10 महीने, भारी टैक्स और फिर कोर्ट का ऑर्डर, 'लिबरेशन डे' से शुरू हुआ ट्रंप का टैरिफ कैसे पहुंचा अंजाम तक?

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा शुरू किए गए 'टैक्स युद्ध' ने पिछले 10 महीनों में वैश्विक अर्थव्यवस्था की तस्वीर बदल दी है। 'लिबरेशन डे' के नाम से विदेशी सामानों पर भारी शुल्क (Tariff) लगाने के ऐलान से लेकर अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट द्वारा इसे अवैध करार देने तक, यह सफर काफी उतार-चढ़ाव वाला रहा है। भारत सहित दुनिया भर के बाजारों में मची उथल-पुथल और देशों के बीच बढ़ते व्यापारिक तनाव के बीच, यह टाइमलाइन समझना बेहद जरूरी है कि कैसे एक प्रशासनिक फैसला कानूनी लड़ाई और बड़े व्यापारिक समझौतों की वजह बना।

अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा लगाए गए व्यापक 'टैरिफ' (आयात शुल्क) को अवैध करार दे दिया है। 6-3 के बहुमत से आए इस फैसले ने पिछले एक साल से चल रहे वैश्विक 'ट्रेड वॉर' की दिशा बदल दी है। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि राष्ट्रपति 'राष्ट्रीय आपातकाल' के कानूनों का सहारा लेकर पूरी दुनिया पर मनमाना टैक्स नहीं थोप सकते। कोर्ट के मुताबिक, संविधान के तहत टैक्स और टैरिफ तय करने की असली शक्ति संसद (Congress) के पास है, न कि अकेले राष्ट्रपति के पास। इस फैसले ने न केवल वैश्विक बाजारों को राहत दी है, बल्कि ट्रंप के 'अमेरिका फर्स्ट' एजेंडे को एक बड़ी कानूनी चुनौती भी दी है।

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The 'Liberation Day' Origin

इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत 2 अप्रैल 2025 को हुई थी, जिसे ट्रंप ने 'लिबरेशन डे' (Liberation Day) का नाम दिया था। इस दिन ट्रंप प्रशासन ने भारत सहित कई देशों से आने वाले सामानों पर 26% तक का अतिरिक्त टैरिफ लगा दिया था। उनका मकसद अमेरिकी मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देना था, लेकिन इसका नतीजा वैश्विक बाजारों में भारी गिरावट और अंतरराष्ट्रीय तनाव के रूप में निकला। स्थिति इतनी बिगड़ गई कि महज एक हफ्ते बाद, 9 अप्रैल को बाजार के दबाव में आकर इन शुल्कों को 90 दिनों के लिए टालना पड़ा था।

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