Financial Planning : वित्तीय सुरक्षा के लिहाज से हर व्यक्ति के जीवन में एक ऐसा समय आ सकता है जब उसकी आय अचानक बंद हो जाए। नौकरी छूटना, कारोबार में मंदी आना या फिर कोई गंभीर मेडिकल एमरजेंसी, ऐसे समय में घर खर्च चलाना बेहद मुश्किल हो जाता है। ऐसे ही संकटों से निपटने के लिए इमरजेंसी फंड यानी आपातकालीन निधि की जरुरत होती है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि इमरजेंसी फंड की गणना केवल आपकी सैलरी के आधार पर नहीं, बल्कि आपके घर के जरूरी खर्चों और आय के दोबारा शुरू होने में लगने वाले समय के आधार पर की जानी चाहिए। बाजार के जानकारों और फाइनेंशियल एक्सपर्ट्स के अनुसार, अलग-अलग लोगों के लिए इस फंड का आकार भी अलग हो सकता है।
किसको कितने महीनों का फंड रखना चाहिए?
एक्सपर्ट्स के मुताबिक हर व्यक्ति की नौकरी की स्थिति और पारिवारिक जिम्मेदारियां अलग होती हैं। अगर किसी घर में पति-पत्नी दोनों कमाने वाले हैं और दोनों की नौकरियां स्थिर हैं, साथ ही उनके पास पर्याप्त हेल्थ इंश्योरेंस भी है, तो उनके लिए कम से कम 6 महीने के खर्च के बराबर इमरजेंसी फंड होना काफी माना जाता है। वहीं, अगर परिवार में कमाने वाला केवल एक ही व्यक्ति है, वह अपने बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल कर रहा है या फिर ऐसी कंपनी में काम करता है जहां छंटनी का खतरा ज्यादा रहता है, तो उसे कम से कम 9 महीने के खर्च के बराबर राशि बचाकर रखनी चाहिए। इसके अलावा, जो लोग खुद का बिजनेस चलाते हैं, फ्रीलांसिंग करते हैं या जिनकी इनकम अनिश्चित होती है, उन्हें कम से कम 12 महीने का इमरजेंसी फंड तैयार रखना चाहिए ताकि वे किसी भी बुरे वक्त से आसानी से पार पा सकें।
फंड की सही राशि की गणना कैसे करें?
अपने इमरजेंसी फंड का टारगेट तय करने के लिए सबसे पहले घर के जरूरी मासिक खर्चों की एक लिस्ट बनाएं। इसमें घर का किराया या होम लोन की किस्त (EMI), राशन, बिजली-पानी के बिल, बच्चों की स्कूल फीस, इंश्योरेंस प्रीमियम, घरेलू सहायकों का वेतन और माता-पिता को दी जाने वाली आर्थिक मदद को शामिल किया जाना चाहिए। सीनियर प्रोफेशनल्स के मामले में यह ध्यान रखना जरूरी है कि उनकी सैलरी भले ही ज्यादा हो, लेकिन उच्च पद पर होने के कारण उन्हें नई नौकरी मिलने में ज्यादा समय लग सकता है। इसलिए, केवल अधिक सैलरी देखकर कम इमरजेंसी फंड का हिसाब लगाना गलत साबित हो सकता है।
किन खर्चों को शामिल करें और किसे छोड़ें?
फंड की प्लानिंग करते समय उन वित्तीय प्रतिबद्धताओं को जरूर शामिल करें जिन्हें संकट के समय टाला नहीं जा सकता। उदाहरण के लिए, होम लोन की ईएमआई न चुकाने से आपका सिबिल (CIBIL) स्कोर खराब हो सकता है, और हेल्थ या टर्म इंश्योरेंस का प्रीमियम लैप्स होने पर परिवार सुरक्षा से वंचित हो सकता है। इसके अलावा, स्कूल की फीस और सालाना इंश्योरेंस प्रीमियम जैसे बड़े खर्चों के लिए भी तैयारी रखनी चाहिए। एक्सपर्ट्स सलाह देते हैं कि केवल औसत मासिक खर्च देखने के बजाय अगले 12 महीने के बड़े भुगतानों का मैप तैयार करें। इसके अलावा, लंबी अवधि के एसआईपी (SIP) निवेश को भी इसमें जगह दी जा सकती है ताकि मेडिकल एमरजेंसी या नौकरी जाने पर रिटायरमेंट की बचत न रुके। हालांकि, लोन के प्री-पेमेंट और गैर-जरूरी खर्चों को इस फंड से बाहर रखा जा सकता है, क्योंकि उन्हें जरूरत पड़ने पर टाला जा सकता है।
कब बढ़ाना चाहिए अपना इमरजेंसी फंड?
इमरजेंसी फंड कोई एक बार तय करने वाली चीज नहीं है, बल्कि इसकी साल में कम से कम एक बार समीक्षा जरूर करनी चाहिए। जब भी आपके जीवन में कोई बड़ा बदलाव आए, जैसे- होम लोन लेना, परिवार में बच्चे का जन्म होना, माता-पिता की जिम्मेदारी बढ़ना या बड़ी कंपनी से स्टार्टअप में जाना, तो इस फंड के आकार को भी बढ़ा देना चाहिए। इसके अलावा, नौकरी छोड़कर खुद का काम शुरू करने या कंपनी द्वारा दिए जाने वाले हेल्थ इंश्योरेंस के खत्म होने पर भी फंड की दोबारा कैलकुलेशन करनी जरूरी है। महंगाई बढ़ने के साथ-साथ पुराने हिसाब से जोड़ा गया फंड आज के समय में कम पड़ सकता है, इसलिए इसे समय-समय पर अपडेट करते रहना चाहिए।
बचत और निवेश के बीच कैसे बनाएं संतुलन?
बहुत कम पैसा बचाना आपको किसी संकट के समय भारी मुसीबत में डाल सकता है, लेकिन जरूरत से ज्यादा पैसा केवल सेविंग अकाउंट में नकद के रूप में रखना भी समझदारी नहीं है, क्योंकि इससे आपके पैसे की ग्रोथ रुक जाती है। इसलिए, इमरजेंसी फंड बनाने से पहले पर्याप्त हेल्थ और टर्म इंश्योरेंस जरूर ले लें, ताकि बड़े मेडिकल खर्चों से बचा जा सके। उद्देश्य यह होना चाहिए कि जरूरत भर का पैसा आसानी से उपलब्ध रहे और बाकी अतिरिक्त पैसा लंबी अवधि की संपत्ति बनाने के लिए निवेश किया जा सके। अपनी पहली सैलरी से ही छोटी राशि से SIP शुरू करें और धीरे-धीरे अपने इमरजेंसी फंड के टारगेट को पूरा करें। लक्ष्य पूरा होने के बाद बचे हुए पैसे को निवेश की तरफ मोड़ दें।
