Share Market and Gold-Silver Investment Outlook: भारतीय शेयर बाजार में निवेश करने वाले लोगों के लिए 2026 आसान नहीं रहा है। विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली, रुपये की कमजोरी और महंगे क्रूड ऑयल ने बाजार की चाल पर दबाव बनाया है। ऐसे में दिग्गज निवेशक शंकर शर्मा ने भारतीय बाजार की कुछ ऐसी कमियों की ओर इशारा किया है, जिन्हें समझना निवेशकों के लिए जरूरी है। उनकी नजर सिर्फ सेंसेक्स और निफ्टी पर नहीं, बल्कि बाजार की असली चौड़ाई, रुपये की गिरती वैल्यू और दुनिया के दूसरे बाजारों में मौजूद अवसरों पर भी है।
शंकर शर्मा ने बताया अब इन बाजारों में मौका
12 अक्टूबर, 2026 को कारोबार के दौरान भारतीय बाजार शुरुआती तेजी गंवाकर लाल निशान में आ गए। वहीं, अक्टूबर में अब तक विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (FPI) भारतीय शेयरों से करीब ₹44,166 करोड़ निकाल चुके थे। पूरे 2026 में उनकी निकासी ₹3 लाख करोड़ के पार पहुंच गई थी। ऊंचे क्रूड ऑयल, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड और मजबूत डॉलर को इस दबाव की प्रमुख वजहों में गिना जा रहा है।
भारतीय बाजार की कमजोरी की असली कहानी क्या है?
शंकर शर्मा के मुताबिक, बाजार की तस्वीर समझने के लिए सिर्फ सेंसेक्स और निफ्टी को देखना काफी नहीं है। उन्होंने भारतीय बाजार को संकेंद्रित यानी कुछ चुनिंदा शेयरों पर ज्यादा निर्भर बाजार बताया। उनके मुताबिक, बेंचमार्क इंडेक्स कई बार उस कमजोरी को नहीं दिखाते, जिससे व्यापक बाजार गुजर रहा होता है। उनका सुझाव है कि निवेशकों को मार्केट-कैप आधारित इंडेक्स के साथ Equal-Weight Index और मिडकैप-स्मॉलकैप शेयरों के प्रदर्शन को भी देखना चाहिए। इससे पता चलता है कि तेजी वास्तव में कितनी कंपनियों में फैल रही है। शर्मा ने बाजार की गहराई और लिक्विडिटी पर भी सवाल उठाए। खासकर स्मॉलकैप कंपनियों में कम ट्रेडिंग वॉल्यूम, लोअर सर्किट और शेयर बेचकर बाहर निकलने में आने वाली मुश्किल निवेशकों के लिए बड़ा जोखिम बन सकती है।
रुपये की कमजोरी से निवेश पर दोहरा असर
शर्मा की एक अहम बात यह है कि निवेश का रिटर्न केवल रुपये में नहीं, बल्कि उस करेंसी के हिसाब से भी समझना चाहिए, जिसमें भविष्य में खर्च करना है। अगर किसी निवेशक को विदेश में पढ़ाई, यात्रा या दूसरी जरूरतों के लिए डॉलर या यूरो में पैसा खर्च करना है, तो रुपये में मिला रिटर्न उसकी वास्तविक खरीद क्षमता की पूरी कहानी नहीं बताता। 12 अक्टूबर को रुपये ने RBI के उपायों के बाद डॉलर के मुकाबले मजबूती दिखाई, लेकिन Reuters की रिपोर्ट के मुताबिक, 2026 में अब तक इसमें लगभग 6.5% की गिरावट आ चुकी थी। यानी घरेलू बाजार में निवेश का मूल्यांकन करते समय करेंसी रिस्क को नजरअंदाज करना ठीक नहीं है।
अब कौन-से ग्लोबल बाजारों पर है नजर?
शर्मा ने एक पॉडकास्ट में बताया कि वे ग्लोबल इक्विटी को लेकर पूरी तरह मंदी के नजरिये में नहीं हैं। हालांकि, उन्होंने अमेरिकी बाजार को लेकर मंदी का रुख और भारत को लेकर मध्यम स्तर की मंदी का नजरिया बताया। दूसरी ओर, Emerging Markets (EM) और Latin America में उन्हें उसी तरह की कमजोरी नहीं दिखती। अपने पोर्टफोलियो की चर्चा करते हुए उन्होंने यूरोप, उभरते बाजारों और लैटिन अमेरिका में निवेश फैलाने की बात की। अलग-अलग देशों तक पहुंचने के लिए उन्होंने BlackRock और Vanguard जैसे प्रदाताओं के ETF का भी जिक्र किया।
गोल्ड-सिल्वर में कितना निवेश करें?
शर्मा ने अपने पोर्टफोलियो के बारे में बताते हुए कहा कि गोल्ड और सिल्वर का हिस्सा करीब 10% है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उनके पोर्टफोलियो में फिक्स्ड इनकम का अहम हिस्सा है। बातचीत में उन्होंने कुल पोर्टफोलियो के लगभग 15-20% हिस्से को डेट के रूप में बताया।
इससे उनकी रणनीति में तीन बातें सामने आती हैं—इक्विटी के जरिए लंबी अवधि में पूंजी बढ़ाने की कोशिश, गोल्ड-सिल्वर जैसे दूसरे एसेट के जरिए विविधता और डेट के माध्यम से कुछ स्थिरता व निवेश के नए अवसरों के लिए पैसा उपलब्ध रखना। हालांकि, सोने और चांदी की कीमतें भी गिर सकती हैं। केवल किसी बड़े निवेशक के पोर्टफोलियो में इनकी हिस्सेदारी देखकर निवेश का फैसला करना सही नहीं होगा।
भारत में किस सेक्टर में दिख रहा बड़ा मौका?
अगले 3-5 साल के लिए भारत में जिन क्षेत्रों पर शर्मा ने अपनी नजर बताई, उनमें टेक्नोलॉजी प्रमुख है। उनका तर्क है कि अमेरिका और एशिया के कई सफल बाजारों में टेक्नोलॉजी कंपनियों की बड़ी भूमिका है, जबकि भारतीय बेंचमार्क इंडेक्स में शुद्ध टेक्नोलॉजी कारोबार का प्रतिनिधित्व सीमित है।
उन्होंने टेक्नोलॉजी कंपनियों में, खासकर अनलिस्टेड कंपनियों में, आक्रामक निवेश अवसर तलाशने की बात कही। लेकिन साथ ही यह भी माना कि टेक्नोलॉजी निवेश बहुत जोखिम भरा हो सकता है और कुछ कंपनियां सफल होने के बजाय पूरी तरह विफल भी हो सकती हैं। इसलिए टेक्नोलॉजी को अवसर के साथ जोखिम के रूप में देखना जरूरी है। अनलिस्टेड शेयरों में कम लिक्विडिटी, वैल्यूएशन की अनिश्चितता और बाहर निकलने में कठिनाई अतिरिक्त जोखिम पैदा कर सकती है।
निवेशकों के लिए क्या है सबसे बड़ी सीख?
शंकर शर्मा की पूरी बातचीत का सार यह है कि निवेश का फैसला केवल किसी एक इंडेक्स, देश या एसेट के पिछले रिटर्न के आधार पर नहीं होना चाहिए। बाजार की चौड़ाई, करेंसी, लिक्विडिटी और जोखिम के साथ पोर्टफोलियो में विविधता भी मायने रखती है। भारत, अमेरिका, यूरोप और उभरते बाजारों में अलग-अलग अवसर हो सकते हैं, लेकिन किसी भी बाजार को हमेशा के लिए सबसे बेहतर मानना सही नहीं है। निवेशक अपनी वित्तीय जरूरतों, निवेश अवधि और नुकसान सहने की क्षमता के हिसाब से ही रणनीति बनाएं।
