Parsi Bodies Appeal to PM Modi : टाटा संस की संभावित शेयर बाजार लिस्टिंग के बीच 6 पारसी और जोरोएस्ट्रियन संगठनों ने PM मोदी को पत्र लिखकर टाटा ट्रस्ट्स और टाटा परिवार के प्रति समर्थन जताया है।
संगठनों ने चेतावनी दी है कि टाटा संस के मौजूदा मालिकाना और गवर्नेंस ढांचे में बदलाव से समूह की पहचान, सामाजिक जिम्मेदारी और परोपकार की परंपरा प्रभावित हो सकती है। उनका कहना है कि यह मामला केवल कॉरपोरेट गवर्नेंस या शेयरधारकों के हितों तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के एक प्रतिष्ठित संस्थान के भविष्य से जुड़ा है।
पत्र में संगठनों ने टाटा संस के मौजूदा मालिकाना ढांचे को लंबे समय के लक्ष्यों, नैतिक कारोबारी मूल्यों और सामाजिक जिम्मेदारी से जोड़ा है। उनका तर्क है कि टाटा ट्रस्ट्स की बहुमत हिस्सेदारी ने समूह को ऐसे फैसले लेने की गुंजाइश दी है, जिनका फायदा तुरंत नहीं, बल्कि लंबे समय में मिलता है।
कौन से संगठनों ने लिखा पत्र?
यह संयुक्त पत्र 7 अक्टूबर को लिखा गया था। इस पर 6 प्रमुख पारसी और जोरोएस्ट्रियन संगठनों की ओर से हस्ताक्षर किए गए हैं। इनमें बॉम्बे पारसी पंचायात (BPP), फेडरेशन ऑफ पारसी जोरोएस्ट्रियन अंजुमन्स ऑफ इंडिया (FPZAI), फेडरेशन ऑफ जोरोएस्ट्रियन एसोसिएशंस ऑफ नॉर्थ अमेरिका (FEZANA), जोरोएस्ट्रियन ट्रस्ट फंड्स ऑफ यूरोप (ZTFE), ग्लोबल काउंसिल ऑफ जोरोएस्ट्रियंस ट्रस्ट (GCZT) और वर्ल्ड जोरोएस्ट्रियन चैंबर ऑफ कॉमर्स (WZCC) शामिल हैं।
क्या है पारसी समुदाय की मांग?
पारसी संगठनों ने अपने पत्र में है कि टाटा संस की लिस्टिंग पर बहस को केवल नियामकीय या तकनीकी सवाल के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। क्योंकि, इसकी वजह से टाटा ग्रुप का मूल चरित्र प्रभावित हो सकता है।
पत्र में कहा गया है कि अगर कंपनी शेयर बाजार में लिस्ट होती है और बाजार के छोटे समय के रिटर्न का दबाव बढ़ता है, तो इस संतुलन पर असर पड़ सकता है। इस पूरे विवाद के केंद्र में टाटा संस है, जो टाटा ग्रुप की होल्डिंग कंपनी है।
टाटा ट्रस्ट्स के पास इसमें करीब 66% हिस्सेदारी है। टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा का विरोध इसी आशंका से जुड़ा है कि लिस्टिंग से मौजूदा मालिकाना व्यवस्था और समूह की दीर्घकालिक फैसले लेने की क्षमता प्रभावित हो सकती है।
नोएल टाटा ने भी मांगा पीएम मोदी से समय
इससे पहले टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा ने भी प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) से मुलाकात का समय मांगा था। उनका उद्देश्य टाटा संस की लिस्टिंग का विरोध करने के पीछे ट्रस्ट्स का पक्ष और संभावित विकल्प समझाना बताया गया था। उस समय रिपोर्ट में कहा गया था कि मुलाकात का समय तय नहीं हुआ था।
इस मामले में टाटा ट्रस्ट की तरफ नोएल टाटा का तर्क है कि मौजूदा ढांचे के कारण टाटा संस जरूरत पड़ने पर समूह की कंपनियों को सहारा दे सकती है, मुश्किल दौर से गुजर रही कंपनियों में पूंजी लगा सकती है और ऐसे कारोबारों में लंबी अवधि का निवेश कर सकती है, जिनसे तत्काल मुनाफा नहीं मिलता। सार्वजनिक शेयरधारकों के वित्तीय रिटर्न पर बढ़ते फोकस से इन फैसलों पर दबाव आने की आशंका जताई गई है।
टाटा ट्रस्ट्स के पक्ष में क्यों उतरे पारसी संगठन?
पारसी संगठनों की चिंता केवल एक कंपनी की शेयरहोल्डिंग तक सीमित नहीं है। पत्र में टाटा की परोपकारी विरासत और भारत के संस्थानों के विकास में उसके योगदान का जिक्र किया गया है।
संगठनों ने जमशेदजी टाटा, जेआरडी टाटा, होमी भाभा, फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ और नानी पालखीवाला जैसी हस्तियों का उल्लेख करते हुए कहा कि संख्या में छोटा होने के बावजूद पारसी समुदाय ने देश की प्रगति में उल्लेखनीय योगदान दिया है।
पत्र में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस, टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च, टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज और टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल जैसे संस्थानों को भी टाटा की परोपकारी सोच से जोड़ा गया है। संगठनों के अनुसार, इस विरासत को सुरक्षित रखना केवल टाटा परिवार या पारसी समुदाय का मामला नहीं, बल्कि व्यापक राष्ट्रीय हित से जुड़ा विषय है।
