Protests in Europe: आम तौर पर शांत रहने वाला यूरोप इन दिनों प्रदर्शनों की आग से झुलस रहा है। फ्रांस, इटली, पुर्तगाल, बुल्गारिया और बेल्जियम में सरकारों के खिलाफ छात्र और लोग सड़कों पर उतर आए हैं। इन देशों हिंसक और उग्र प्रदर्शन हुए हैं। कहीं लोग सरकार की नीतियों, महंगाई, बेरोजगारी से नाराज हैं तो कहीं छात्र शिक्षा व्यवस्था में सुधार और बढ़ी हुई फीस की मांग को लेकर सड़कों पर हैं। इन सभी देशों में सबसे ज्यादा उग्र एवं हिंसक प्रदर्शन फ्रांस में हुए हैं। यहां प्रदर्शनकारियों ने ऐतिहासिक एवं मशहूर टाउन हॉल को आग के हवाले कर दिया। कई जगह प्रदर्शनकारी, दंगाई में बदल गए। वाहनों, दफ्तरों, इमारतों में आग लगा दी और दुकानों में जमकर लूटपाट की। यह यही यूरोप है जिसे दुनिया स्थिरता और समृद्धि का मॉडल मानती थी। सवाल ये है कि महंगाई और बेरोजगारी के डर से उठा ये गुस्सा, क्या सिर्फ फ्रांस तक रुकेगा? या पूरा यूरोप इसकी चपेट में आने वाला है?
फ्रांस में 1800 लोग गिरफ्तार, 150 पुलिसकर्मी भी घायल
फ्रांस के गृह मंत्रालय के मुताबिक शनिवार को 5 लाख 50 हजार से ज्यादा लोग सड़कों पर उतरे। ये प्रदर्शन हफ्तों से चल रहे छात्र आंदोलन के बाद हुए। लेकिन दिन ढलते-ढलते ये मार्च हिंसा, लूटपाट और आगजनी में बदल गए। रिपोर्ट के मुताबिक कुछ हिंसक गुटों ने सरकारी इमारतों, लग्जरी दुकानों और सुपरमार्केट को निशाना बनाया और पुलिस की गाड़ियों और जवानों पर भी हमले किए। हिंसा और उपद्रव करने के आरोप में पुलिस ने 1800 लोगों को गिरफ्तार किया है, वहीं इस हिंसा में करीब 150 पुलिसकर्मी भी घायल हुए हैं।
फ्रांस के कई शहरों में हुए हिंसक प्रदर्शन
इन हिंसक प्रदर्शनों पर प्रधानमंत्री सेबेस्टियन लेकोर्नू ने कहा कि ये चमत्कार है कि नुकसान इससे ज्यादा नहीं हुआ। पेरिस, मार्सेल, नीस, नांत, बोर्दो, लिमोज, लिल, तूलूज और स्ट्रासबर्ग, नौ बड़े शहरों में दुकानें लूटी गईं। लिमोज में नकाबपोश प्रदर्शनकारियों की लगाई आग ने टाउन हॉल को लगभग पूरी तरह नष्ट कर दिया। मार्सेल और लिल के सिटी हॉल में तोड़फोड़ हुई, और लियों में पर्यटन कार्यालय जला दिया गया। राष्ट्रपति मैक्रों ने एक्स पर लिखा कि जिम्मेदार लोगों पर मुकदमा चलेगा और उन्हें सजा मिलेगी।
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ब्रसेल्स में फीस को लेकर छात्रों में गुस्सा
अब फ्रांस से बाहर चलते हैं। ब्रसेल्स में विश्वविद्यालय की रजिस्ट्रेशन फीस के खिलाफ छात्र पहले से हफ्तों से सड़कों पर हैं। यहां पुलिस ने आंसू गैस और वॉटर कैनन चलाए। पुलिस का आरोप है कि प्रदर्शनकारियों ने उन पर चीजें फेंकीं और आग लगाई।
लिस्बन में मकानों की कीमतें दोगुनी
पुर्तगाल की राजधानी लिस्बन में हजारों लोगों ने महंगाई, कम तनख्वाह और बड़े शहरों में घर न मिल पाने के खिलाफ मार्च किया। रिपोर्ट के मुताबिक 2017 से अब तक वहां मकानों की कीमतें दोगुनी से ज्यादा हो चुकी हैं। सोचिए, जिस रफ्तार से दाम बढ़े, उस रफ्तार से कमाई नहीं बढ़ी। सरकार का रुख सख्त रहा। संसदीय कार्य मंत्री ने कहा कि सरकार सड़क की चीखों के आगे नहीं झुकेगी। प्रदर्शनकारियों का जवाब था कि नेता जमीनी हकीकत से कटे हुए हैं। इटली के मिलान में एक शांतिपूर्ण मार्च, जो युद्धों और बढ़ती महंगाई के खिलाफ था, नकाबपोशों के पथराव और आगजनी में बदल गया। करीब 50 लोग हिरासत में लिए गए, जिनमें कई नाबालिग थे। प्रधानमंत्री मेलोनी ने कहा, प्रदर्शन करना अधिकार है, शहरों को आग लगाना नहीं। वहीं मिलान के मेयर ने कहा कि प्रदर्शन की वजहें समझ में आती हैं, लेकिन हिंसा जायज नहीं।
प्रदर्शनों का केंद्र बनकर उभर फ्रांस
HEC पेरिस के EU लॉ के प्रोफेसर अल्बर्टो अलेमानो के मुताबिक फ्रांस इसका 'एपिसेंटर' है और अब ये फ्रांस के बाहर फैलने के संकेत दे रहा है। उनका आकलन है कि ग्रीस, जर्मनी और ऑस्ट्रिया में आंदोलन की शुरुआती अवस्था दिख रही है और अगले हफ्ते वहां लामबंदी हो सकती है। ये प्रोफेसर अलेमानो का आकलन है, पुष्ट तथ्य नहीं। आने वाले दिनों में ही पता चलेगा कि भविष्यवाणी कितनी सही निकलती है। लेकिन अलेमानो की एक बात गौर करने लायक है। ये एक आंदोलन नहीं, बल्कि कई प्रदर्शन हैं जो एक साथ हो रहे हैं, पर इनकी शिकायतें साझा हैं: कमजोर फंडिंग वाली शिक्षा, बढ़ता रहन-सहन का खर्च, और छात्रों के लिए पढ़ाई के बाद अनिश्चित भविष्य।
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कोई नेता नहीं, बिखरा हुआ है प्रदर्शन!
यानी कोई एक नेता या संगठन नहीं है, कोई एक मांग नहीं है। ये बिना केंद्र का, बिखरा हुआ गुस्सा है, और यही इसे सरकारों के लिए संभालना मुश्किल बनाता है कि किससे बात करें, किसे मनाएं? समय भी बेहद नाज़ुक है। अलेमानो के मुताबिक यूरोप अगले 12 महीनों में राष्ट्रीय चुनावों के एकअभूतपूर्व सुपर-साइकिल की ओर बढ़ रहा है, जिसमें स्पेन, फ्रांस, इटली और पोलैंड में वोटिंग तय है। उनके शब्दों में, ये सारे प्रदर्शन अब राजनीतिक चर्चा के केंद्र में रहेंगे। मतलब साफ है। जो सरकारें आज 'सड़क के आगे नहीं झुकेंगे' कह रही हैं, उन्हें कल वोटरों के आगे झुकना पड़ सकता है।
अब सवाल कि भारत के लिए इसके क्या मायने हैं?
पहला, यूरोप भारत का एक अहम आर्थिक और रणनीतिक साझेदार है। वहां राजनीतिक अस्थिरता बढ़ी, तो व्यापार और निवेश पर बातचीत की गति और सरकारों की प्राथमिकताएं प्रभावित हो सकती हैं। दूसरा, यूरोप में पढ़ने या काम करने वाले भारतीय छात्रों और पेशेवरों के लिए भी हालात पर नजर रखना जरूरी है। खासकर वहां जहां शिक्षा-फीस और रहन-सहन की लागत बड़ा मुद्दा है। तीसरा, रणनीतिक नजरिए से, जब यूरोप घरेलू मोर्चे पर उलझता है, तो वैश्विक मंचों पर उसकी भूमिका और ध्यान बंट सकता है। यूरोप में गुस्सा असली है, कारण साझा हैं, और चुनावी साल इसे और भड़का सकता है। अगले कुछ दिन तय करेंगे कि ये फ्रांस तक सीमित रहेगा या पूरे महाद्वीप का आंदोलन बनेगा।
मिलान में दुकानों में की लूटपाट
मिलान के मध्य हिस्से में शनिवार को दंगाइयों ने पुलिस से झड़प के बाद दुकानों में लूटपाट की और संपत्तियों में आग लगा दी। हिंसा के कारण पियाजा डेल डुओमो चौक और महंगी वस्तुओं की दुकानों वाला एक बाजार खाली हो गया, जहां आमतौर पर बड़ी संख्या में खरीदारी करने वाले लोग मौजूद रहते हैं। अलग-अलग जगहों पर युद्ध और बढ़ती महंगाई के खिलाफ निकाला गया मार्च शांतिपूर्ण तरीके से शुरू हुआ था लेकिन बाद में नकाब पहने प्रदर्शनकारियों ने दंगा नियंत्रण पुलिस पर पत्थर और अन्य चीजें फेंकीं। घटना के बाद सामने आईं तस्वीरों में काराबिनिएरी पुलिस की एक गाड़ी बुरी तरह क्षतिग्रस्त दिखाई दी। भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पुलिस ने पानी की बौछार करने वाली गाड़ियों और आंसू गैस का इस्तेमाल किया।
