IT Job to Farming : अच्छी सैलरी वाली जॉब छोड़कर खेती में उतरना जोखिम भरा फैसला हो सकता है। शशि कुमार ने 2010 में यह जोखिम लिया। करीब 12 साल तक विप्रो में लीड आर्किटेक्ट के तौर पर काम करने के बाद उन्होंने कॉरपोरेट नौकरी छोड़ दी और खेती को अपना करियर बनाने की ठानी। इसके बाद का सफर आसान नहीं था। कारोबार करीब 10 बार ऐसे दौर में पहुंचा, जब दिवालिया होने जैसे हालात बन गए। परिवार में भी इस फैसले को लेकर लंबे समय तक नाराजगी रही। लेकिन कुमार पीछे नहीं हटे। आज वह अक्षयकल्प ऑर्गेनिक के संस्थापक और CEO हैं। कंपनी डेयरी और खेती के क्षेत्र में काम करती है और करीब 2,800 किसानों के साथ जुड़ी हुई है। यह नेटवर्क करीब 2,800 गांवों तक फैला है। कंपनी का कारोबार अब करीब 600 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है।
आईटी जॉब छोड़ शुरू की फार्मिंग
कॉलेज के दिनों से था खेती का ख्याल
इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक शशि कुमार का खेती से जुड़ाव 2010 में नौकरी छोड़ने के बाद शुरू नहीं हुआ था। इसकी शुरुआत काफी पहले हो चुकी थी। 1991 में जब वह कॉलेज में पढ़ रहे थे, तब उन्होंने अपने पिता से पूछा था कि क्या उनकी पुश्तैनी जमीन पर प्राकृतिक खेती की जा सकती है। लेकिन उनके पिता, जो खुद किसान थे, चाहते थे कि बच्चे खेती की बजाय किसी दूसरे पेशे में जाएं। उन्होंने बेटे को सॉफ्टवेयर के क्षेत्र में करियर बनाने की सलाह दी। कुमार ने पिता की बात मानी और टेक्नोलॉजी की दुनिया में कदम रखा। लेकिन खेती का विचार उनके मन में बना रहा।
खेती सिर्फ गुजारे का साधन नहीं
कॉलेज के दिनों में उनकी मुलाकात उडुपी के पास प्राकृतिक खेती करने वाले चेरकाडी रामचंद्र राव से हुई। राव के पास करीब दो एकड़ जमीन थी और वह नारियल, काली मिर्च, अनानास, सब्जियां, धान, मोटे अनाज और आम जैसी कई फसलें उगाते थे। कुमार उनके खेत पर बार-बार जाते रहे। वहां उन्होंने सिर्फ खेती करना नहीं सीखा, बल्कि खेती को कारोबार की तरह देखना भी सीखा। राव जरूरत के हिसाब से अपनी उपज का इस्तेमाल करते, कुछ हिस्सा बेचते और बची रकम को बचाकर रखते थे। कुमार को यह मॉडल बेहद अलग लगा। उन्हें महसूस हुआ कि खेती सिर्फ गुजारे का साधन नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित और कमाई देने वाला व्यवसाय भी हो सकती है।
40 लाख के उधार से मिला नया जीवन
कारोबार का संकट अकेला नहीं था। व्यक्तिगत स्तर पर भी इस फैसले की कीमत चुकानी पड़ी। कुमार के पिता ने उनके खेती के फैसले को स्वीकार नहीं किया। स्थिति इतनी बिगड़ी कि उनके पिता ने करीब 8 साल तक उनसे बात नहीं की। विडंबना यह थी कि उनके पिता खुद खेती करते थे, लेकिन वह नहीं चाहते थे कि उनकी अगली पीढ़ी खेती को अपना पेशा बनाए। जब कारोबार मुश्किल दौर में था, तब परिवार से ही बड़ी मदद मिली। कुमार की पत्नी शिल्पा ने अपनी बचत में से 30 लाख रुपये कारोबार में लगाए। उनके चाचा डॉ. मुनी रेड्डी ने भी 10 लाख रुपये का निवेश किया। कुल 40 लाख रुपये की इस मदद ने उस समय कारोबार को संभालने में अहम भूमिका निभाई और कंपनी को आगे बढ़ने का मौका मिला।
डेयरी से शुरू हुई रोज की आमदनी
अक्षयकल्प ऑर्गेनिक की शुरुआती सोच खेती की एक बड़ी समस्या से जुड़ी थी कि किसानों की आय कई फसलों में मौसम और फसल चक्र पर निर्भर रहती है। कंपनी ने डेयरी को अपने मॉडल का हिस्सा बनाया ताकि किसान परिवारों को ज्यादा नियमित नकदी प्रवाह मिल सके। दूध का कारोबार उन्हें लगातार आय का जरिया देता है, जबकि खेती से मिलने वाली कमाई अपेक्षाकृत मौसमी हो सकती है। इसके बाद कंपनी ने अपने मॉडल को सिर्फ दूध तक सीमित नहीं रखा। मिट्टी के प्रबंधन, मधुमक्खी पालन, पोल्ट्री, केले की खेती और जैविक खाद जैसे क्षेत्रों को भी इसमें जोड़ा गया। इसका मकसद किसानों को एक ही आय स्रोत पर निर्भर रहने से बचाना और उनकी कुल कमाई बढ़ाना था।
2,800 गांवों तक पहुंचा नेटवर्क
आज अक्षयकल्प ऑर्गेनिक करीब 2,800 गांवों तक फैला हुआ है। कंपनी के मुताबिक, पिछले वित्त वर्ष में उनके साथ खेती करने वाले परिवारों को औसतन करीब 1.28 लाख रुपये का मासिक भुगतान मिला है। यही मॉडल अक्षयकल्प की कहानी को बाकी एग्री कंपनियों से अलग बनाता है। यहां फोकस सिर्फ ऑर्गेनिक प्रोडक्ट बेचने पर नहीं, बल्कि किसान की आय बढ़ाने पर भी है। समय के साथ कंपनी ने सिर्फ खेती और किसानों के नेटवर्क पर ध्यान नहीं दिया, बल्कि अपने उपभोक्ता कारोबार का भी विस्तार किया। इस मॉडल में किसान से लेकर अंतिम ग्राहक तक की पूरी वैल्यू चेन को जोड़ने की कोशिश की गई। इससे कंपनी को उत्पाद की गुणवत्ता और सप्लाई पर ज्यादा नियंत्रण मिला, जबकि किसानों को भी बाजार से बेहतर तरीके से जोड़ने का रास्ता मिला।
