क्या है खर्च कंट्रोल करने वाले 72 घंटे का रूल?

72 घंटे का नियम (72-Hour Rule) गैर-जरूरी चीजें खरीदने से पहले खुद को 3 दिन का समय देने का फॉर्मूला है। यह शॉपिंग की तात्कालिक उत्सुकता को शांत कर आपको इम्पल्स बाइंग और फालतू खर्चों से बचाकर बड़ी बचत कराता है।

आज के डिजिटल और ई-कॉमर्स के दौर में, जहाँ सिर्फ एक क्लिक पर कोई भी सामान हमारे घर पहुंच जाता है, बिना सोचे-समझे पैसे खर्च करने यानी 'इम्पल्स बाइंग' (Impulse Buying) की आदत लोगों की वित्तीय स्थिति को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचा रही है, और इसी आदत पर लगाम लगाने के लिए वित्तीय विशेषज्ञों द्वारा '72 घंटे का नियम' (72-Hour Rule) अपनाने की सलाह दी जाती है जो आपके फालतू खर्चों को नियंत्रित करने का एक बेहद सरल और सुपरहिट फॉर्मूला है। व्यक्तिगत वित्त प्रबंधन (Personal Finance Management) का यह नियम बेहद व्यावहारिक है, जिसके अनुसार जब भी आपका मन किसी ऐसी गैर-जरूरी चीज को खरीदने का करे जो आपकी बुनियादी आवश्यकताओं में शामिल नहीं है, तो उसे तुरंत खरीदने के बजाय खुद को पूरे 3 दिन यानी 72 घंटे का अनिवार्य समय दें।

Rule of 72

72 घंटे का रूल क्या है?

मनोवैज्ञानिक और वित्तीय शोध बताते हैं कि शॉपिंग करते समय हमारा दिमाग लगभग 80 प्रतिशत फैसला भावनाओं (Emotions) के वशीभूत होकर लेता है, क्योंकि किसी नई और आकर्षक चीज को देखकर दिमाग में डोपामाइन का स्तर बढ़ जाता है जो हमें उसे तुरंत खरीदने के लिए उकसाता है, लेकिन जैसे ही आप इस 72 घंटे के नियम को लागू करते हैं और खरीदारी को टाल देते हैं, तो वह तात्कालिक उत्सुकता और उत्साह धीरे-धीरे शांत हो जाता है। इस तीन दिनों के कूलिंग-ऑफ पीरियड (Cooling-off Period) के बीत जाने के बाद आपका दिमाग पूरी तरह से तार्किक (Logical) और व्यावहारिक तरीके से सोचने के लिए स्वतंत्र हो जाता है, जिससे आप खुद से यह सच्चा और निष्पक्ष सवाल पूछ पाते हैं कि क्या आपको वाकई उस वस्तु की सख्त जरूरत है या आप सिर्फ एक पल की अस्थायी खुशी के लिए अपनी गाढ़ी कमाई को बर्बाद करने जा रहे थे।

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