Vaishali Boat Tragedy: बिहार के वैशाली जिले के राघोपुर दियारा क्षेत्र (रामपुर श्यामचंद पंचायत) में मंगलवार रात गंगा नदी में एक दर्दनाक नाव हादसे ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। एक छोटी सी नाव पर सवार होकर पड़ोसी गांव में श्राद्ध का भोज खाने जा रहे 13 मासूम बच्चों की पानी में डूबने से मौत हो गई। सभी मृतक बच्चों की उम्र 15 साल से कम थी। इस हृदयविदारक घटना ने जहां 13 परिवारों के चिराग बुझा दिए हैं, वहीं एक बार फिर यह बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि इन मौतों का असली जिम्मेदार कौन है? और इन बेकसूर मासूमों की क्या गलती थी?
वैशाली नाव हादसे का जिम्मेदार कौन?
कैसे हुआ हादसा?
मंगलवार रात करीब 8:30 बजे भगतान टोला स्थित माता महारानी स्थान के पास से 20 से 25 लोग (जिनमें अधिकांश बच्चे थे) एक छोटी देसी नाव पर सवार होकर नदी पार भोज खाने जा रहे थे। नदी के बीच में पहुंचते ही अचानक नाव का संतुलन बिगड़ गया और वह गंगा की धारा में पलट गई। अंधेरा और पानी का तेज बहाव होने के कारण बच्चों को संभलने का मौका तक नहीं मिला। स्थानीय गोताखोरों और प्रशासन की मदद से चलाए गए रेस्क्यू ऑपरेशन में 13 बच्चों के शव बरामद किए गए, जबकि 7 बच्चों को बचाकर पटना के एनएमसीएच (NMCH) अस्पताल में भर्ती कराया गया है।
हादसे का जिम्मेदार कौन?
एक बार फिर सवाल उठ रहा है कि इतने बड़े हादसे का जिम्मेदार कौन है? क्या प्रशासन की सुस्ती-लापरवाही या आम आदमी की समस्याओं को अनदेखी करने की आदत? हर सरकार में एक जैसे हादसे बताते हैं कि सरकारें कोई भी हो, आम आदमी को इसी तरह के हादसों से दो-चार होना है। इस मामले में किस तरह की लापरवाही रही, और क्या सवाल सरकार पर उठ रहे हैं, जानिए। सिस्टम एक बार फिर पूरी तरह नाकाम साबित हुआ है और इसके सुधरने की सूरत फिलहाल नहीं दिखती। मुआवजे का मरहम परिजनों को मिले दर्द को कम नहीं कर सकता और सवाल अपनी जगह बरकरार हैं कि ऐसे हादसे रोकने के लिए क्या कदम उठाए गए। क्या हादसा रोका जा सकता था?
ओवरलोडिंग पर क्यों नहीं कसता शिकंजा?
एक छोटी-सी देसी नाव में क्षमता से अधिक बच्चों को बैठा दिया गया। दियारा इलाकों में लाइफ जैकेट या सुरक्षा उपकरणों के बिना नाव संचालन आम बात हो चुकी है। क्या स्थानीय प्रशासन और नाविकों को ओवरलोडिंग पर रोक लगाने की सुध केवल बड़े हादसों के बाद ही आती है?
दियारा में आवागमन के पुख्ता इंतजाम क्यों नहीं?
राघोपुर जैसे दियारा क्षेत्रों में दशकों से सड़क और पुल का अभाव रहा है। यहां के लोग रोजमर्रा की जरूरतों और सामाजिक आयोजनों के लिए आज भी जान जोखिम में डालकर जर्जर नावों के सहारे नदियां पार करने को मजबूर हैं। बुनियादी ढांचे की यह लाचारी कब खत्म होगी?
आपदा प्रबंधन और गश्त का अभाव
गंगा नदी के इतने संवेदनशील इलाकों में रात के वक्त किसी सुरक्षा मानक जैसे लाइट, लाइफ जैकेट के बिना नावें कैसे चल रही थीं? स्थानीय पुलिस और जल परिवहन विभाग की निगरानी कहां थी?
मुआवजे का ऐलान, पर सवालों के जवाब बाकी
हादसे के बाद राजनीतिक गलियारों से लेकर केंद्र और राज्य सरकार तक में हलचल मच गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने घटना पर गहरा दुख जताते हुए मृतकों के परिजनों को 'प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष' (PMNRF) से ₹2-2 लाख और घायलों को ₹50,000 की अनुग्रह राशि देने की घोषणा की।
मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने हादसे को अत्यंत हृदयविदारक बताते हुए राज्य सरकार की ओर से हर मृतक के परिवार को ₹4-4 लाख का मुआवजा देने का ऐलान किया। पूर्व उपमुख्यमंत्री व स्थानीय विधायक तेजस्वी यादव ने दुख प्रकट करते हुए पीड़ित परिवारों तक तुरंत राहत पहुंचाने और मामले की जांच की मांग की।
मासूमों का क्या कसूर था?
जिन हाथों में अभी खिलौने और किताबें होनी चाहिए थीं, वे पानी के तेज बहाव में जीवन की जंग हार गए। 13 हंसते-खेलते बच्चों का कसूर सिर्फ इतना था कि वे अपने गांव-टोले की परंपरा के मुताबिक दोस्तों के साथ भोज खाने जा रहे थे। उन्हें क्या मालूम था कि जिस नाव पर वे सवार हो रहे हैं, वह उनकी जिंदगी का आखिरी सफर साबित होगी। मुआवजे की रकम से किसी मां की गोद का सूनापन तो नहीं भरा जा सकता। सवाल वही कायम है, आखिर कब तक सरकारी महकमे, जर्जर नावें और प्रशासनिक लापरवाही मासूमों की बलि लेती रहेगी?
