अमेरिकी लेखिका लॉरी हेल्स एंडरसन ने एक बार लिखा था, “सेंसरशिप डर की संतान है, अज्ञानता की जननी है और तानाशाहों का एक कमजोर हथियार है।” लंबे समय से यह देखा गया है कि आजादी से अपनी बात कहने से तानाशाह डरते हैं। इसके बावजूद दुनिया के कई बड़े लोकतांत्रिक देश मानते हैं कि फिल्मों और अभिव्यक्ति के दूसरे माध्यमों के लिए कुछ नियम होने चाहिए। इन नियमों का मकसद यह तय करना है कि किस तरह की फिल्म कौन देख सकता है? लेकिन इन नियमों का मकसद फिल्म बनाने वालों की सोच या उनकी रचनात्मक आजादी को रोकना नहीं होना चाहिए। यह समझना जरूरी है कि किसी फिल्म को देखने की अनुमति तय करना और फिल्म में क्या दिखाया जा सकता है; यह तय करना दो अलग-अलग बातें हैं। जब फिल्म सर्टिफिकेशन के नियम यह तय करने लगते हैं कि फिल्मकार अपनी कहानी में क्या दिखा सकता है और क्या नहीं, तब सर्टिफिकेशन और सेंसरशिप के बीच का अंतर खत्म होने लगता है।
यहीं से सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन (CBFC) की गाइडलाइन्स पर सवाल उठते हैं। इन गाइडलाइन्स में समय-समय पर कुछ नए नियम भी जोड़े गए हैं। इन नियमों के अनुसार, फिल्मों में नशे की लत या ड्रग्स के इस्तेमाल को बढ़ावा नहीं देना चाहिए। हिंसा दिखाते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि उसे किस तरह पेश किया जा रहा है। सरकार की आलोचना करने वाली फिल्में ऐसी सीमा पार न करें, जहां उन्हें राष्ट्रविरोधी माना जाने लगे।
इसी तरह अगर किसी फिल्म में अदालत का दृश्य दिखाया जाता है, तो अदालत की गरिमा का ध्यान रखने की बात कही जाती है। राजनीतिक फिल्मों में दूसरे देशों के साथ भारत के संबंधों को भी सही तरीके से दिखाने की अपेक्षा की जाती है लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब नियमों में 'बहुत ज्यादा', 'अनावश्यक', 'अपमानजनक' या 'राष्ट्रविरोधी' जैसे शब्द इस्तेमाल किए जाते हैं, तो यह फैसला कौन करेगा कि सही और गलत की सीमा कहां तक है?
35 साल पुरानी गाइडलाइन्स आज कितनी सही हैं?
यह समझना भी जरूरी है कि सीबीएफसी (Censor Board) की जिन गाइडलाइन्स की बात हो रही है, वे 1991 में बनाई गई थीं। पिछले 35 सालों में समाज की सोच, लोगों की पसंद और जीवन जीने के तरीकों में काफी बदलाव आया है। आज फिल्में केवल मनोरंजन का साधन नहीं हैं। वे राजनीति, पहचान, हिंसा, यौन संबंधों और समाज की असल समस्याओं पर भी बात करती हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या इतने पुराने नियम आज की फिल्मों और समाज को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं? सीबीएफसी की गाइडलाइन्स सामाजिक जिम्मेदारी और फिल्मकारों की आजादी के बीच संतुलन बनाने की बात करती हैं। लेकिन यह संतुलन तब बिगड़ने लगता है, जब नियम फिल्म की कहानी, उसके किरदारों और कहानी बताने के तरीके को बदलने लगते हैं।

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भारतीय सिनेमा के एक निर्माता ने अपना नाम गुप्त रखने की शर्त पर कहा, “आज दुनिया में फिल्मों के बीच बहुत ज्यादा मुकाबला है। भारतीय फिल्मकारों को कोरियाई, जापानी, तुर्की और दूसरे देशों की फिल्मों से भी मुकाबला करना पड़ता है। ऐसे में हम दुनिया के साथ कैसे आगे बढ़ेंगे, अगर हमारे अपने नियम ही इतने सख्त हों? अगर भारत चाहता है कि उसकी फिल्मों को दुनिया भर में पसंद किया जाए, तो हमें यह ध्यान रखना होगा कि सर्टिफिकेशन सिस्टम हमारे फिल्मकारों की रचनात्मक आजादी को सीमित न करे।”
नियमों का मकसद साफ है, लेकिन उनका इस्तेमाल कैसे होता है?
एक दूसरे फिल्मकार ने भी अपना नाम गुप्त रखने की शर्त पर सेंसर बोर्ड की गाइडलाइन्स पर बात की। उन्होंने कहा, “हिंसा, ड्रग्स, शराब और हार्कनेस को सही या गलत बताना आसान नहीं है। यह काफी हद तक कहानी और उसे देखने वाले व्यक्ति की सोच पर निर्भर करता है। अगर आप अपने किरदार को उसकी कहानी के हिसाब से बुरा, खतरनाक या कमजोर नहीं दिखा सकते, तो एक प्रभावशाली कहानी कैसे बताएंगे? कहानी का मकसद ही समाज को उसका असली चेहरा दिखाना है।”
हमें यह समझना होगा कि अगर किसी कहानी का किरदार खतरनाक है, तो इसका मतलब यह नहीं कि वह कहानी भी खतरनाक है। सिनेमा कोई ऐसी किताब नहीं है, जो लोगों को नैतिक शिक्षा देने के लिए बनाई गई हो। यह अपनी बात कहने और कहानियां सुनाने का एक माध्यम है। फिल्मों में हमेशा वही नहीं दिखाया जा सकता, जो हम समाज में देखना चाहते हैं। कई बार फिल्म का मकसद हमें सोचने पर मजबूर करना और असहज महसूस कराना भी होता है। ऐसा इसलिए ताकि हम समाज की सच्चाई को बेहतर तरीके से समझ सकें।
एक निर्माता ने विद्या बालन की हिट फिल्म 'नो वन किल्ड जेसिका' का उदाहरण दिया। यह फिल्म जेसिका लाल हत्याकांड पर आधारित थी। इस फिल्म का मकसद लोगों को अपराध करना सिखाना नहीं था। इसका मकसद समाज में पहले से मौजूद एक सच्ची घटना को लोगों के सामने लाना और उन्हें उस पर सोचने के लिए मजबूर करना था। निर्माता ने 'सत्या' और 'रंग दे बसंती' जैसी फिल्मों का भी जिक्र किया। इन फिल्मों की कहानियों में हिंसा, अपराध और समाज की समस्याओं को दिखाया गया है। ऐसी फिल्में जरूरी नहीं कि लोगों को गलत रास्ते पर चलने के लिए प्रेरित करें। वे समाज की समस्याओं को सामने लाती हैं और लोगों को सही-गलत के बारे में सोचने का मौका देती हैं। परेशानी तब होती है, जब किसी चीज को फिल्म में दिखाने का मतलब यह मान लिया जाता है कि फिल्मकार उसका समर्थन भी कर रहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने कई साल पहले ही इस बात को समझ लिया था और एस. रंगराजन बनाम पी. जगजीवन राम मामले में कोर्ट ने कहा था कि केवल इस डर से अभिव्यक्ति की आजादी नहीं छीनी जा सकती कि उससे समाज में अशांति फैल सकती है। किसी भी तरह का प्रतिबंध लगाने के लिए ठोस वजह होनी चाहिए। केवल परेशानी से बचने के लिए किसी की आवाज दबाना सही नहीं है।
निर्देशक शेखर कपूर की फिल्म बैंडिट क्वीन में बलात्कार, नग्नता और अपमान से जुड़े कई परेशान करने वाले दृश्य थे। इन दृश्यों को केवल इस आधार पर नहीं देखना चाहिए कि वे दर्शकों को असहज करेंगे या नहीं। यह भी समझना जरूरी है कि कहानी में उनका क्या महत्व है? फूलन देवी के जीवन पर आधारित इस फिल्म में हिंसा और यौन उत्पीड़न के दृश्य उनके जीवन और उनके व्यक्तित्व में आए बदलावों को समझने के लिए जरूरी थे। यौन हिंसा की भयावहता दिखाने का मतलब उसका महिमामंडन करना नहीं है। यानी किसी बुरी घटना को दिखाने का मतलब यह नहीं कि फिल्मकार उसे अच्छा बता रहा है।

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इसके बावजूद नए नियमों के तहत सेंसर बोर्ड (CBFC) ऐसे दृश्यों को हटाने की मांग कर सकता है। सवाल यह है कि क्या बोर्ड को फिल्म की कहानी और उसके जरूरी दृश्यों को इस तरह बदलने का अधिकार होना चाहिए? अगर कोई फिल्म केवल वयस्कों के लिए बनाई गई है और उसे 'A' सर्टिफिकेट दिया गया है, तो दर्शकों को पहले ही बता दिया जाता है कि यह फिल्म बच्चों के लिए नहीं है। ऐसे में जरूरत इस बात की है कि दर्शकों को फिल्म की सामग्री के बारे में सही जानकारी दी जाए। सेंसर बोर्ड को अपनी ताकत का इस्तेमाल करके फिल्मकार की कलात्मक सोच बदलने का जरिया नहीं बनना चाहिए। फिल्म सर्टिफिकेशन का मकसद दर्शकों को जागरूक करना होना चाहिए, न कि फिल्मकारों को चुप कराना।
नई गाइडलाइन्स कहती हैं कि फिल्मों में हिंसा को बढ़ावा नहीं देना चाहिए। यह बात सही है लेकिन अगर कोई फिल्मकार समाज में मौजूद हिंसा को दिखाता है, तो इसका मतलब यह नहीं कि वह हिंसा का समर्थन कर रहा है। कई बार हिंसा के असली नतीजे और उससे होने वाले नुकसान को समझाने के लिए उसे दिखाना जरूरी होता है। ड्रग्स से जुड़े नियमों में भी यही समस्या दिखाई देती है। अगर कोई फिल्म नशे की लत और उससे होने वाले नुकसान पर बनाई जा रही है, तो वह इस समस्या को दिखाए बिना अपनी बात कैसे समझाएगी? 'उड़ता पंजाब' को लेकर हुआ विवाद इसका एक उदाहरण है। इस फिल्म ने पंजाब में नशे की समस्या को सामने रखा था। यहां सवाल उठता है कि पंजाब में नशे की समस्या पर बात करना क्या राज्य की छवि खराब करना है? या फिर इस समस्या को छिपाना उन लोगों के साथ अन्याय है?
एक बॉलीवुड फिल्मकार ने अपना नाम गुप्त रखने की शर्त पर कहा कि 'कबीर सिंह', 'अर्जुन रेड्डी' और 'यूफोरिया' जैसी कहानियां किसी व्यक्ति के गलत फैसलों और खुद को नुकसान पहुंचाने की प्रक्रिया को दिखाती हैं। ऐसी कहानियों में किरदार की पूरी यात्रा दिखाना जरूरी हो सकता है। अगर उसके गलत व्यवहार और उसके नतीजों को ही नहीं दिखाया जाएगा तो कहानी अधूरी रह जाएगी। हर समाज को ऐसी कहानियों की जरूरत होती है, जो लोगों को गलत रास्तों और उनके नतीजों के बारे में सोचने पर मजबूर करें।
अब 'राष्ट्रविरोधी' शब्द को ही देखिए। अगर कोई फिल्मकार सरकार की किसी गलत नीति, सेना के किसी अभियान या सांप्रदायिक दंगे पर फिल्म बनाता है, तो क्या होगा? क्या फिल्मकार को राष्ट्रवाद पर सवाल उठाने की आजादी होनी चाहिए? क्या वह किसी भ्रष्ट संस्था को पर्दे पर दिखा सकता है? क्या सरकार या किसी सरकारी संस्था की आलोचना करने से देश के दूसरे देशों के साथ संबंधों को नुकसान पहुंच सकता है? ये ऐसे सवाल हैं, जिनका जवाब केवल अस्पष्ट नियमों के आधार पर नहीं दिया जा सकता।
एक निर्माता ने कहा, “इन गाइडलाइन्स को हर फिल्म पर एक ही तरह से लागू करना बहुत मुश्किल है। एक फिल्म में हिंसा कहानी के लिए जरूरी हो सकती है, जबकि दूसरी फिल्म में वही हिंसा गैरजरूरी हो सकती है। यह फैसला काफी हद तक इस बात पर निर्भर करता है कि फिल्म को देखने और उसका मूल्यांकन करने वाला व्यक्ति कहानी को कैसे समझता है।” यही वजह है कि नियम साफ और स्पष्ट होने चाहिए, ताकि किसी फिल्म को लेकर फैसले केवल किसी व्यक्ति की सोच या पसंद पर निर्भर न रहें।
एक अन्य निर्माता ने अपना नाम गुप्त रखने की शर्त पर बताया कि पहले फिल्म सर्टिफिकेशन अपीलीय न्यायाधिकरण (FCAT) हुआ करता था। अगर कोई फिल्मकार सेंसर बोर्ड के फैसले से सहमत नहीं होता था, तो वह वहां अपील कर सकता था। लेकिन कुछ साल पहले इस न्यायाधिकरण को खत्म कर दिया गया। अब फिल्मकारों के पास अदालत जाने का रास्ता है, जहां कानूनी प्रक्रिया में काफी समय लग सकता है। पहले से ही कई लंबित मामलों का सामना कर रही अदालतों में किसी नए मामले की सुनवाई में भी समय लग सकता है। फिल्मों के मामले में देरी का असर बहुत बड़ा हो सकता है, क्योंकि फिल्म की रिलीज टलने से निर्माताओं को आर्थिक नुकसान हो सकता है इसलिए जरूरी है कि फिल्मकारों को सेंसर बोर्ड के फैसले को चुनौती देने के लिए एक आसान और समय पर काम करने वाला रास्ता मिले। यह भी ध्यान रखना होगा कि जब ये गाइडलाइन्स बनाई गई थीं, तब से समाज में काफी बदलाव आ चुका है। ऐसे में नियमों की समीक्षा करना और उन्हें आज के समय के हिसाब से बदलना जरूरी है।
हाल ही में रिलीज हुई सफल फिल्म 'धुरंधर' में काफी खून-खराबा दिखाया गया है। इसे सेंसर बोर्ड से 'A' सर्टिफिकेट मिला, हालांकि फिल्म के कुछ दृश्यों में बदलाव भी किए गए। अगर ब्रिटिश फिल्म सर्टिफिकेशन सिस्टम का उदाहरण देखें, तो वहां फिल्मों को उनकी सामग्री के आधार पर अलग-अलग श्रेणियों में रखा जाता है। दर्शकों को यह जानकारी दी जाती है कि फिल्म में हिंसा, नशीले पदार्थों के इस्तेमाल या यौन हिंसा से जुड़े दृश्य हो सकते हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि भारत का तरीका पूरी तरह गलत है और ब्रिटेन का तरीका पूरी तरह सही लेकिन इससे एक अहम बात समझ आती है कि फिल्म सर्टिफिकेशन का इस्तेमाल दर्शकों को यह बताने के लिए किया जा सकता है कि फिल्म में किस तरह की सामग्री है। इससे दर्शक अपनी उम्र और पसंद के हिसाब से फैसला कर सकते हैं कि उन्हें फिल्म देखनी चाहिए या नहीं। इस प्रक्रिया में फिल्म की कहानी को बदलने के बजाय दर्शकों को सही जानकारी देना ज्यादा उपयोगी हो सकता है।

फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन और क्रिएटिविटी के लिए कब खतरा बन जाती हैं सेंसरशिप गाइडलाइन्स?
एक जाने-माने भारतीय फिल्म निर्माता ने कहा, “मैं निजी तौर पर किसी भी तरह की सेंसरशिप के खिलाफ हूं। फिल्म सर्टिफिकेशन जरूरी है और होना भी चाहिए लेकिन अगर कोई फिल्म केवल वयस्कों के लिए है, तो उसे वयस्कों के लिए ही उपलब्ध कराया जाना चाहिए। जब देश के वयस्कों को शराब पीने, सिगरेट पीने, वोट देने और गाड़ी चलाने की अनुमति है, तो फिर उन्हें सिनेमाघरों में इस तरह की चीजें देखने से कैसे रोका जा सकता है?”
फिल्मों के लिए नियम होना गलत नहीं है। बच्चों की सुरक्षा और दर्शकों को सही जानकारी देने के लिए सर्टिफिकेशन जरूरी है। लेकिन समस्या तब पैदा होती है, जब इन नियमों के जरिए यह तय किया जाने लगे कि फिल्मकार अपनी कहानी कैसे बताएगा, उसके किरदार कैसे होंगे और समाज की सच्चाई को किस हद तक दिखाया जा सकता है। किसी फिल्म में हिंसा, नशा, अपराध या भ्रष्टाचार दिखाने का मतलब यह नहीं कि फिल्म उसका समर्थन कर रही है। कई बार इन समस्याओं को पर्दे पर दिखाना ही लोगों को उनकी गंभीरता समझाने का सबसे अच्छा तरीका होता है इसलिए जरूरी है कि सेंसर बोर्ड के नियम साफ हों और उनका इस्तेमाल निष्पक्ष तरीके से किया जाए। फिल्मकारों को अपनी बात कहने की आजादी मिलनी चाहिए और दर्शकों को यह अधिकार होना चाहिए कि वे अपनी पसंद के हिसाब से फिल्म देखें।
इंटरनेट दिखा रहा है दर्शक और फिल्मकार दोनों को नया रास्ता
भारत में फिल्में देखने वाले लोगों की संख्या और उनकी पसंद में बहुत बदलाव आया है। Ormax Media के अनुसार, भारत में 2025 में लगभग 60.12 करोड़ लोग ओटीटी प्लेटफॉर्म पर फिल्में और वेब सीरीज देखते थे। 2026 में यह संख्या बढ़कर लगभग 66.49 करोड़ होने का अनुमान है। वहीं पैसे देकर इस्तेमाल की जाने वाली OTT सेवाओं के सब्सक्रिप्शन की संख्या 2026 में लगभग 17.26 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है।
इंटरनेट ने भी लोगों के फिल्में और दूसरी सामग्री देखने का तरीका बदल दिया है। भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (TRAI) के आंकड़ों के अनुसार, 2025 के आखिरी महीनों तक भारत में इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों के सब्सक्रिप्शन की संख्या एक अरब से ज्यादा हो गई थी। अगर कोई वयस्क व्यक्ति सिनेमाघर में किसी फिल्म का कोई दृश्य कानूनी रूप से नहीं देख सकता, तो इसका मतलब यह नहीं है कि वह दृश्य उसकी पहुँच से पूरी तरह बाहर हो जाता है। वह उसे ओटीटी प्लेटफॉर्म, सोशल मीडिया या इंटरनेट पर मौजूद फिल्में की गैरकानूनी कॉपी के जरिए देख सकता है।
आज भारत में करोड़ों लोग अलग-अलग डिजिटल प्लेटफॉर्म पर फिल्में और दूसरी सामग्री देखते हैं। इसके बावजूद सिनेमाघरों के लिए फिल्म बनाने वाले फिल्मकारों को ऐसे नियमों का पालन करना पड़ता है, जिनके कारण उनकी फिल्म रिलीज होने से पहले ही कुछ दृश्यों को हटाया जा सकता है या उनमें बदलाव करना पड़ सकता है। दर्शकों को असहज करने वाले दृश्यों से बचाने के लिए फिल्मों से ऐसे दृश्य काट देने का विचार आज के समय में पुराना लगता है।
आज वही दर्शक इंटरनेट पर कई तरह की सामग्री आसानी से देख सकते हैं, जहां अक्सर सिनेमाघरों की तुलना में कम पाबंदियां होती हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि भारतीय फिल्मकारों को ऐसी कहानियां बनाने से क्यों रोका जाए, जिन्हें दर्शक दूसरे प्लेटफॉर्म पर पहले से ही बड़ी संख्या में देख रहे हैं? एक फिल्म निर्माता ने सवाल उठाया, “हम किसे बेवकूफ बना रहे हैं? YouTube पर कितनी तरह की सामग्री उपलब्ध है, यह देखिए। वहां कोई भी इसे आसानी से देख सकता है। ऐसा लगता है कि केवल एक खास माध्यम को नियंत्रित करने की कोशिश की जा रही है।”
और यह खास माध्यम सिनेमा है, जिसमें भारतीय फिल्मकार अपना पैसा, अपनी मेहनत और अपने जीवन के कई साल लगाते हैं। इसके अलावा, जब भारतीय फिल्मकारों को अपनी कहानियों पर शक करने और उन्हें बदलने के लिए मजबूर किया जाता है, तो उनके लिए खुलकर काम करना मुश्किल हो जाता है। दूसरी ओ, दर्शक इंटरनेट पर दूसरे देशों की ऐसी फिल्में और सीरीज देख सकते हैं, जिनमें कई नए और अलग तरह के विषय दिखाए जाते हैं।
ऐसे में फिल्में पर ज्यादा पाबंदियां लगाने से दर्शकों की सुरक्षा होने के बजाय भारतीय फिल्मकारों को नुकसान हो सकता है। उन्हें उन फिल्मों के मुकाबले कम आजादी मिलती है, जो दर्शक दूसरे देशों से देख सकते हैं। जब हम बार-बार फिल्मों के दृश्य काटते हैं, तो हम एक ऐसे माध्यम पर ज्यादा नियंत्रण लगाते हैं, जिसे दर्शक सिनेमाघरों में देखते हैं। दूसरी ओर वही दर्शक डिजिटल प्लेटफॉर्म पर हिंसा, सेक्स और दूसरे उत्तेजक विषयों वाली सामग्री भी देख सकते हैं। यह बात आज और भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत का मीडिया और मनोरंजन उद्योग तेजी से डिजिटल हो रहा है।
FICCI-EY की रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में भारत के डिजिटल मीडिया की कमाई एक लाख करोड़ रुपये से ज्यादा हो गई थी। यह भारत के मीडिया और मनोरंजन उद्योग का सबसे बड़ा क्षेत्र बन गया था। इन आंकड़ों से पता चलता है कि दर्शक अलग-अलग तरह की सामग्री देखना पसंद करते हैं। कुछ लोग भक्ति और अच्छे संदेश देने वाली फिल्में पसंद करते हैं। कुछ लोगों को हिंसा और अपराध पर आधारित कहानियां अच्छी लगती हैं। कुछ लोग राजनीतिक थ्रिलर, सामाजिक मुद्दों पर बनी फिल्में, कॉमेडी या नशे की लत पर आधारित कहानियां देखना चाहते हैं।
एक तरह की फिल्म के सफल होने का मतलब यह नहीं है कि दूसरी तरह की फिल्मों के दर्शक नहीं रहेंगे। एक अच्छे फिल्म उद्योग में हर तरह की कहानी के लिए जगह होनी चाहिए इसलिए इसका समाधान यह नहीं हो सकता कि हर फिल्म को समाज के बारे में किसी एक खास सोच के अनुसार बनाया जाए। सिनेमा लोगों का मनोरंजन कर सकता है, उन्हें चौंका सकता है, सोचने पर मजबूर कर सकता है, नाराज़ कर सकता है या किसी सच्चाई को सामने ला सकता है। वह लोगों को किसी समस्या के बारे में चेतावनी भी दे सकता है।
किसी फिल्म में किसी व्यक्ति को बहुत बुरा काम करते हुए दिखाने का मतलब यह नहीं है कि फिल्म दर्शकों को भी वैसा ही करने के लिए कह रही है। इसी तरह किसी फिल्म में किसी संस्था को भ्रष्ट दिखाने का मतलब यह नहीं है कि हर संस्था भ्रष्ट है। नशे की लत पर फिल्म बनाने का मतलब नशे को बढ़ावा देना नहीं है। कोई फिल्म किसी ऐसे नागरिक की कहानी भी दिखा सकती है, जो गुस्से में है। वह सरकारी नीतियों पर सवाल उठा सकती है और सत्ता में बैठे लोगों की आलोचना कर सकती है। इसका मतलब यह नहीं है कि उस फिल्म को देश के खिलाफ बताया जाए। कहानी कहने का असली उद्देश्य समाज को आईना दिखाना है, न कि दर्शकों को यह बताना कि उन्हें क्या देखने की अनुमति है।
फिल्मकार अपनी कहानी बनाता है और दर्शक उसे देखकर उसका मतलब समझते हैं। हर दर्शक किसी कहानी को अपने अनुभव और सोच के अनुसार समझ सकता है। अगर फिल्मों पर बहुत ज्यादा पाबंदियां लगा दी जाएं, तो एक ऐसा सिनेमा बनने लगेगा जिसमें सब कुछ अच्छा और साफ-सुथरा दिखाया जाएगा, लेकिन असल जिंदगी की कई सच्चाइयां गायब हो जाएंगी।
ऐसी फिल्मों में हिंसा को खुलकर नहीं दिखाया जाएगा। अन्याय को कम करके दिखाया जाएगा। संस्थाओं के काम पर सवाल नहीं उठाए जाएंगे। राजनीति को हमेशा सभ्य और शांत दिखाया जाएगा। सेक्स और यौनिकता से जुड़े विषयों को बहुत सीमित तरीके से दिखाया जाएगा। नशे की लत जैसी समस्याओं को नजरअंदाज किया जाएगा और राष्ट्रवाद पर सवाल उठाने की अनुमति नहीं होगी। ऐसी फिल्मों को सेंसर करना शायद आसान होगा, लेकिन वे हमारे समाज की सच्चाई को सही तरीके से नहीं दिखा पाएंगी। क्योंकि सिनेमा का काम सिर्फ अच्छी और खुश करने वाली बातें दिखाना नहीं है। उसका काम समाज की सच्चाई, समस्याओं और कमियों को भी सामने लाना है।
