हाल ही में राजधानी दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेंद्र कुमार के खिलाफ हुए विरोध प्रदर्शनों और इस दौरान हुई बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियों के बाद देश में एहतियातन हिरासत यानी प्रिवेंटिव डिटेंशन (Preventive Detention) और निजी आजादी को लेकर एक बार फिर बड़ी कानूनी बहस छिड़ गई है। खास तौर पर कॉकरोच जनता पार्टी नेताओं अभिजीत दीपके, सौरव दास और आशुतोष रांका को एहतियातन हिरासत में लिए जाने के मामले ने खासा तूल पकड़ लिया है। अब अदालतों और कानूनी विश्लेषकों के सामने सवाल खड़ा हो गया है कि आखिर किसी संभावित खतरे की आशंका की सीमा कहां तक वैध है और क्या यह नागरिकों की आजादी पर असर डालती है? सीजेपी नेताओं की हिरासत मामले में एक बार फिर प्रिवेंटिव डिटेंशन को चर्चा में ला दिया है। क्या है प्रिवेंटिव डिटेंशन और किन हालात में इसे लागू किया जाता है, क्या हैं इसके नियम-कानून, विस्तार से समझते हैं।
क्या होता है प्रिवेंटिव डिटेंशन?
प्रिवेंटिव डिटेंशन वह कानूनी प्रक्रिया है जिसमें किसी व्यक्ति को किसी अपराध करने के बाद सजा देने के लिए नहीं, बल्कि भविष्य में कोई संभावित अपराध या कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ने से रोकने के लिए पहले ही हिरासत में ले लिया जाता है। यह सामान्य गिरफ्तारी, यानी जो किसी अपराध के घटित होने के बाद की जाती है, उससे पूरी तरह अलग है। यह सिर्फ आशंका के आधार पर होती है कि वह व्यक्ति भविष्य में कोई अपराध कर सकता है, सार्वजनिक शांति भंग कर सकता है या देश की सुरक्षा के लिए खतरा बन सकता है। इसमें व्यक्ति को बिना ट्रायल हिरासत में रखा जा सकता है।
क्या है प्यूनिटिव डिटेंशन?
जहां प्रिवेंटिव डिटेंशन में किसी व्यक्ति को कानून तोड़ने की आशंका में पहले ही हिरासत में लिया जाता है, वहीं पुनेटिव डिटेंशन (Punitive Detention) यानी सामान्य गिरफ्तारी किसी अपराध के लिए उठाए जाने वाला कदम है। इसमें पुलिस पहले अपराध की जांच करती है, आरोपी को गिरफ्तार करती है और फिर अदालत में मुकदमा चलता है और दोष साबित होने पर सजा मिलती है।
क्या हैं संवैधानिक प्रावधान?
- भारतीय संविधान का अनुच्छेद 22 (Article 22) प्रिवेंटिव डिटेंशन के मामलों में सुरक्षा उपाय और नियम तय करता है।
- किसी भी व्यक्ति को बिना किसी सलाहकार बोर्ड की मंजूरी के 3 महीने से अधिक समय तक हिरासत में नहीं रखा जा सकता। अगर अवधि बढ़ानी हो, तो हाईकोर्ट के न्यायाधीशों या योग्य व्यक्तियों का बोर्ड इसकी वजह को सही ठहराए।
- हिरासत में लिए गए व्यक्ति को जल्द से जल्द यह बताना अनिवार्य होता है कि उसे किस आधार पर हिरासत में लिया गया है। हालांकि राष्ट्रीय सुरक्षा या सार्वजनिक हित से जुड़े मामलों में कुछ तथ्यों को छिपाया जा सकता है।
- हिरासत में लिए गए व्यक्ति को सरकार या संबंधित प्राधिकरण के समक्ष अपनी गिरफ्तारी के खिलाफ अपील करने का अवसर दिया जाना चाहिए।
मुख्य कानूनी नियम और प्रावधान? भारत में प्रिवेंटिव डिटेंशन की शक्ति केंद्र और राज्य सरकारों को कुछ विशेष कानूनों के तहत मिलती है।
राष्ट्रीय सुरक्षा कानून, 1980 (NSA)
इसके तहत देश की सुरक्षा या सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के खतरे को देखते हुए किसी व्यक्ति को बिना जमानत के महीनों तक हिरासत में रखा जा सकता है।
आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC / BNSS)
इसके तहत पुलिस अधिकारियों को यह शक्ति मिलती है कि अगर उन्हें अंदेशा हो कि कोई व्यक्ति संज्ञेय अपराध करने वाला है और उसे रोकने का कोई अन्य तरीका नहीं है, तो वे बिना मजिस्ट्रेट के आदेश या वारंट के भी उसे हिरासत में ले सकते हैं (जैसे धारा 151 CrPC)। अन्य विशिष्ट कानून जैसे यूएपीए (UAPA) या राज्य-विशेष सुरक्षा अधिनियम भी इसमें शामिल हैं।
क्या है न्यायपालिका का रुख?
चूंकि प्रिवेंटिव डिटेंशन सीधे तौर पर नागरिकों की निजी आजादी (Article 21) पर असर डालता है, इसलिए सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट ने कई बार स्पष्ट किया है कि यह शक्ति किसी भी अधिकारी या सरकार के लिए असीमित लाइसेंस नहीं है। इसका इस्तेमाल सिर्फ असाधारण परिस्थितियों में ही किया जाना चाहिए। हिरासत के आधार स्पष्ट और कानूनी रूप से तर्कसंगत होने चाहिए, अन्यथा अदालतों द्वारा ऐसे हिरासत आदेशों को रद्द कर दिया जाता है।
मुख्य विवाद और निजी आजादी का सवाल
- इससे जुड़े मुख्य विवाद और चिंताएं बरकरार हैं मानवाधिकार कार्यकर्ता और कानूनी विशेषज्ञ अक्सर प्रिवेंटिव डिटेंशन की आलोचना करते हैं।
- यह सीधे तौर पर संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) को प्रभावित करता है।
- कई बार राजनीतिक विरोधियों, प्रदर्शनकारियों या असहमति जताने वाले लोगों की आवाज दबाने के लिए प्रशासनिक स्तर पर इसका दुरुपयोग होने के आरोप लगते हैं।
- हिरासत में लिए गए व्यक्ति को शुरुआती चरण में कानूनी मदद या वकील की सुविधा आसानी से नहीं मिल पाती, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।
क्या है CJP नेताओं को हिरासत में लेने का मामला?
बहस की शुरुआत अभिजीत दीपके, सौरव दास और आशुतोष रांका को हिरासत में लिए जाने से हुई। 10 अक्तूबर को दिल्ली एयरपोर्ट पर विमान के अंदर से ही इन तीनों को हिरासत में ले लिया गया। अगले दिन इन्हें मजिस्ट्रेट की अदालत में पेश किया गया जहां से निजी बांड पर तीनों को रिहा कर दिया गया। लेकिन 13 अक्तूबर को अंजिक्य शिंदे, आशुतोष रांका और सौरव दास प्रतिबंधित जंतर-मंतर पर पहुंचकर नारेबाजी करने लगे तो इन्हें दोबारा प्रिवेंटिव हिरासत में ले लिया गया।
दिल्ली पुलिस के अधिकारियों के मुताबिक, 13 अक्टूबर की सुबह सौरव दास, आशुतोष रांका, अजिंक्य शिंदे और CJP के 11 अन्य सदस्य जंतर-मंतर पहुंचे। पुलिस जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल की सूची से डिनोटिफाई कर चुकी है, ऐसे में यहां पहुंचकर नारेबाजी करना कानून का उल्लंघन माना गया। इनके खिलाफ प्रतिबंधित इलाके में जबरन घुसने और पुलिस के काम में बाधा डालने जैसे आरोप लगाए गए। पुलिस ने रांका और सौरव को रिपीट ऑफेंडर करार दिया। अगले दिन रांका और सौरव को स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट की अदालत में पेश किया गया जहां से उन्हें 5 दिन की न्यायिक हिरासत में तिहाड़ जेल भेज दिया। वहीं, पहली बार हिरासत में लिए गए अंजिक्य शिंदे को पुलिस ने निजी बॉन्ड और शर्तों पर रिहा कर दिया। इस घटनाक्रम के बाद केंद्र सरकार विपक्ष के निशाने पर है।