रियाद के किंग खालिद इंटरनेशनल एयरपोर्ट (King Khalid International Airport) पर यमन के ईरान समर्थित हूती (Houthis) विद्रोहियों द्वारा किए गए मिसाइल/प्रोजेक्टाइल हमलों में बड़े पैमाने पर जान-माल का नुकसान हुआ है। इस बड़े हमले ने सऊदी अरब को बहुत बड़ा नुकसान पहुंचाया है, न सिर्फ आर्थिक नुकसान बल्कि उसकी साख पर भी सवाल खड़ा हो गया है। हूती विद्रोहियों से दुश्मनी अब सऊदी अरब को भारी पड़ने लगी है। सऊदी अरब पर किया गया हूतियों का यह अब तक का सबसे बड़ा हमला है। इसी के साथ रियाद एयरपोर्ट एक बार फिर चर्चा में आ गया है। कितना बड़ा है रियाद एयरपोर्ट, सऊदी अरब के लिए क्यों अहम है और हूती हमले का क्या असर होगा? विस्तार से समझते हैं।
हूती विद्रोहियों के प्रोजेक्टाइल और मिसाइल हमले
यमन के ईरान समर्थित हुती विद्रोहियों ने रियाद एयरपोर्ट के पैसेंजर टर्मिनल और चेक-इन क्षेत्रों को निशाना बनाकर प्रोजेक्टाइल/मिसाइल हमले किए। इन हमलों में हैदराबाद के एक भारतीय आईटी पेशेवर समेत कई लोगों की जान चली गई, और सैकड़ों लोग घायल हुए। इसके अलावा दम्माम के किंग फहद एयरपोर्ट को भी निशाना बनाया गया। शुरुआती और आधिकारिक रिपोर्ट्स के अनुसार इन हमलों में कुल 13 लोगों की मौत हुई है, जबकि 300 से अधिक लोग घायल हुए। इस हमले में हैदराबाद (मेहदीपटनम) के रहने वाले 46 वर्षीय आईटी पेशेवर मोहम्मद यूसुफ की मौत हो गई। वे अपने परिवार के साथ उमरा पर गए थे और मदीना जाने के लिए एयरपोर्ट पर चेक-इन काउंटर के पास इंतजार कर रहे थे। इस हमले में कुल 11 भारतीय नागरिक घायल हुए थे। इनमें से 3 भारतीय अभी भी आईसीयू (ICU) में भर्ती हैं, 2 सामान्य वार्ड में हैं और बाकी को अस्पताल से छुट्टी मिल चुकी है। मृतक मोहम्मद यूसुफ के परिवार के सदस्य भी इस हमले में घायल हुए हैं, जिनका इलाज रियाद के अस्पतालों में चल रहा है।
कितना बड़ा है रियाद एयरपोर्ट?
रियाद का किंग खालिद इंटरनेशनल एयरपोर्ट दुनिया के सबसे बड़े हवाई अड्डों में से एक है, जो लगभग 375 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्रफल में फैला हुआ है। इसमें पांच बड़े पैसेंजर टर्मिनल, एक शानदार रॉयल टर्मिनल, दो विशाल समानांतर रनवे और दुनिया के सबसे ऊंचे एयर ट्रैफिक कंट्रोल टॉवर में से एक शामिल है। यह सालाना करोड़ों यात्रियों (लगभग 3 करोड़ से अधिक) और भारी मात्रा में कार्गो का संचालन करता है। यह सऊदी अरब के विमानन हब और वैश्विक उड़ानों का मुख्य केंद्र है।
सऊदी के लिए क्यों है बेहद अहम?
रियाद सऊदी अरब का राजनीतिक और प्रशासनिक केंद्र है। यह एयरपोर्ट देश की राजधानी को दुनिया के प्रमुख व्यावसायिक और कूटनीतिक केंद्रों से जोड़ता है। सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के 'विजन 2030' के तहत देश को पर्यटन, व्यापार और विदेशी निवेश का वैश्विक केंद्र बनाने की योजना है। इस एयरपोर्ट का सुचारू रूप से चलना इस आर्थिक कायाकल्प के लिए रीढ़ की हड्डी जैसा है।
इन हमलों के भू-राजनीतिक और आर्थिक असर
अंतरराष्ट्रीय उड़ानों और नागरिक अड्डों को निशाना बनाना सीधे तौर पर जिनेवा कन्वेंशन और अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन है। इससे दुनिया भर के यात्रियों और प्रवासी कामगारों विशेषकर भारतीयों में सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ गई है। सऊदी के नेतृत्व वाला गठबंधन इन हमलों को युद्ध अपराध करार दे रहा है। इससे यमन में एक बार फिर सैन्य तनाव बढ़ने और संघर्ष विराम के पूरी तरह टूटने का खतरा पैदा हो गया है। इस तरह के हमलों से खाड़ी देशों की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठते हैं, जिससे विदेशी निवेश, पर्यटन और शेयर बाजारों पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। भारत जैसे देशों के लिए, जिनके लाखों नागरिक वहां काम करते हैं, ऊर्जा सुरक्षा और प्रवासियों की सुरक्षा प्राथमिकता बन जाती है।
हूती विद्रोहियों और सऊदी अरब की दुश्मनी क्यों है?
सऊदी अरब और यमन के हूती विद्रोहियों के बीच की दुश्मनी दशकों पुरानी है, जो मुख्य रूप से धार्मिक, राजनीतिक और क्षेत्रीय वर्चस्व की लड़ाई पर आधारित है। इसे ऐसे समझते हैं -
धार्मिक और वैचारिक मतभेद (Shia vs Sunni)
हूती विद्रोही मुख्य रूप से शिया इस्लाम की एक उप-शाखा 'जैदी' (Zaydi) समुदाय से ताल्लुक रखते हैं। यमन में इनका प्रभाव ऐतिहासिक रूप से रहा है।
वहाबी/सुन्नी प्रभाव
दूसरी ओर, सऊदी अरब सुन्नी इस्लाम (विशेष रूप से रूढ़िवादी वहाबी विचारधारा) का नेतृत्व करता है। सऊदी अरब हमेशा से मध्य पूर्व में शिया प्रभाव (विशेषकर ईरान समर्थित ताकतों) के प्रसार को अपने राष्ट्रीय सुरक्षा के खिलाफ मानता रहा है।
ईरान का प्रॉक्सी वॉर
हूती विद्रोहियों को हथियार, फंडिंग और रणनीतिक समर्थन ईरान से मिलता है, जो सऊदी अरब का कट्टर क्षेत्रीय दुश्मन है। सऊदी अरब को इस बात का हमेशा डर रहता है कि उसकी दक्षिणी सीमा (यमन) पर ईरान समर्थित हूती सरकार बनने से उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी। यही वजह है कि सऊदी अरब हूती विद्रोहियों को ईरान के हाथों की कठपुतली मानता है।