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नोएल टाटा बनाम एन चंद्रशेखरन: TATA ग्रुप के दो सबसे ताकतवर दिग्गजों के बीच क्यों पड़ी दरार?

एन चंद्रशेखरन के 2027 में पद छोड़ने के ऐलान के साथ टाटा ग्रुप बदलाव के दौर में प्रवेश कर चुका है। बड़ा सवाल यह है कि नया नेतृत्व टाटा की साख को आगे किस दिशा में ले जाता है।

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नोएल टाटा बनाम एन चंद्रशेखरन
Authored by: Alok Kumar
Updated Aug 14, 2026, 13:42 IST
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साल 1987 में TCS (टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज) में बतौर इंटर्न अपने करियर की शुरुआत करने वाले एन चंद्रशेखरन (नटराजन चंद्रशेखरन) ने अपनी कड़ी मेहनत और नेतृत्व क्षमता के दम पर 2009 में TCS के CEO और फिर 2017 में टाटा संस के चेयरमैन बने। अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने एयर इंडिया के अधिग्रहण और डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन जैसे बड़े फैसलों से टाटा ग्रुप को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया। हालांकि, करीब 30 तक समूह को अपनी सेवाएं देने के बाद अब उन्होंने टाटा ग्रुप को बाय-बाय बोलने का फैसला किया है।

उन्होंने कहा है कि फरवरी 2027 में मौजूदा कार्यकाल पूरा होने के बाद वह तीसरे कार्यकाल के लिए आवेदन नहीं करेंगे। उनके इस फैसले के पीछे टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा के साथ मतभेद और समूह के भीतर गवर्नेंस को लेकर खींचतान को एक वजह माना जा रहा है। ऐसे में सवाल उठता है कि टाटा समूह के दो ताकतवर चेहरों के बीच दरार क्यों पड़ी और इसका असर आने वाले दिनों में समूह की कंपनियों पर क्या होगा?

चंद्रशेखरन ने क्यों लिया पद छोड़ने का फैसला?

कंपनी से जुड़े सूत्रों का कहना है कि एन. चंद्रशेखरन द्वारा तीसरे कार्यकाल की दौड़ से खुद को बाहर करने के पीछे की मुख्य वजह टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा के साथ बढ़ता मतभेद और टाटा समूह के भीतर जारी अंदरूनी खींचतान है। सूत्रों के मुताबिक, चंद्रशेखरन को आभास हो चुका था कि 18 अगस्त की एजीएम (AGM) में उनके कार्यकाल को लेकर सार्वजनिक और विवादित फैसला लिया जा सकता था, इसलिए उन्होंने किसी भी अप्रिय टकराव या दबाव का सामना करने के बजाय एजीएम से ठीक पहले ही अपनी शर्तों पर पद छोड़ने का रणनीतिक कदम उठाया, ताकि वे अपनी गरिमा बनाए रखते हुए विरोधी गुट की योजनाओं को समय से पहले नाकाम कर सकें।

पिछले छह महीने में बढ़ गया था टकरार

नोएल टाटा और चंद्रशेखरन के बीच पिछले छह महीने से सबुकछ ठीक नहीं चल रहा था। टाटा संस के बोर्डरूम में पहली दरार 24 फरवरी को उस वक्त सामने आई, जब टाटा संस बोर्ड ने एन चंद्रशेखरन का कार्यकाल अगले 5 साल के लिए बढ़ाने का फैसला टाल दिया। इस फैसले के पीछे सबसे बड़ी वजह टाटा संस में 66% हिस्सेदारी रखने वाले टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा की असहमति थी, जिन्होंने समूह की कुछ कंपनियों में नुकसान, कैपिटल डिप्लॉयमेंट और टाटा संस को अनलिस्टेड रखने जैसे मुद्दों पर चिंताएं जताई थीं। बोर्ड के एक सदस्य द्वारा समर्थन न मिलने और सर्वसम्मति के अभाव को देखते हुए चंद्रशेखरन ने खुद इस प्रस्ताव को टालने की पेशकश की थी, जिसके बाद पैदा हुई अनिश्चितता अगले छह महीनों तक बनी रही।

इन कारणों के चलते नाखुश थे नोएल टाटा

जानकारों का कहना है कि टाटा संस के दोनों दिग्गजों (चंद्रशेखरन और नोएल टाटा) के बीच मतभेद की असली वजह केवल रणनीतिक नहीं, बल्कि ग्रुप की सोच और विरासत को लेकर अलग-अलग नजरिया थी। अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, नोएल टाटा को कभी चंद्रशेखरन पर पूरा भरोसा नहीं रहा, क्योंकि उन्हें लगता था कि चंद्रशेखरन अनलिस्टेड कंपनियों के बढ़ते नुकसान को रोकने और टाटा संस को प्राइवेट बनाए रखने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठा रहे थे। जहां नोएल टाटा और पुराने ट्रस्टी टाटा संस को अनलिस्टेड रखकर समूह के पारंपरिक मूल्यों, संस्कृति और लचीलेपन को सुरक्षित रखना चाहते थे, वहीं धारणा यह थी कि चंद्रशेखरन कंपनी को शेयर बाजार में लिस्ट कराने के पक्षधर हो सकते थे। असल में, यह टकराव केवल एक लिस्टिंग का सवाल नहीं था, बल्कि आधुनिक कॉर्पोरेट गवर्नेंस व कैपिटल एलोकेशन और टाटा समूह के दशकों पुराने पारंपरिक ढांचे व विरासत को बचाने के बीच की एक बड़ी वैचारिक जंग थी।

अनलिस्टेड कंपनियों का बढ़ा नुकसान

चंद्रशेखरन के कार्यकाल में एक ओर टाटा ग्रुप की लिस्टेड कंपनियों के रिकॉर्ड प्रदर्शन और 27 लाख करोड़ रुपये के मार्केट कैप के बावजूद, FY26 में एयर इंडिया (₹22,238 करोड़ का घाटा) और टाटा डिजिटल (₹4,974 करोड़ का घाटा) समेत टाटा की 8 अनलिस्टेड कंपनियों को कुल ₹33,538 करोड़ का भारी नुकसान हुआ, जिस पर नोएल टाटा ने गंभीर सवाल उठाए। इसके साथ ही, टाटा संस के चेयरमैन के रूप में एन. चंद्रशेखरन की सैलरी FY18 के ₹55.11 करोड़ से तीन गुना बढ़कर FY26 में ₹158.66 करोड़ हो गई। अनलिस्टेड वेंचर्स में लगातार बढ़ते वित्तीय घाटे और भारी-भरकम एग्जीक्यूटिव सैलरी के इस विरोधाभास ने टाटा संस के भीतर कैपिटल एलोकेशन, कॉर्पोरेट गवर्नेंस और जवाबदेही को लेकर तीखी बहस छेड़ दी, जो आखिरकार नोएल टाटा और चंद्रशेखरन के बीच विवाद का मुख्य कारण बनी।

टाटा साम्राज्य

टाटा साम्राज्य

रतन टाटा के मौत के बाद बिगड़ा समीकरण

अक्टूबर 2024 में रतन टाटा के निधन के बाद नोएल टाटा के चेयरमैन बनने पर टाटा ट्रस्ट्स के भीतर गवर्नेंस, बोर्ड में प्रतिनिधित्व और फैसलों की प्रक्रिया को लेकर अंदरूनी खींचतान शुरू हो गई। मेहली मिस्त्री के बाहर होने और वेणु श्रीनिवासन व विजय सिंह जैसे वरिष्ठ ट्रस्टियों के बीच उपजे मतभेदों से साफ हो गया कि समूह के शीर्ष स्तर पर रतन टाटा के दौर जैसा संस्थागत तालमेल नहीं रहा। इस अंदरूनी कलह को 'पारसी बनाम गैर-पारसी' या 'पुराने बनाम नए' जैसे बयानों से भी जोड़ा गया, लेकिन आधिकारिक दस्तावेजों और कॉर्पोरेट जानकारों के मुताबिक एन. चंद्रशेखरन के पद छोड़ने और इस विवाद के मुख्य कारण पूरी तरह से कॉर्पोरेट गवर्नेंस, ट्रस्टियों की नियुक्ति, बोर्ड में प्रतिनिधित्व, टाटा संस की संभावित लिस्टिंग और अनलिस्टेड कंपनियों का बिजनेस परफॉर्मेंस ही थे।

अब आगे क्या होगा?

अब सबसे बड़ा सवाल है कि टाटा संस का अगला चेयरमैन कौन होगा। टाटा ट्रस्ट्स ने चंद्रशेखरन के उत्तराधिकारी की तलाश की प्रक्रिया शुरू कर दी है। नोएल टाटा की भूमिका इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण होगी, क्योंकि ट्रस्ट्स टाटा संस के नियंत्रक शेयरधारक हैं। यह बदलाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि चंद्रशेखरन के करीब एक दशक के नेतृत्व में टाटा समूह का आकार और कारोबार काफी बढ़ा। अब नए चेयरमैन को सिर्फ कारोबार नहीं संभालना होगा, बल्कि टाटा संस और टाटा ट्रस्ट्स के बीच संतुलन, बड़े निवेशों पर जवाबदेही और समूह की भविष्य की दिशा भी तय करनी होगी।

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