने से सुनिश्चित नहीं होगी। उन्हें इंटरनेट पर मौजूद खतरों को पहचानना और अपनी निजी जानकारी की रक्षा करना भी सिखाना होगा।
केंद्र और राज्य सरकारों तथा राष्ट्रीय और राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोगों को इस दिशा में जागरूकता अभियान चलाने के निर्देश दिए गए हैं। बच्चों को यह समझाना होगा कि कोई व्यक्ति दोस्ती या मदद के बहाने उन्हें कैसे बहका सकता है, ऑनलाइन यौन शोषण के लिए ब्लैकमेल कैसे किया जा सकता है और ऐसी स्थिति में मदद कहां से मिल सकती है।
अदालत ने स्कूलों और शिक्षण संस्थानों में बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा और उम्र के अनुरूप यौन शिक्षा पर भी जोर दिया। शिक्षकों और अन्य कर्मचारियों को बच्चों के शोषण या दुर्व्यवहार के संकेत पहचानने और ऐसी जानकारी मिलने पर सही कदम उठाने के लिए प्रशिक्षित करने की जरूरत बताई गई है।
माता-पिता और अभिभावकों को भी बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों, मोबाइल और सोशल मीडिया की सुरक्षा सेटिंग तथा संभावित खतरों के बारे में जागरूक करने को कहा गया है। सोशल मीडिया कंपनियों को बच्चों को सुरक्षित इस्तेमाल के बारे में समय-समय पर याद दिलाने और अनजान वयस्कों से संपर्क करने पर चेतावनी देने जैसे उपाय भी करने होंगे।
अदालत ने पीड़ित बच्चों के लिए मुफ्त काउंसलिंग, मनोवैज्ञानिक मदद और जरूरत के मुताबिक इलाज की व्यवस्था करने पर भी जोर दिया। इसके साथ ही उनकी स्थिति पर लगातार नजर रखने और जरूरी सहायता उपलब्ध कराने के निर्देश दिए गए हैं।
बार-बार नियम तोड़ने वाली कंपनियों पर जुर्माने का भी मुद्दा
सुप्रीम कोर्ट ने सोशल मीडिया कंपनियों की जवाबदेही तय करने के लिए मौजूदा कानूनी व्यवस्था पर भी विचार किया। अदालत ने कहा कि नियमों का पालन नहीं करने वाली कंपनियों के खिलाफ कड़ा एक्शन होना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से यह विचार करने को कहा कि सूचना प्रौद्योगिकी कानून (आईटी रूल्स) और उसके नियमों के उल्लंघन पर जुर्माने जैसे अतिरिक्त दंड का प्रावधान किया जाना चाहिए या नहीं। अदालत ने उन मामलों पर भी ध्यान देने को कहा, जहां कंपनियों के प्लेटफॉर्म पर पेवॉल या सब्सक्रिप्शन के जरिए ऐसी सामग्री से कमाई की जाती है।
अदालत ने सुझाव दिया कि यदि किसी कंपनी के प्लेटफॉर्म पर पेवॉल या सब्सक्रिप्शन के जरिए बाल यौन शोषण सामग्री के प्रसार से कमाई होती है, तो उससे प्राप्त राजस्व को जब्त करने जैसे उपायों पर भी विचार किया जाए। यह केंद्र सरकार के लिए विचार और नियम बनाने से जुड़ा निर्देश है, न कि इस आदेश में किसी कंपनी पर लगाया गया निश्चित जुर्माना।
2024 के फैसले के पालन से जुड़ा है मामला
यह मामला सुप्रीम कोर्ट के 23 सितंबर 2024 के फैसले के पालन से जुड़ा है। अदालत ने 14 अगस्त 2026 के अपने पिछले आदेश में सोशल मीडिया कंपनियों की ओर से पहले दिए गए निर्देशों का पालन नहीं किए जाने पर चिंता जताई थी।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले में अदालत ने केंद्र सरकार को राष्ट्रीय डेटाबेस, तकनीकी उपायों, शिकायत निवारण और रिपोर्टिंग की व्यवस्था के लिए जरूरी दिशा-निर्देश, मानक संचालन प्रक्रिया और कानून में आवश्यक बदलाव करने को कहा है।
केंद्र सरकार को अगली सुनवाई तक हलफनामा दाखिल कर यह बताना होगा कि इन निर्देशों पर क्या कदम उठाए गए हैं और उनके पालन में कितनी प्रगति हुई है। सुप्रीम कोर्ट ने मामले को आगे की सुनवाई के लिए 10 दिसंबर के लिए लिस्ट किया है।
