Uttarakhand News: उत्तराखंड के काशीपुर स्थित द्रोण सागर के पास भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने प्राचीन अवशेषों की जांच के लिए एक बार फिर खुदाई कार्य शुरू कर दिया है। करीब 90 एकड़ में फैले इस टीले पर खुदाई का मकसद यहां मिले पुरातात्विक अवशेषों का वैज्ञानिक अध्ययन करना और क्षेत्र के प्राचीन इतिहास को समझना है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, इस स्थान का संबंध महाभारत काल के गुरु द्रोणाचार्य और पांडवों से है। हालांकि, इन मान्यताओं की ऐतिहासिक पुष्टि के लिए पुरातात्विक सबूतों की जांच जरूरी है। अधिकारियों के मुताबिक, खुदाई का मौजूदा चरण मार्च तक जारी रहने की उम्मीद है।
काशीपुर में द्रोण सागर टीले पर ASI ने फिर शुरू की खुदाई
महाभारत काल से जुड़ी हैं स्थानीय मान्यताएं
द्रोण सागर मंदिर की देखरेख करने वाले पुजारी के मुताबिक, स्थानीय मान्यता है कि महाभारत काल में गुरु द्रोणाचार्य इसी स्थान पर रहकर पांडवों को शिक्षा देते थे। यह भी माना जाता है कि पांडवों ने अपने गुरु को गुरु दक्षिणा के रूप में द्रोण सागर का निर्माण करके दिया था। एक अन्य मान्यता के अनुसार, भीम ने द्रोणाचार्य को गुरु दक्षिणा के रूप में द्रोण सागर भेंट किया था। इन मान्यताओं के चलते बड़ी संख्या में श्रद्धालु इस स्थान पर आते हैं। हालांकि, पुरातत्व विशेषज्ञों के मुताबिक, किसी धार्मिक परंपरा या महाकाव्य से जुड़े दावे की पुष्टि के लिए वैज्ञानिक साक्ष्यों का अध्ययन जरूरी है।
पहले की खुदाई में मिले थे प्राचीन मंदिर के अवशेष
ASI के रिकॉर्ड के अनुसार, इस टीले पर 1939-40, 1965-66 और 1970-71 में भी खुदाई हो चुकी है। इन अभियानों में गुप्त काल से लेकर प्रारंभिक मध्यकाल तक के मंदिर के अवशेष मिले थे। पुरातात्विक साक्ष्यों से संकेत मिलता है कि मंदिर का निर्माण अलग-अलग चरणों में हुआ था। शुरुआत में गुप्त काल के दौरान मिट्टी और ईंटों से एक ऊंचा चबूतरा बनाया गया। इसके बाद छठी या सातवीं शताब्दी के आसपास उसके चारों ओर दीवारें बनाई गईं।
यहां चित्रित धूसर मृदभांड संस्कृति (Painted Grey Ware) से लेकर प्रारंभिक मध्यकाल तक के मिट्टी के बर्तन भी मिले हैं। इसके अलावा कुषाण, गुप्त और मध्यकाल से जुड़ी अन्य पुरावस्तुएं भी बरामद हुई हैं। ये साक्ष्य बताते हैं कि इस क्षेत्र में अलग-अलग ऐतिहासिक कालखंडों में मानव गतिविधियां और बसावट मौजूद थीं।
चीनी यात्री के विवरण में भी मिलता है काशीपुर का उल्लेख
इतिहासकार काशीपुर की पहचान प्राचीन स्थान गोविषाण से करते हैं, जिसका जिक्र चीनी यात्री ह्वेनसांग के यात्रा विवरणों में मिलता है। ह्वेनसांग छठी और सातवीं शताब्दी के दौरान भारत आए थे। ASI के रिकॉर्ड के अनुसार, ब्रिटिश पुरातत्वविद् अलेक्जेंडर कनिंघम ने काशीपुर की पहचान ह्वेनसांग के विवरण में दर्ज ‘किउ-पि-श्वांग-ना’ नामक स्थान से की थी। कनिंघम ने टीले के सबसे ऊंचे हिस्से भीम-गजा में एक बड़ी संरचना के अवशेष भी खोजे थे।
1950 के दशक में पुरातत्वविद् बीबी लाल को हस्तिनापुर में खुदाई के दौरान चित्रित धूसर मृदभांड संस्कृति के बर्तन मिले थे। यह संस्कृति प्राचीन उत्तर भारत के इतिहास और महाभारत से जुड़े पुरातात्विक स्थलों के अध्ययन में अहम मानी जाती है। हालांकि, किसी विशेष पुरातात्विक संस्कृति के अवशेष मिलना अपने आप में महाभारत की किसी घटना या पात्र के ऐतिहासिक अस्तित्व को प्रमाणित नहीं करता।
नई खुदाई में मिलीं ईंटों की संरचनाएं
न्यूज एजेंसी ANI के अनुसार, ASI के देहरादून सर्कल के अधीक्षण पुरातत्वविद् मोहन जोशी ने बताया कि मौजूदा खुदाई का मकसद पहले मिले अवशेषों से जुड़े वैज्ञानिक साक्ष्य जुटाना और स्थल का अधिक विस्तृत अध्ययन करना है। इससे अलग-अलग कालखंडों में यहां हुई सांस्कृतिक गतिविधियों को बेहतर ढंग से समझने में मदद मिलेगी। जोशी के मुताबिक, ताजा खुदाई में ईंटों से बनी संरचनाएं और एक गोलाकार आकृति सामने आई है। मौजूदा चरण पूरा होने के बाद अधिकारी आकलन करेंगे कि आगे खुदाई की जरूरत है या नहीं।
