Gen Z Opinion on Dowry: इस समय हर किसी की जुबान पर ट्विशा शर्मा ( Twisha Sharma) और दीपिका नागर (Deepika Nagar) का नाम छाया हुआ है। हर रोज इनकी मौत से जुड़े मामले में कलेजा चीर देने वाले नए-नए अपडेट सामने आ रहे हैं। मेन स्ट्रीम मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक हर कहीं गुस्से की लहर दिखाई देती है। लोग दोषियों को सजा देने की मांग कर रहे हैं। शादी के वक्त नई उमंगों के साथ ही बेहतरीन जिंदगी के सपने जब चंद महीनों में ही फांसी के फंदे पर दम तोड़ दें तो लोगों का आक्रोशित होना स्वाभाविक ही है। हालांकि भारत में दहेज के उन्मूलन के लिए दशकों से कानून, अभियान और सामाजिक आंदोलन चलते रहे हैं। इसके बावजूद शादी के नाम पर पैसे, गाड़ी, घर, गिफ्ट और महंगे खर्च की मांग आज भी कई परिवारों के लिए बोझ बनी हुई है। इन सबके बीच अब सवाल यह है कि इंटरनेट, सोशल मीडिया और आधुनिक शिक्षा के दौर में बड़ी हो रही 'जेन Z’ यानी 1997 से 2012 के बीच जन्मी पीढ़ी दहेज को कैसे देखती है?
दहेज प्रथा (Dowry System in India) को लेकर जेन जेड क्या सोचती है, ये जानने के लिए हमने इस आयु वर्ग के लड़के और लड़कियों से बात की। जिसमें निकलकर सामने आया है कि बड़ी संख्या में जेन Z दहेज को सिर्फ पुरानी परंपरा नहीं,बल्कि आर्थिक और मानसिक शोषण का माध्यम मानती है। आइए जानते हैं इस कुप्रथा को लेकर क्या कहती है जेड जेनरेशन...
'दहेज अब स्टेटस सिंबल बन चुका है’
संध्या सिंह कहती हैं कि पहले दहेज को बेटी को दिए जाने वाले उपहार की तरह देखा जाता था, लेकिन अब यह सामाजिक प्रतिष्ठा का पैमाना बन गया है। जिस लड़के को ज्यादा दहेज मिलता है, उसे ज्यादा “काबिल” माना जाता है। उनके मुताबिक, कई माता-पिता बेटी की सुरक्षा और खुशहाली के डर से दहेज देते हैं, लेकिन यह समाज की विफलता को दिखाता है। संध्या मानती हैं कि दहेज खत्म करने के लिए इसे सामाजिक कलंक की तरह देखना होगा और महिलाओं को इतना शिक्षित व आत्मनिर्भर बनाना होगा कि वे इसके खिलाफ खुलकर आवाज उठा सकें।'दहेज एक सामूहिक उत्पीड़न’
दिल्ली विश्वविद्यालय में विधि के छात्र आकाश सिंह दहेज को “सामूहिक उत्पीड़न” बताते हैं। उनका कहना है कि दहेज का खेल सिर्फ पुरुष प्रधान सोच तक सीमित नहीं है, बल्कि कई बार महिलाएं भी इस व्यवस्था को आगे बढ़ाने में भूमिका निभाती हैं। वे कहते हैं कि आज भी लोग कानून से बचने के लिए दहेज को “गिफ्ट डीड” का नाम दे देते हैं। आकाश सवाल उठाते हैं कि 21वीं सदी में भी हर 90 मिनट में दहेज से एक महिला की जान क्यों जा रही है? क्या समाज अब भी लालच को परंपरा का नाम देकर बचा रहा है?'अब जीवनसाथी चाहिए,पैसों का पैकेज नहीं’
वहीं, लखनऊ की रहने वाली मान्सी शुक्ला का मानना है कि दहेज की जड़ में लड़कों को लड़कियों से ज्यादा महत्व देने वाली सोच छिपी हुई है। वे कहती हैं कि पहले माता-पिता बेटी को प्रेम से कुछ भेंट देते थे, लेकिन अब पढ़ा-लिखा वर्ग भी इसे अपना अधिकार समझने लगा है। दहेज जैसी कुरीति को खत्म करने के लिए समाज की सोच बदलनी होगी, जिसके लिए बेटियों को शिक्षित और आत्मनिर्भर बनना होगा।'दहेज ना लेंगे-न देंगे' का संकल्प लेना होगा। मान्सी के मुताबिक, Gen Z अब सोशल मीडिया और जागरूकता अभियानों के जरिए दहेज के खिलाफ आवाज उठा रही है। उनका कहना है कि अब युवाओं को “जीवनसाथी चाहिए, पैसों का पैकेज नहीं”।
'शादी बिजनेस डील नहीं’
शिवम गर्ग साफ शब्दों में कहते हैं कि शादी दो लोगों और दो परिवारों का रिश्ता है, कोई व्यापार नहीं। उनके मुताबिक, जिस लड़की के साथ पूरी जिंदगी बितानी हो,उसके परिवार पर आर्थिक बोझ डालकर रिश्ते की शुरुआत करना गलत है। वे कहते हैं कि अगर कोई अपनी खुशी से कुछ देता है तो अलग बात है,लेकिन दहेज मांगना या दबाव बनाना पूरी तरह गलत है। आज का युवा सम्मान और समझदारी पर आधारित रिश्ता चाहता है,न कि पैसों पर।
'दहेज आत्मसम्मान पर चोट’
गोरखपुर की रहने वाली अस्मिता दहेज को लड़कियों के आत्मसम्मान पर किया गया हमला करार देती हैं। उनका मानना है कि आज दहेज सिर्फ पैसों की मांग नहीं रह गया, बल्कि यह लड़की के आत्मसम्मान पर सीधा हमला है। उनके अनुसार, लड़की को यह महसूस कराया जाता है कि बिना दहेज उसकी कोई कीमत नहीं। वे कहती हैं कि पढ़ी-लिखी और आत्मनिर्भर लड़कियों को ऐसे परिवारों से शादी ही नहीं करनी चाहिए जो दहेज की मांग करते हैं। इसके साथ ही सबसे दुख की बात यह है कि लड़की के मां-बाप अपनी हैसियत से बढ़कर सब कुछ देने की कोशिश करते हैं। वह इस गलतफहमी में रहते हैं कि दहेज देने से उनकी बेटी खुश रहेगी।
2024 में दहेज के कारण हुईं 5737 मौतें।
'तरीके बदल गए, मानसिकता नहीं’
वहीं, सीतापुर की रहने वाली प्रिया बाजपेई कहती हैं कि दहेज लेने का तरीका जरूर बदल गया है,लेकिन मानसिकता आज भी वही है। उनके मुताबिक,अच्छे पद या सरकारी नौकरी वाले लड़कों के लिए अप्रत्यक्ष रूप से ज्यादा अपेक्षाएं रखी जाती हैं। कई बार दबाव में शादी होने के बाद लड़कियों को मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना झेलनी पड़ती है।
'मीम्स और रील्स ने दहेज को नॉर्मल बना दिया’
हरियाणा के पानीपत से आयुष आनंद सोशल मीडिया की भूमिका पर चिंता जताते हैं। उनका कहना है कि आज कई मीम्स और रील्स में दहेज को मजाक की तरह पेश किया जाता है। “गाड़ी तो शादी में मिल जाएगी” जैसे संवाद युवाओं के दिमाग में गलत संदेश डालते हैं कि दहेज मांगना सामान्य बात है। आयुष मानते हैं कि सोशल मीडिया जागरूकता का माध्यम बनने के बजाय कई बार इस कुप्रथा को हल्के अंदाज में पेश कर रहा है।
'दोहरी सोच से जिंदा है दहेज’
भोपाल के प्रिंस सक्सेना का कहना है कि समाज की दोहरी मानसिकता ही दहेज को जिंदा रखे हुए है। जब बेटी की शादी होती है तो दहेज बोझ लगता है, लेकिन बेटे की शादी में वही लोग इसे परंपरा और सम्मान का नाम देने लगते हैं।
'गिफ्ट के नाम पर जारी है दहेज’
रीवा के सुधीर सिंह कहते हैं कि लोग अब सीधे “दहेज” शब्द बोलने से बचते हैं, लेकिन “गिफ्ट” कहकर उसे शान का हिस्सा बना देते हैं। वे मानते हैं कि यही वजह है कि यह कुप्रथा खत्म होने के बजाय नए रूपों में फैल रही है। उनके अनुसार, दहेज घरेलू कलह और टूटते परिवारों की बड़ी वजह बन चुका है।
दहेज के कारण मौतें।
शिक्षा और आर्थिक स्वतंत्रता ने बदली सोच
जेन Z पहले की पीढ़ियों की तुलना में ज्यादा शिक्षित, डिजिटल और करियर-केंद्रित मानी जाती है। लड़कियां अब आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने पर जोर दे रही हैं।वहीं कई युवा पुरुष भी सार्वजनिक रूप से दहेज लेने के खिलाफ अभियान चला रहे हैं। नौकरी, सैलरी और सामाजिक प्रतिष्ठा के आधार पर 'रेट' तय करने की मानसिकता को नई पीढ़ी पिछड़ी सोच मानती है।
सोशल मीडिया ने बढ़ाई जागरूकता
इंस्टाग्राम, यूट्यूब और एक्स जैसे प्लेटफॉर्म पर दहेज विरोधी कंटेंट तेजी से बढ़ा है। शादी टूटने, दहेज प्रताड़ना और घरेलू हिंसा से जुड़े मामलों पर खुलकर चर्चा होने लगी है। इससे युवाओं में जागरूकता बढ़ी है कि दहेज सिर्फ आर्थिक लेनदेन नहीं, बल्कि महिलाओं के खिलाफ भेदभाव की जड़ भी है।
लेकिन पूरी तरह खत्म नहीं हुई समस्या
हालांकि तस्वीर पूरी तरह बदली नहीं है। छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में आज भी दहेज को परंपरा या सम्मान के नाम पर सही ठहराया जाता है। कई परिवारों में युवा दहेज के खिलाफ होते हुए भी सामाजिक दबाव के कारण खुलकर विरोध नहीं कर पाते। कुछ मामलों में दहेज ने सिर्फ अपना रूप बदला है। अब इसे 'गिफ्ट', 'सेटअप', 'शादी में मदद' जैसे नए नामों से पेश किया जाता है।
नई पीढ़ी रिश्तों में बराबरी, सहमति और व्यक्तिगत सम्मान को ज्यादा महत्व दे रही है। यही कारण है कि दहेज के खिलाफ आवाज अब सिर्फ सामाजिक कार्यकर्ताओं तक सीमित नहीं रही, बल्कि युवाओं की रोजमर्रा की बातचीत का हिस्सा बनती जा रही है। समाजशास्त्री मानते हैं कि जेन Z पहली ऐसी पीढ़ी है जो परंपरा को आंख बंद करके स्वीकार करने के बजाय सवाल पूछ रही है। यही बदलाव दहेज जैसी कुप्रथा के खिलाफ सबसे बड़ा हथियार बन सकता है।
