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अमिताभ कांत ने बताया जब दुनिया ऊर्जा को बना रही हथियार, तो क्या करे भारत?

नीति आयोग के CEO रहे अमिताभ कांत ने दुनिया में ऊर्जा का हथियार बनाए जाने के ट्रेंड के बीच भारत की जरूरतों के साथ भारत की क्या रणनीति होनी चाहिए यह बताया है।

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अमिताभ कांत ने बताया एनर्जी वार में क्या करे भारत

Global Energy War Vs India : दुनिया में अब ऊर्जा सिर्फ आर्थिक विकास का जरिया नहीं रह गई है, बल्कि वैश्विक राजनीति और रणनीतिक दबाव का अहम हथियार भी बनती जा रही है।अमेरिका ऊर्जा और व्यापार का इस्तेमाल अपने रणनीतिक हितों के लिए कर रहा है, जबकि चीन की क्रिटिकल मिनरल्स, इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) कंपोनेंट्स और मैन्युफैक्चरिंग सप्लाई चेन पर मजबूत पकड़ दूसरे देशों के लिए चुनौती बन रही है।

ऐसे में भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए दूसरे देशों पर निर्भरता कैसे कम करे? नीति आयोग के पूर्व CEO और भारत के पूर्व G20 शेरपा अमिताभ कांत ने इस सवाल का जवाब देते हुए घरेलू मैन्युफैक्चरिंग, स्वच्छ ऊर्जा के अलग-अलग विकल्पों और क्रिटिकल मिनरल्स की सप्लाई चेन मजबूत करने पर जोर दिया है।

भारत के सामने क्या है सबसे बड़ी चुनौती?

अमिताभ कांत के मुताबिक, भारत की ऊर्जा सुरक्षा को केवल कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की उपलब्धता तक सीमित नहीं रखा जा सकता। इसमें जरूरी टेक्नोलॉजी पर नियंत्रण, भरोसेमंद सप्लाई चेन और देश के भीतर मजबूत औद्योगिक क्षमता भी शामिल होनी चाहिए। अन्यथा, जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करने की कोशिश में भारत बैटरी, सोलर उपकरणों और दूसरी स्वच्छ ऊर्जा टेक्नोलॉजी के आयात पर निर्भर हो सकता है।

सिर्फ सोलर और विंड से नहीं बनेगा काम

अमिताभ कांत का कहना है कि भारत को ऊर्जा सुरक्षा के लिए किसी एक टेक्नोलॉजी पर निर्भर रहने के बजाय अलग-अलग स्रोतों का मजबूत संयोजन तैयार करना होगा। सोलर और विंड एनर्जी का विस्तार जारी रहना चाहिए, लेकिन इनके साथ हाइड्रोपावर, न्यूक्लियर एनर्जी, ग्रीन हाइड्रोजन, पंप्ड स्टोरेज और बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम की भी अहम भूमिका होगी। सोलर और विंड से बिजली उत्पादन मौसम और उपलब्ध परिस्थितियों के हिसाब से बदल सकता है। इसलिए भारत को ऐसे बिजली सिस्टम की भी जरूरत है, जो जरूरत के समय भरोसेमंद आपूर्ति दे सके।

बैटरी और ग्रीन टेक्नोलॉजी पर जोर देने की जरूरत

अमिताभ कांत के मुताबिक, भारत को केवल स्वच्छ ऊर्जा परियोजनाएं लगाने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इन्हें चलाने वाली टेक्नोलॉजी का निर्माण भी देश में करना होगा। बैटरी सेल, ग्रिड उपकरण और इलेक्ट्रोलाइजर जैसे उत्पादों की घरेलू मैन्युफैक्चरिंग बढ़ाना जरूरी है। इसके लिए रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D), नई टेक्नोलॉजी को अपनाने और प्रशिक्षित कर्मचारियों की उपलब्धता पर भी निवेश करना होगा।

चीन की क्रिटिकल मिनरल्स पर पकड़ चुनौती?

भारत के लिए एक बड़ी चुनौती क्रिटिकल मिनरल्स की सप्लाई चेन है। लिथियम, कोबाल्ट, निकल और रेयर अर्थ जैसे खनिज बैटरी, इलेक्ट्रिक वाहन और दूसरी स्वच्छ ऊर्जा टेक्नोलॉजी के लिए जरूरी हैं। लेकिन, इन खनिजों की ग्लोबल रिफाइनिंग क्षमता में चीन की हिस्सेदारी लगभग 70% से 90% तक है।

इसका मतलब है कि अगर भारत बैटरी और इलेक्ट्रिक वाहन बनाने की क्षमता तो विकसित कर ले, लेकिन जरूरी खनिजों के प्रोसेसिंग और रिफाइनिंग के लिए दूसरे देशों पर निर्भर रहे, तो उसकी ऊर्जा सुरक्षा का जोखिम पूरी तरह खत्म नहीं होगा।

इसके लिए भारत को घरेलू क्षमता बढ़ाने के साथ ही इस तरह के संसाधन संपन्न देशों के साथ रणनीतिक साझेदारी करनी होगी। इसके अलावा स्तेमाल हो चुकी बैटरियों से खनिजों की रीसाइक्लिंग भी इस रणनीति का हिस्सा होनी चाहिए।

AI और डेटा सेंटर बढ़ाएंगे बिजली की जरूरत

भारत में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), डेटा सेंटर और उद्योगों के विस्तार से बिजली की मांग बढ़ने का अनुमान है। अमिताभ कांत के के अनुसार, 2030 तक भारत की बिजली मांग सालाना करीब 6.4% की दर से बढ़ सकती है। ऐसे में सिर्फ बिजली उत्पादन की क्षमता बढ़ाना काफी नहीं होगा। बल्कि, इसके लिए ट्रांसमिशन नेटवर्क, स्टोरेज क्षमता और वितरण व्यवस्था को पहले से मजबूत करना होगा।

Yateendra Lawaniya
यतींद्र लवानियाauthor

प्रिंट और डिजिटल मीडिया में बिजनेस एवं इकोनॉमी कैटेगरी में 10 वर्षों से अधिक का अनुभव। पिछले 7 वर्षों से शेयर बाजार, कॉरपोरेट सेक्टर और आर्थिक नीतियों से जुड़ी खबरों पर विशेष पकड़। लेखन में केवल हेडलाइन तक सीमित न रहकर आंकड़ों, नीतिगत फैसलों और कॉरपोरेट दावों के पीछे की वास्तविक तस्वीर को बैलेंस्ड और आसान शब्दों में पाठकों तक पहुंचाने का प्रयास। वर्तमान में Times Now Hindi के लिए बाजार की हर हलचल और आर्थिक घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं।

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