सुप्रीम कोर्ट ने आज केंद्र सरकार की नीति को चुनौती देने वाली उस जनहित याचिका पर नोटिस जारी किया, जिसके तहत पीली मटर को 31 मार्च 2026 तक बिना किसी शुल्क के आयात किए जाने की अनुमति दी है। यह याचिका किसान महापंचायत नाम के संगठन ने दाखिल की है। संगठन का कहना है कि लगातार आयात बढ़ने से घरेलू दालों के दाम गिर गए हैं और भारतीय किसान भारी नुकसान झेल रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट (फाइल फोटो)
किसानों की नाराज़गी और याचिका का आधार
दिसंबर 2023 में केंद्र सरकार ने तीन महीने के लिए पीली मटर आयात पर लगी पाबंदी हटाई थी। लेकिन बाद में लगातार अधिसूचनाएं जारी कर इस छूट को 2026 तक बढ़ा दिया गया। किसान संगठनों का कहना है कि यह फैसला कृषि लागत और मूल्य आयोग (CACP) और नीति आयोग की सिफारिशों के विपरीत है। इन संस्थाओं ने साफ कहा था कि पीली मटर के आयात पर रोक जरूरी है, ताकि घरेलू दाल उत्पादन को बचाया जा सके और किसानों को उचित दाम मिल सके।
सुप्रीम कोर्ट में हुई लंबी सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट की बेंच जिसमें जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस एनके सिंह शामिल थे, ने याचिका पर सुनवाई की। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने दलील दी कि पीली मटर के आयात से सोयाबीन, मूंगफली, उड़द, मूंग और अरहर जैसी दालों की कीमतें न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) से नीचे चली गई हैं। भूषण ने कहा कि कृषि लागत और मूल्य आयोग ने मार्च 2025 में साफ तौर पर पीली मटर के आयात पर रोक लगाने और अन्य दालों पर आयात शुल्क बढ़ाने की सिफारिश की थी।
किसानों को कैसे हो रहा घाटा
याचिका में बताया गया है कि आयातित पीली मटर भारत में करीब 3500 रुपये प्रति क्विंटल में बिक रही है, जबकि सरकार ने अरहर का न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) 8000 रुपये और उड़द 7800 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है। सस्ती आयातित मटर के कारण चना, अरहर और मूंग जैसी देशी दालों की कीमतें MSP से भी नीचे चली गई हैं। नतीजा यह है कि किसान अपनी लागत निकालने में भी असमर्थ हो रहे हैं और दाल उत्पादन से पीछे हट रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट के सवाल और बहस
सुनवाई के दौरान जस्टिस सूर्यकांत ने पूछा कि क्या भारत में दालों का घरेलू उत्पादन जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त है? इस पर भूषण ने कहा कि पीली मटर मात्र 3500 रुपये प्रति क्विंटल में आयात हो रही है जबकि घरेलू दालों का एमएसपी 8000 रुपये प्रति क्विंटल से अधिक है। उन्होंने कहा कि पहले सरकार ने आयात पर भारी शुल्क लगाया था और कोर्ट ने भी किसानों के हित में इसे सही ठहराया था, लेकिन अब स्थिति बिल्कुल उलट है।
जस्टिस सूर्यकांत ने यह भी टिप्पणी की कि किसान अपनी उपज को लंबे समय तक स्टोर नहीं कर पाते क्योंकि भंडारण सुविधाएं किसानों के पास नहीं हैं। ऐसे में वे लागत से कम दाम पर अपनी फसल बेचने को मजबूर हो जाते हैं।
स्वास्थ्य पर प्रभाव और सरकारी चिट्ठियां
भूषण ने कोर्ट को यह भी बताया कि ऑस्ट्रेलिया और अन्य देशों में पीली मटर को पशु आहार के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। उन्होंने सवाल उठाया कि इसे भारत में खाने के लिए इस्तेमाल करने से स्वास्थ्य पर क्या असर पड़ेगा? जस्टिस सूर्यकांत ने भी इस पर चिंता जताई। भूषण ने आगे कहा कि कृषि मंत्री सहित कई लोग सरकार को लिख चुके हैं कि इस नीति पर तुरंत रोक लगनी चाहिए, क्योंकि किसानों की स्थिति बदतर हो रही है और आत्महत्याएं बढ़ रही हैं।
सरकार के मिशन आत्मनिर्भरता पर सवाल
फरवरी 2025 में केंद्र ने छह साल का मिशन आत्मनिर्भरता इन पल्सेज़ शुरू किया था। इस मिशन का मकसद था कि भारत के किसान तूर, उड़द, मसूर दालों का ज्यादा उत्पादन करें और उन्हें दाम की गारंटी मिले। लेकिन बिना शुल्क के पीली मटर आयात जारी रखने का फैसला इसी नीति के उलट माना जा रहा है। नीति आयोग ने भी अपनी हालिया रिपोर्ट में चेताया है कि दालों के आयात पर निर्भर रहना देश की खाद्य सुरक्षा के लिए खतरनाक है और दीर्घकालिक समाधान केवल घरेलू उत्पादन बढ़ाने में ही है।
सुप्रीम कोर्ट से क्या मांग की गई
किसान महापंचायत ने सुप्रीम कोर्ट से अपील की है कि सरकार की अधिसूचना रद्द की जाए या उसमें संशोधन कर ऐसा प्रावधान जोड़ा जाए जिससे आयातित मटर की कीमत घरेलू MSP से नीचे न रहे। संगठन ने यह भी कहा कि अगर आयात पर तुरंत रोक नहीं लगी, तो लाखों किसान खेती छोड़ने को मजबूर हो जाएंगे और देश दाल उत्पादन में पिछड़ जाएगा।
किसानों की मांग पर सरकार क्या कर सकती है?
केंद्र सरकार के पास विदेशी व्यापार कानून 1992 की धारा 3 और 9ए के तहत अधिकार है कि वह आयात पर पाबंदी या शुल्क लगा सके। सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी कई मामलों में किसानों के हितों की रक्षा करते हुए सरकार को आयात नीति पर दोबारा विचार करने का निर्देश दिया है। अब देखना यह होगा कि अदालत सरकार को क्या कदम उठाने के लिए कहती है।
सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई में क्या होगा?
बेंच ने कहा कि वह केवल इसलिए नोटिस जारी कर रही है क्योंकि नीति आयोग जैसे आधिकारिक संस्थानों ने इस मुद्दे पर चिंता जताई है। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि आगे की सुनवाई में यह देखना होगा कि इस नीति से उपभोक्ताओं और किसानों दोनों पर क्या असर पड़ रहा है।
