अमेरिका ने एक बार फिर ‘टैरिफ बम’ फोड़ने का मन बना लिया है। एक बार फिर ट्रंप प्रशासन ने रूस के साथ-साथ भारत और चीन जैसे देशों पर दबाव बढ़ाने की तैयारी की है। दरअसल, अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने यूक्रेन युद्ध को लेकर रूस पर नकेल कसने के लिए एक महत्वपूर्ण प्रतिबंध विधेयक को भारी बहुमत से पारित कर दिया है।
जानें रूस पर ट्रंप के ‘टैरिफ प्लान’ के पीछे इस डेमोक्रेट सांसद रिचर्ड ब्लुमेंथल की क्या है भूमिका। AI IMAGE
प्रतिनिधि सभा में 159 के मुकाबले 262 वोटों से पारित हुए ‘लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट’ का मकसद रूसी अधिकारियों, वित्तीय संस्थानों और उसकी अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ाना है। सीनेट से पहले ही मंजूरी पा चुका यह विधेयक अब अंतिम मंजूरी के लिए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पास जाएगा।
इस विधेयक में रूस से बड़े पैमाने पर तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर अतिरिक्त शुल्क लगाने का प्रावधान है। इसी वजह से भारत पर भी इसके संभावित असर की चर्चा हो रही है। इस विधेयक को आगे बढ़ाने वाले प्रमुख अमेरिकी सांसदों में रिचर्ड ब्लुमेंथल का नाम भी शामिल है।
कौन हैं रिचर्ड ब्लुमेंथल?
रिचर्ड ब्लुमेंथल अमेरिका की डेमोक्रेटिक पार्टी के वरिष्ठ सांसद हैं और कनेक्टिकट का प्रतिनिधित्व करते हैं। वह अमेरिकी सीनेट के सदस्य हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद से वह यूक्रेन के समर्थन और रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाने की वकालत करते रहे हैं।
डेमोक्रेटिक पार्टी के वरिष्ठ सांसद रिचर्ड ब्लुमेंथल की फाइल फोटो। AP
इस विधेयक को लेकर उनकी खास भूमिका इसलिए है क्योंकि उन्होंने रिपब्लिकन सांसद लिंडसे ग्राहम के साथ मिलकर रूस के खिलाफ नए प्रतिबंधों की योजना पर लंबे समय तक काम किया। अमेरिकी सरकारी रिकॉर्ड में भी रिचर्ड ब्लुमेंथल इस विधेयक के प्रमुख सह-प्रायोजकों में शामिल हैं।
लिंडसे ग्राहम के साथ कैसे जुड़े?
इस कानून की मूल पहल रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने की थी। ब्लुमेंथल उनके साथ मिलकर इस प्रस्ताव को द्विदलीय समर्थन दिलाने की कोशिश कर रहे थे। 2025 में दोनों ने रूस और उसके सहयोगियों पर प्राथमिक और द्वितीयक प्रतिबंध लगाने से जुड़ी पहल शुरू की थी। इसके बाद करीब एक साल तक उन्होंने कांग्रेस और अमेरिकी प्रशासन में इस प्रस्ताव के लिए समर्थन जुटाया।
जुलाई 2026 में संशोधित विधेयक पेश किए जाने के समय ब्लुमेंथल और ग्राहम की ओर से 60 से ज्यादा सीनेटरों का समर्थन जुटाया गया था। लिंडसे ग्राहम की जुलाई 2026 में मृत्यु के बाद भी ब्लुमेंथल ने इस कानून को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई। मौजूदा कानून का नाम भी ग्राहम के सम्मान में रखा गया है।
इस विधेयक का सबसे विवादित प्रावधान राष्ट्रपति को रूस के तेल और गैस के पांच सबसे बड़े आयातकों पर 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त शुल्क लगाने का अधिकार देता है। इसके तहत रूस से ऊर्जा खरीदने वाले भारत और चीन जैसे देशों के सामान पर भी परिस्थितियों के आधार पर भारी शुल्क लगाया जा सकता है।
हालांकि, विधेयक के पारित होने के साथ ही भारत पर कोई स्वतः शुल्क लागू नहीं होगा। यह केवल अमेरिकी कार्यकारी शाखा को भविष्य में ऐसा कदम उठाने का अधिकार देता है। यानी भारत पर शुल्क लगेगा या नहीं और कितना लगेगा, यह आगे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के फैसले पर निर्भर करेगा।
विधेयक के समर्थकों का तर्क है कि इस तरह के कड़े आर्थिक दबाव से रूस की युद्ध क्षमता कमजोर होगी और राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को बातचीत की मेज पर आने के लिए मजबूर किया जा सकेगा। अब सभी की नजर इस बात पर है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप विधेयक पर हस्ताक्षर करके इसे कानून का रूप देते हैं या नहीं।
लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट 2026 से जुड़ी अहम जानकारियां। AI IMAGE
भारत पर क्या असर हो सकता है?
अगर अमेरिकी प्रशासन कानून में दिए अधिकारों का इस्तेमाल भारत के खिलाफ करता है, तो इसका असर भारत-अमेरिका व्यापार पर पड़ सकता है। भारतीय उत्पादों पर अतिरिक्त अमेरिकी शुल्क लगाए जाने से अमेरिका में भारतीय सामान महंगा हो सकता है और कुछ निर्यात क्षेत्रों पर दबाव बढ़ सकता है। दूसरी तरफ, भारत के लिए रूसी तेल महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे ऊर्जा आयात के स्रोतों में विविधता बनी रहती है। अगर रूसी तेल खरीद कम करने का दबाव बढ़ता है, तो भारत को दूसरे स्रोतों से कच्चा तेल खरीदना पड़ सकता है। इससे आयात लागत और वैश्विक तेल बाजार की परिस्थितियां महत्वपूर्ण हो जाएंगी।
क्या है भारत का स्टैंड?
गौरतलब है कि भारत ने इस बार यह स्पष्ट कर दिया है कि वह अमेरिका की मनमर्जी के प्रभाव में आने के बजाय अपने नागरिकों की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है और अपने व्यापार तथा आर्थिक हितों की रक्षा के लिए सभी ‘जरूरी कदम’ उठाएगा।
अगर अमेरिकी प्रशासन भारत से आने वाले कुछ या कई उत्पादों पर अतिरिक्त शुल्क लगाने का फैसला करता है, तो इसका सीधा असर भारत के अमेरिका को होने वाले निर्यात पर पड़ सकता है। किस उत्पाद पर कितना शुल्क लगेगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि प्रशासन कानून के तहत किस तरह की कार्रवाई करता है। इसलिए अभी यह कहना संभव नहीं है कि भारत के पूरे निर्यात पर 100 प्रतिशत शुल्क लगेगा।
ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव यानी जीटीआरआई ने भी कहा है कि वास्तविक असर का आकलन तभी किया जा सकेगा, जब अमेरिकी प्रशासन शुल्क की दर, उत्पादों की सूची और लागू करने की समयसीमा स्पष्ट करेगा।हालांकि, कानून पारित होने और किसी देश पर वास्तव में शुल्क लागू होने के बीच अंतर है। इसलिए भारत पर कितना और कब असर होगा, यह अमेरिकी प्रशासन के आगे के फैसलों पर निर्भर करेगा।
पीएम मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की फोटो।
रूस पर क्या असर पड़ेगा?
विधेयक में रूस के ऊर्जा और रक्षा क्षेत्रों पर प्रतिबंध बढ़ाने के साथ-साथ रूसी अधिकारियों, बैंकों और अन्य वित्तीय संस्थानों को निशाना बनाने का प्रावधान है। इसके अलावा ‘शैडो फ्लीट’ पर भी कार्रवाई का प्रावधान है। शैडो फ्लीट उन जहाजों के नेटवर्क को कहा जाता है, जिनका इस्तेमाल रूस के तेल कारोबार और प्रतिबंधों से बचने के लिए किया जाता रहा है। कानून ऐसे जहाजों और प्रतिबंधों से बचने में मदद करने वाले लोगों या संस्थाओं पर कार्रवाई का दायरा बढ़ाता है।ईरान भी विधेयक के दायरे में
नाम में रूस के साथ ईरान का भी जिक्र है। विधेयक ईरान के ऊर्जा और हथियार क्षेत्रों से जुड़े मौजूदा प्रतिबंधों को जारी रखने की व्यवस्था करता है। सीनेट से पारित संस्करण में ईरान प्रतिबंध अधिनियम को आगे बढ़ाने का प्रावधान शामिल था।
अमेरिकी प्रतिनिधि सभा से पारित होने के बाद विधेयक अब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पास है। अगर राष्ट्रपति इस पर हस्ताक्षर करते हैं, तो यह कानून बन जाएगा। भारत के लिहाज से फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि 100 प्रतिशत शुल्क की बात एक संभावित अधिकार के रूप में है, भारत पर लागू हो चुके शुल्क के रूप में नहीं। अगर आगे अमेरिकी प्रशासन भारत पर अतिरिक्त शुल्क लगाने का फैसला करता है, तभी यह साफ होगा कि कितने उत्पाद इसके दायरे में आएंगे, शुल्क की दर कितनी होगी और इसका भारत-अमेरिका व्यापार पर कितना असर पड़ेगा।
