US Iran Peace Talk In Pakistan: यह कथन काफी हद तक सही है कि हर युद्ध का अंत बातचीत की मेज पर ही होता है। अमेरिका-ईरान युद्ध की ही बात करें तो करीब 40 दिनों तक चले भीषण युद्ध पर स्थाई विराम लगाने के लिए शांति वार्ता हो रही है।
हालांकि, समस्या ये है कि जिस देश ने खुद को 'शांतिदूत' करार देते हुए सुलह कराने का जिम्मा लिया है, उसका दूसरा नाम ही 'आतंकिस्तान' है। जिस देश में आतंकियों की फैक्ट्री हो, वो देश अगर अमन और कूटनीति की बात करे तो बड़ा हास्यास्पद लगता है, लेकिन जब तक अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप हैं, तब तक दुनिया में कुछ भी मुमकिन है।
पाकिस्तान आर्मी चीफ आसिम मुनीर ने जेडी वेंस का इस्लामाबाद में किया स्वागत
पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में अमेरिका-ईरान के बीच शांति वार्ता होने जा रही है। दुनिया की निगाहें भारत के पड़ोसी मुल्क पर टिकी है। इस वार्ता से पहले हर तरफ इस बात की चर्चा हो रही है कि जो देश महंगाई, कर्ज और आर्थिक बदहाली से पस्त है, वो उसमें आखिर अमेरिका-ईरान की दुश्मनी खत्म कराने के लिए इतना बेताब क्यों है?
दरअसल, इसके कई जवाब हैं। आइए सिलसिलेवार ढंग से इस सवाल का जवाब जानते हैं। चीनी अखबार, साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट की एक रिपोर्ट के मुताबिक, जानकारों का कहना है कि पाकिस्तान मध्य पूर्व में एक अहम खिलाड़ी बनना चाहता है। उसे उम्मीद है कि ईरान पर अमेरिका-इजरायल युद्ध खत्म करने के लिए अगर वह कोई रास्ता निकाल लेता है तो यह मकसद पूरा होने में मदद मिलेगी।
निवेश और डिफेंस डील की लालच
विशेषज्ञों के मुताबिक पाकिस्तान खाड़ी देशों के राजघरानों के साथ रक्षा सौदे कर सकता है। वहीं, इन देशों से निवेश भी लाना चाहता है, जिससे कमजोर अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का रास्ता मिल सके। अमेरिका में पाकिस्तान के पूर्व राजदूत हुसैन हक्कानी के अनुसार, सुरक्षा प्रदाता की भूमिका इस्लामाबाद के लिए प्रतीकात्मक और वास्तविक, दोनों ही तरीकों से महत्वपूर्ण है। वह लंबे समय से खुद को मध्य पूर्व में एक अहम खिलाड़ी के तौर पर देखता रहा है। उन्होंने कहा, पाकिस्तान खाड़ी के अरब देशों, तुर्की और अमेरिका से आर्थिक निवेश और ऊर्जा सहायता चाहता है।
सेना विस्तार के लिए चाहता है पैसा
विशेषज्ञों के मुताबिक पाकिस्तान अपनी सेना का विस्तार करना चाहता है। उसे लगता है कि मध्य पूर्व की मदद से इसके लिए धन मिल सकता है। हडसन इंस्टीट्यूट और अनवर गर्गाश डिप्लोमैटिक एकेडमी के वरिष्ठ फेलो हक्कानी ने कहा कि मध्य पूर्व के देशों के साथ घनिष्ठ रक्षा और सुरक्षा संबंध पाकिस्तान को अपना रक्षा आधार बनाने में मदद करेंगे। पाकिस्तान को लगता है कि वह इस तरह भारत को चुनौती दे सकता है।
पाकिस्तानी सैनिकों की फाइल फोटो।
चीन और यूरोपीय संघ के भी संपर्क में
पाकिस्तान ने यूरोपीय संघ और पुराने साझेदार चीन को भी इस प्रक्रिया में शामिल रखने का खास ध्यान रखा है। विश्लेषकों ने कहा कि सभी पक्षों को शामिल करके, पाकिस्तान ईरान के बुनियादी ढांचे को तबाह होने से बचाने की कोशिश कर रहा था, जिसकी धमकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दी थी।पाकिस्तान को अमेरिका से वित्तीय सहायता चाहिए और चीन के साथ उसके रणनीतिक हित जुड़े हैं। चीन ने भी पाकिस्तान की इस मध्यस्थता का समर्थन किया है।
पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की फाइल फोटो।
सीमा सुरक्षा और 'स्पिल-ओवर' का डर
अब बात की जाए भूगोल की। दरअसल, पाकिस्तान ईरान के साथ लगभग 900 किलोमीटर लंबी सीमा साझा करता है। यदि युद्ध और अधिक भड़कता है, तो पाकिस्तान को डर है कि अस्थिरता उसके अपने बलूचिस्तान प्रांत में फैल सकती है। पाकिस्तान नहीं चाहता कि ईरान में केंद्रीय सत्ता कमजोर हो, क्योंकि इससे विद्रोही समूहों (जैसे BLA) को अपनी गतिविधियां बढ़ाने का मौका मिल सकता है।
ईरान से भौगोलिक निकटता और गहरे संबंध
पाकिस्तान और ईरान के बीच सांस्कृतिक, धार्मिक और "भाईचारे" वाले संबंध हैं। पाकिस्तान को ईरान की संवेदनशीलताओं को समझने वाला "निष्पक्ष" मध्यस्थ माना जाता है, जबकि खाड़ी देश (जैसे ओमान या कतर) युद्ध में सीधे प्रभावित हो चुके हैं।
पाकिस्तान-ईरान सीमा की फाइल फोटो।
घरेलू स्थिरता और शिया जनसंख्या
पाकिस्तान में ईरान के बाद दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी शिया आबादी रहती है (कुल जनसंख्या का लगभग 20%)। फरवरी 2026 में ईरान पर हुए हमलों और अयातुल्ला खामेनेई की मृत्यु के बाद पाकिस्तान के कई शहरों में हिंसक विरोध प्रदर्शन हुए थे। देश के भीतर किसी भी तरह के गृहयुद्ध या सांप्रदायिक तनाव को रोकने के लिए पाकिस्तान के लिए ईरान में शांति होना अनिवार्य है।
आर्थिक और ऊर्जा संकट
पाकिस्तान अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए खाड़ी देशों पर निर्भर है। होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के आंशिक रूप से बंद होने और युद्ध के कारण कच्चे तेल की कीमतों में उछाल ने पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को गंभीर संकट में डाल दिया है। वह इस युद्ध को जल्द से जल्द समाप्त करवाकर अपनी ऊर्जा आपूर्ति लाइन बहाल करना चाहता है।
खाड़ी देशों की ऊर्जा पर अत्यधिक निर्भरता
पाकिस्तान सालाना 5.7 बिलियन डॉलर से अधिक का कच्चा तेल आयात करता है, जिसमें मुख्य रूप से सऊदी अरब (लगभग 3.2 बिलियन डॉलर) और संयुक्त अरब अमीरात (लगभग 2.3 बिलियन डॉलर) शामिल हैं। यदि इसमें परिष्कृत (रिफाइंड) पेट्रोलियम उत्पादों को भी जोड़ दिया जाए, तो वित्त वर्ष 2025 में कुल आयात 10.71 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया था। FPCCI प्रमुख ने चेतावनी दी कि जहाजों के मार्ग बदलने के कारण माल ढुलाई (फ्रेट) और बीमा लागत में भारी वृद्धि हो सकती है। इससे यूरोपीय संघ (EU), ब्रिटेन और संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे प्रमुख बाजारों में पाकिस्तानी निर्यात पहुंचने में 15 से 20 दिन की अतिरिक्त देरी हो सकती है।सैन्य और कूटनीतिक संतुलन
पाकिस्तान एक बहुत ही कठिन स्थिति में फंसा हुआ है। सऊदी अरब के साथ रक्षा समझौता: सितंबर 2025 में हुए समझौते के तहत पाकिस्तान सऊदी अरब की रक्षा के लिए बाध्य है। यदि ईरान सऊदी अरब पर हमला करता है, तो पाकिस्तान को न चाहते हुए भी युद्ध में कूदना पड़ सकता है।पाकिस्तानी पीएम शहबाज शरीफ और आसिम मुनीर की फोटो।
रणनीतिक प्रासंगिकता की तलाश
2021 में अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी के बाद, पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भूमिका कुछ कम हो गई थी। इस मध्यस्थता के जरिए पाकिस्तान खुद को एक "क्षेत्रीय शांतिदूत" के रूप में स्थापित करना चाहता है, ताकि वह अमेरिका और खाड़ी देशों के लिए फिर से महत्वपूर्ण बन सके। कुल मिलाकर पाकिस्तान किसी तरह से इन दो देशों के बीच सुलह करवा कर दुनिया से वाहवाही लूटने को बेताब है। हालांकि, सयाने कह चुके हैं कि जिसका काम उसी को साजे और करे तो ठेंगा बाजे।
