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Valuation Game : कैसे अरबों डॉलर हो जाती है घाटे में चलने वाली कंपनी की वैल्यू?

अक्सर यह देखने को मिलता है कि कई कंपनियां लगातार घाटे में होती हैं। लेकिन, इसके बाद भी इन कंपनियों को अरबों डॉलर का वैल्यूएशन मिल जाता है। आखिर यह वैल्यूएशन कैसे तय होता?

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वैल्यूएशन का खेल

Valuation Game : किसी कंपनी का घाटा हजारों करोड़ रुपये में हो, फिर भी निवेशक उसमें अरबों डॉलर लगाने के लिए तैयार हों, तो सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर उस कंपनी की कीमत तय कैसे होती है?

क्या निवेशक मुनाफे के बजाय सिर्फ भविष्य की कहानी पर पैसा लगाते हैं? और क्या ऊंची वैल्यूएशन का मतलब यह है कि कंपनी वास्तव में उतनी ही अमीर है?

स्टार्टअप की दुनिया में इसका जवाब छिपा है Valuation Game में। यहां कंपनी की कीमत सिर्फ इस बात से तय नहीं होती कि उसने आज कितना मुनाफा कमाया है।

निवेशक यह भी देखते हैं कि आने वाले वर्षों में कंपनी कितना बड़ा कारोबार खड़ा कर सकती है, उसके ग्राहक कितने तेजी से बढ़ रहे हैं और भविष्य में वह कितना पैसा कमा पाएगी। लेकिन इसी गणित में जोखिम भी छिपा है। भविष्य की उम्मीदें पूरी नहीं हुईं, तो अरबों डॉलर की वैल्यूएशन भी तेजी से घट सकती है।

आज का घाटा, कल के मुनाफे की उम्मीद

किसी पारंपरिक कंपनी को देखें, तो उसकी कमाई, मुनाफा, कर्ज और नकदी के आधार पर वैल्यूएशन करना अपेक्षाकृत आसान होता है। लेकिन तेजी से बढ़ रहे टेक स्टार्टअप के मामले में यह तरीका हमेशा काम नहीं करता।

मान लीजिए कि एक कंपनी सालाना ₹100 करोड़ का रेवेन्यू कमा रही है, लेकिन मार्केटिंग, टेक्नोलॉजी और कारोबार बढ़ाने पर ₹150 करोड़ खर्च कर देती है। नतीजा हुआ ₹50 करोड़ का घाटा।

अब निवेशकों को लगता है कि अगले 5 वर्षों में कंपनी का रेवेन्यू कई गुना बढ़ सकता है और कारोबार स्थापित होने के बाद खर्च की तुलना में कमाई तेजी से बढ़ेगी। ऐसे में वे मौजूदा घाटे के बावजूद कंपनी में निवेश कर सकते हैं।

वैल्यूएशन का गणित कैसे काम करता है?

कंपनियों की वैल्यूएशन के लिए कई तरीके इस्तेमाल होते हैं। इनमें भविष्य के कैश फ्लो का आकलन करने वाला डिस्काउंटेड कैश फ्लो (DCF), समान कंपनियों से तुलना और रेवेन्यू मल्टीपल प्रमुख हैं।

घाटे में चल रही कंपनी के लिए Price-to-Earnings (P/E) रेशियो ज्यादा उपयोगी नहीं होता, क्योंकि उसका मुनाफा ही नहीं है या नकारात्मक है। ऐसे में निवेशक Price-to-Sales (P/S) या Enterprise Value-to-Revenue जैसे पैमानों पर भी नजर डाल सकते हैं।

अगर किसी कंपनी का सालाना रेवेन्यू ₹100 करोड़ है और काल्पनिक तौर पर निवेशक उसे 10 गुना रेवेन्यू मल्टीपल देते हैं, तो उसकी इक्विटी वैल्यूएशन ₹1,000 करोड़ हो सकती है।

OpenAI की वैल्यूएशन में क्या है खास?

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की दौड़ इसका बड़ा उदाहरण है। ChatGPT बनाने वाली OpenAI के मामले में निवेशक सिर्फ मौजूदा कमाई नहीं, बल्कि AI सेवाओं की संभावित मांग, एंटरप्राइज कारोबार और भविष्य के राजस्व को भी महत्व देते हैं।

फाइनेंशियल टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, OpenAI की मार्च 2026 की फंडिंग से जुड़ी वैल्यूएशन करीब 852 अरब डॉलर थी। 23 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट में इसके अगले फंडिंग राउंड के लिए करीब 1.25 ट्रिलियन डॉलर की वैल्यूएशन पर बातचीत का उल्लेख किया गया, जबकि पहले 1.4 ट्रिलियन डॉलर का लक्ष्य बताया गया था।

भारत में Swiggy का उदाहरण क्या बताता है?

वैल्यूएशन की कहानी का दूसरा पहलू Swiggy के शेयर में आई गिरावट से समझा जा सकता है। 23 अक्टूबर 2026 को Reuters की रिपोर्ट के अनुसार, Swiggy का शेयर करीब 15% गिरकर ₹179.90 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया। नवंबर 2024 में बाजार में लिस्टिंग के बाद से शेयर अपनी आधी से ज्यादा वैल्यू गंवा चुका था।

कंपनी के क्विक-कॉमर्स कारोबार Instamart का एडजस्टेड कोर लॉस सितंबर तिमाही में बढ़कर ₹895 करोड़ हो गया, जबकि एक साल पहले यह ₹849 करोड़ था। इसके विपरीत, प्रतिस्पर्धी Blinkit ने इसी अवधि में ₹184 करोड़ का एडजस्टेड कोर प्रॉफिट दर्ज किया।

असली खेल है Unit Economics का

किसी कंपनी की वैल्यूएशन को समझने के लिए Unit Economics बेहद अहम है। एक ग्राहक या एक ऑर्डर से कंपनी कितना कमाती है और उसे हासिल करने तथा सेवा देने में कितना खर्च होता है? अगर प्रत्येक अतिरिक्त ऑर्डर पर कंपनी का नुकसान कम हो रहा है, ग्राहक दोबारा खरीदारी कर रहे हैं और कारोबार बढ़ने के साथ प्रति ग्राहक लागत घट रही है, तो निवेशकों को भविष्य में मुनाफे की संभावना दिख सकती है।

इसके उलट, अगर हर नए ग्राहक या ऑर्डर के साथ नुकसान और बढ़ रहा है, तो केवल बिक्री बढ़ना अच्छी खबर नहीं है। ऐसी स्थिति में बड़े पैमाने पर विस्तार कंपनी की नकदी की जरूरत को और बढ़ा सकता है। इसलिए निवेशकों को कंपनी का रेवेन्यू, ग्रॉस मार्जिन, कैश बर्न, ग्राहक बनाए रखने की क्षमता और ब्रेक-ईवन तक पहुंचने की योजना एक साथ देखनी चाहिए।

Yateendra Lawaniya
यतींद्र लवानियाauthor

प्रिंट और डिजिटल मीडिया में बिजनेस एवं इकोनॉमी कैटेगरी में 10 वर्षों से अधिक का अनुभव। पिछले 7 वर्षों से शेयर बाजार, कॉरपोरेट सेक्टर और आर्थिक नीतियों से जुड़ी खबरों पर विशेष पकड़। लेखन में केवल हेडलाइन तक सीमित न रहकर आंकड़ों, नीतिगत फैसलों और कॉरपोरेट दावों के पीछे की वास्तविक तस्वीर को बैलेंस्ड और आसान शब्दों में पाठकों तक पहुंचाने का प्रयास। वर्तमान में Times Now Hindi के लिए बाजार की हर हलचल और आर्थिक घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं।

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