फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन और क्रिएटिविटी के लिए कब खतरा बन जाती हैं सेंसरशिप गाइडलाइन्स?

फिल्में सरकार द्वारा जारी की गई नैतिक शिक्षा की किताबें बन जाएं तो ये समाज के साथ बेईमानी है। फिल्में समाज का आईना होनी चाहिए ना कि वो आईना जो हम समाज को दिखाना चाहते हैं।

अमेरिकी लेखिका लॉरी हेल्स एंडरसन ने एक बार लिखा था, “सेंसरशिप डर की संतान है, अज्ञानता की जननी है और तानाशाहों का एक कमजोर हथियार है।” लंबे समय से यह देखा गया है कि आजादी से अपनी बात कहने से तानाशाह डरते हैं। इसके बावजूद दुनिया के कई बड़े लोकतांत्रिक देश मानते हैं कि फिल्मों और अभिव्यक्ति के दूसरे माध्यमों के लिए कुछ नियम होने चाहिए। इन नियमों का मकसद यह तय करना है कि किस तरह की फिल्म कौन देख सकता है? लेकिन इन नियमों का मकसद फिल्म बनाने वालों की सोच या उनकी रचनात्मक आजादी को रोकना नहीं होना चाहिए। यह समझना जरूरी है कि किसी फिल्म को देखने की अनुमति तय करना और फिल्म में क्या दिखाया जा सकता है; यह तय करना दो अलग-अलग बातें हैं। जब फिल्म सर्टिफिकेशन के नियम यह तय करने लगते हैं कि फिल्मकार अपनी कहानी में क्या दिखा सकता है और क्या नहीं, तब सर्टिफिकेशन और सेंसरशिप के बीच का अंतर खत्म होने लगता है।

Opinion: फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन और क्रिएटिविटी के लिए कब खतरा बन जाती हैं सेंसरशिप गाइडलाइन्स?

Opinion: फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन और क्रिएटिविटी के लिए कब खतरा बन जाती हैं सेंसरशिप गाइडलाइन्स?

यहीं से सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन (CBFC) की गाइडलाइन्स पर सवाल उठते हैं। इन गाइडलाइन्स में समय-समय पर कुछ नए नियम भी जोड़े गए हैं। इन नियमों के अनुसार, फिल्मों में नशे की लत या ड्रग्स के इस्तेमाल को बढ़ावा नहीं देना चाहिए। हिंसा दिखाते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि उसे किस तरह पेश किया जा रहा है। सरकार की आलोचना करने वाली फिल्में ऐसी सीमा पार न करें, जहां उन्हें राष्ट्रविरोधी माना जाने लगे।

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