India China Relation : भारत और चीन के रिश्तों में गलवान के बाद जमी बर्फ अब धीरे-धीरे पिघलती दिख रही है। सितंबर में नई दिल्ली में होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन (18th BRICS Summit) से पहले चीन से जुड़ी पूंजी का भारत में आना तेज हुआ है। सरकार के संशोधित विदेशी निवेश नियमों के बाद अब तक 29 निवेश प्रस्ताव करीब 4,895.65 करोड़ रुपये के सामने आए हैं। इन प्रस्तावों का बड़ा हिस्सा ऐसे वैश्विक निवेशकों से जुड़ा है, जिनकी कंपनियों में चीन या भारत से जमीन सीमा साझा करने वाले देशों की गैर-नियंत्रित हिस्सेदारी है।
भारत चीन के संबंधों में सुधार
यह बदलाव ऐसे समय आया है जब चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के सितंबर में भारत आने की संभावना जताई जा रही है। 12-13 सितंबर को नई दिल्ली में होने वाले ब्रिक्स सम्मेलन में जिनपिंग की भागीदारी की तैयारी चल रही है, हालांकि उनकी यात्रा की आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है। इसी बीच राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल 25वें दौर की विशेष प्रतिनिधि वार्ता के लिए बीजिंग पहुंचे हैं, जहां उनकी चीन के विदेश मंत्री वांग यी से सीमा विवाद पर बातचीत होनी है।
4,900 करोड़ रुपये का निवेश क्यों है खास?
भारत सरकार के मुताबिक 20 अगस्त, 2026 तक संशोधित ढांचे के तहत 29 विदेशी निवेश प्रस्ताव रिपोर्ट किए गए हैं, जिनका कुल प्रस्तावित मूल्य 4,895.65 करोड़ रुपये है। निवेश सूचना प्रौद्योगिकी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सूचना एवं संचार, मैन्युफैक्चरिंग, फार्मा, डाटा सेंटर और ट्रांसपोर्ट जैसे क्षेत्रों में है। इन प्रस्तावों को सीधे चीन से आया हुआ पूरा निवेश मानना सही नहीं होगा। सरकार के आंकड़ों के मुताबिक निवेशक संस्थाएं मॉरीशस, अमेरिका, दक्षिण कोरिया, जापान, सिंगापुर, लक्जमबर्ग और केमैन आइलैंड्स जैसे देशों में आधारित हैं। खास बात यह है कि संशोधित नियमों का इस्तेमाल उन वैश्विक कंपनियों और फंडों के लिए आसान हुआ है, जिनमें चीन की गैर-नियंत्रित हिस्सेदारी 10 फीसदी तक है। फिर भी इस रकम का महत्व इसलिए है क्योंकि यह उन वर्षों के बाद आई है जब चीन से जुड़ी पूंजी के लिए भारत में निवेश का रास्ता बेहद मुश्किल हो गया था।
चीन से निवेश पर लगा ब्रेक कैसे हटा?
2020 में भारत ने प्रेस नोट तीन के तहत भारत के साथ जमीन सीमा साझा करने वाले देशों से आने वाले विदेशी निवेश पर सरकारी मंजूरी अनिवार्य कर दी थी। इसका असर सबसे ज्यादा चीन पर पड़ा। अब सरकार ने इस नीति को पूरी तरह खत्म नहीं किया, बल्कि कैलिब्रेटेड तरीके से बदला है। संशोधित नियमों के तहत किसी विदेशी कंपनी में चीन या अन्य भूमि-सीमा वाले देश की गैर-नियंत्रित लाभकारी हिस्सेदारी 10 फीसदी तक होने पर ऑटोमैटिक रूट से निवेश की अनुमति दी गई है, बशर्ते संबंधित सेक्टर की दूसरी शर्तें पूरी हों। लेकिन चीन में रजिस्टर्ड कंपनियों को भारत में सीधे निवेश के लिए अब भी सरकारी मंजूरी की जरूरत है। यानी भारत ने चीनी निवेश के लिए दरवाजा पूरी तरह नहीं खोला है।
निवेश से आगे बढ़ा व्यापार का रिश्ता
गर्मी सिर्फ निवेश के आंकड़ों में नहीं दिख रही। भारत और चीन के बीच सीमा व्यापार के पुराने रास्ते भी छह साल बाद फिर खुले हैं। अगस्त में सिक्किम के नाथू ला के जरिए भारत-चीन सीमा व्यापार दोबारा शुरू हुआ। इसके अलावा हिमाचल प्रदेश के शिपकी ला से भी सीमा व्यापार छह साल बाद बहाल किया गया। उत्तराखंड के लिपुलेख मार्ग से भी व्यापार फिर शुरू हुआ। नाथू ला से व्यापार दोबारा शुरू होना खास है, क्योंकि यह भारत और तिब्बत के बीच पुराने कारोबारी मार्गों में से एक है। सीमा व्यापार की बहाली को दोनों देशों के बीच आर्थिक गतिविधियों में वापसी का सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।
डोभाल की बीजिंग यात्रा का बड़ा मतलब
अजीत डोभाल और वांग यी के बीच मंगलवार को होने वाली विशेष प्रतिनिधि वार्ता का मुख्य मुद्दा सीमा विवाद है। लेकिन इसका समय अहम है। यह बातचीत ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से कुछ ही हफ्ते पहले हो रही है और ऐसे दौर में हो रही है जब दोनों देश पिछले दो वर्षों में धीरे-धीरे अपने संपर्क बहाल कर रहे हैं।
