Drought Explained : भारत में जल संकट लगातार गंभीर होता जा रहा है। कहीं बारिश की कमी से खेत सूख रहे हैं, तो कहीं भूजल का स्तर तेजी से नीचे गिर रहा है। महाराष्ट्र में कम बारिश के कारण राज्य की 358 में से 265 तहसीलों में सूखे जैसी स्थिति घोषित की गई है। यानी राज्य के करीब 74 प्रतिशत तहसील क्षेत्र इस समस्या से प्रभावित हैं। कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और राजस्थान के कुछ हिस्सों में भी पानी की कमी और सूखे का संकट देखने को मिल रहा है। यह स्थिति बताती है कि भारत में जल संकट अब केवल कम बारिश वाले इलाकों तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के कई हिस्सों में पानी की उपलब्धता एक बड़ी चुनौती बन चुकी है। भारत के लिए यह संकट इसलिए भी गंभीर है, क्योंकि दुनिया की करीब 18 प्रतिशत आबादी भारत में रहती है, जबकि दुनिया के कुल मीठे पानी के संसाधनों में देश की हिस्सेदारी केवल करीब 4 प्रतिशत है। ऐसे में बढ़ती आबादी, खेती में पानी की अधिक खपत, भूजल का अंधाधुंध इस्तेमाल और जलवायु परिवर्तन ने समस्या को और बढ़ा दिया है। अल नीनो जैसी मौसमी घटनाएं मानसून को प्रभावित करती हैं, लेकिन सूखे और जल संकट की पूरी जिम्मेदारी केवल मौसम पर डालना सही नहीं होगा। सवाल यह है कि आखिर सूखा पड़ता क्यों है, इसका असर किन क्षेत्रों पर होता है और भारत इस संकट से स्थायी रूप से कैसे निपट सकता है?
क्या होता है सूखा और भारत के लिए यह कितना बड़ा खतरा है?
सूखा ऐसी स्थिति है, जब लंबे समय तक सामान्य से कम बारिश होती है या उपलब्ध पानी जरुरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं रहता। इसका असर केवल खेतों और फसलों पर ही नहीं पड़ता, बल्कि इंसानों, पशुओं, जंगलों और पूरी अर्थव्यवस्था पर दिखाई देता है। सूखे के कारण किसानों की आमदनी घटती है, ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर कम होते हैं और खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ने का खतरा पैदा हो जाता है। भारत में सूखे का खतरा कितना व्यापक है, इसका अंदाजा सूखा एटलस ऑफ इंडिया (1901-2020) से लगाया जा सकता है। इसके अनुसार, देश का करीब दो-तिहाई हिस्सा सूखे की आशंका वाले क्षेत्रों में आता है। इस अवधि में भारत के करीब 56 प्रतिशत क्षेत्र ने मध्यम से लेकर अत्यंत गंभीर सूखे का सामना किया। इससे करीबी 30 करोड़ लोग और 15 करोड़ पशु प्रभावित हुए। फसलों को हुए नुकसान से करीब 8.7 अरब डॉलर का आर्थिक नुकसान हुआ और कृषि सकल घरेलू उत्पाद यानी कृषि जीडीपी में करीब 3.1 फीसदी की कमी आई।
अल नीनो कैसे बढ़ाता है सूखे का खतरा?
अल नीनो (El Nino) प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय हिस्से में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से अधिक होने से जुड़ी जलवायु घटना है। इसका असर दुनिया के कई क्षेत्रों के मौसम पर पड़ता है। भारत में अल नीनो की स्थिति दक्षिण-पश्चिम मानसून को कमजोर करने की आशंका बढ़ा सकती है, हालांकि हर अल नीनो वर्ष में भारत में सूखा पड़े, ऐसा जरूरी नहीं है। भारत को सालाना बारिश का करीब 70 से 80 प्रतिशत हिस्सा जून से सितंबर के बीच दक्षिण-पश्चिम मानसून से मिलता है। अगर मानसून देर से पहुंचे, बीच में लंबे समय तक बारिश रुक जाए या मानसून समय से पहले लौट जाए, तो खेती और जलाशयों पर दबाव बढ़ जाता है। बारिश की कमी का असर नदियों, बांधों, तालाबों और भूजल के स्तर पर भी पड़ सकता है। जलवायु परिवर्तन ने इस समस्या को और जटिल बना दिया है। कई इलाकों में कम समय के भीतर बहुत तेज बारिश होती है, लेकिन उसके बाद लंबे समय तक सूखा बना रहता है। तेज बारिश का पानी अगर जमीन में समाने के बजाय बहकर निकल जाए, तो भूजल को पर्याप्त फायदा नहीं मिलता। इस तरह बारिश का कुल आंकड़ा सामान्य होने के बावजूद पानी की कमी बनी रह सकती है।
सूखे के तीन प्रकार, जिन्हें समझना जरूरी है
- सूखे को मुख्य रूप से तीन कैटेगरी में समझा जाता है। पहली कैटेगरी है मौसम संबंधी सूखा। यह तब होता है, जब किसी क्षेत्र में लंबे समय तक बारिश सामान्य औसत से काफी कम होती है। सामान्य तौर पर बारिश में 26 से 50 प्रतिशत की कमी को मध्यम और 50 प्रतिशत से अधिक की कमी को गंभीर सूखे का संकेत माना जाता है।
- दूसरा है जलवैज्ञानिक यानी हाइड्रोलॉजिकल सूखा। इसमें नदियों, बांधों, तालाबों और भूजल जैसे जल स्रोतों में पानी की उपलब्धता घट जाती है। इसकी वजह केवल कम बारिश नहीं होती। अगर किसी क्षेत्र में पानी का इस्तेमाल उपलब्ध संसाधनों से अधिक हो रहा है, तो सामान्य बारिश के बावजूद जल संकट पैदा हो सकता है।
- तीसरा है कृषि सूखा। यह तब होता है, जब मिट्टी में नमी की कमी के कारण फसलों को पर्याप्त पानी नहीं मिलता। इससे पौधों की वृद्धि रुक सकती है, पैदावार घट सकती है और फसल खराब होने का खतरा बढ़ जाता है। भारत जैसे कृषि प्रधान देश में कृषि सूखे का सीधा असर किसानों की आय, खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।
ज्यादा बारिश वाले इलाके भी क्यों हो रहे हैं पानी के लिए परेशान?
पहले सूखे को मुख्य रूप से राजस्थान जैसे शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों की समस्या माना जाता था। लेकिन अब अधिक बारिश वाले इलाकों में भी पानी की कमी की स्थिति सामने आती है। मेघालय का चेरापूंजी दुनिया के सबसे अधिक बारिश वाले स्थानों में गिना जाता है, फिर भी वहां वर्ष के कुछ लंबे हिस्सों में पानी की कमी की समस्या देखी जाती है। दूसरी ओर, राजस्थान के जैसलमेर जैसे इलाकों में सालाना बारिश बेहद कम होती है। इस अंतर को समझने के लिए केवल बारिश की मात्रा देखना पर्याप्त नहीं है। यह भी देखना जरूरी है कि बारिश कब होती है, पानी जमीन में कितना समाता है, जल स्रोतों को कितना संरक्षित किया जाता है और स्थानीय जरूरतों के मुकाबले पानी की खपत कितनी है। जंगलों की कटाई, तालाबों पर अतिक्रमण और वर्षा जल को सहेजने की कमजोर व्यवस्था पानी की उपलब्धता को प्रभावित कर सकती है।
भारत में पानी का संकट क्यों गहराता जा रहा? (तस्वीर-AI)
इंसानी गतिविधियां भी बढ़ा रही हैं जल संकट
भारत में सूखे का एक बड़ा कारण पानी का असंतुलित इस्तेमाल भी है। कई ऐसे क्षेत्रों में गन्ने और धान जैसी अधिक पानी मांगने वाली फसलें उगाई जाती हैं, जहां पानी के संसाधन सीमित हैं। महाराष्ट्र के मराठवाड़ा जैसे क्षेत्रों में गन्ने की खेती और पंजाब-हरियाणा के कुछ हिस्सों में धान की खेती को लेकर भूजल पर पड़ने वाले दबाव की चर्चा होती रही है। फसलों के चयन पर न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी, सरकारी खरीद और बिजली की लागत जैसे कारकों का भी असर पड़ता है। अगर किसान को पानी बचाने वाली फसलों के लिए पर्याप्त बाजार और उचित कीमत नहीं मिलती, तो फसल बदलना उसके लिए आसान नहीं होता। इसके अलावा, भारत में भूजल का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जाता है। सिंचाई के लिए लगातार गहरे बोरवेल से पानी निकालने पर जमीन के नीचे मौजूद जल भंडार तेजी से घट सकते हैं। जंगलों की कटाई, आर्द्रभूमियों का विनाश और पारंपरिक तालाबों, बावड़ियों तथा जोहड़ों की अनदेखी भी पानी को संचित करने की प्राकृतिक क्षमता कम करती है।
सूखे की पहचान और सरकारी राहत कैसे तय होती है?
भारत में किसी क्षेत्र को सूखा प्रभावित घोषित करने का अंतिम अधिकार राज्य सरकार के पास होता है। केंद्र सरकार के कृषि मंत्रालय के सूखा प्रबंधन मैनुअल, 2009 और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण यानी एनडीएमए के 2010 के दिशानिर्देश इस काम के लिए महत्वपूर्ण संदर्भ प्रदान करते हैं। ये दिशानिर्देश राज्यों को स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार निर्णय लेने की गुंजाइश देते हैं।
सूखे की पहचान के लिए बारिश में कमी, बोए गए क्षेत्र का आंकड़ा, उपग्रह से प्राप्त वनस्पति संबंधी जानकारी और मिट्टी में नमी की स्थिति जैसे संकेतकों का इस्तेमाल किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, जून से सितंबर के बीच सामान्य बारिश के मुकाबले 75 प्रतिशत से कम वर्षा या जून-जुलाई में 50 प्रतिशत से कम वर्षा को सूखे की आशंका के संकेत के रूप में देखा जाता है। हालांकि, सूखा घोषित करने के लिए केवल एक संकेतक के बजाय संबंधित मानकों और स्थानीय परिस्थितियों का आकलन जरूरी होता है।
राहत के लिए सबसे पहले राज्य आपदा मोचन फंड यानी एसडीआरएफ से सहायता दी जाती है। अगर उपलब्ध राशि पर्याप्त नहीं होती, तो केंद्र सरकार की अंतर-मंत्रालयी टीम नुकसान का आकलन करती है। इसके बाद निर्धारित प्रक्रिया के तहत राष्ट्रीय आपदा मोचन फंड यानी एनडीआरएफ से सहायता दी जा सकती है।
साल 2016 में स्वराज अभियान बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सूखे को आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के दायरे में माना। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि सूखे की पहचान और राहत में देरी से जरूरतमंद लोगों को उनके जीवन और सम्मान के लिए जरूरी सहायता मिलने में बाधा आ सकती है।
सूखा प्रबंधन में सबसे बड़ी चुनौतियां क्या हैं?
भारत में सूखे से निपटने की सबसे बड़ी चुनौतियों में समय पर पहचान और राहत पहुंचाने में देरी शामिल है। कई बार फसल को नुकसान होने के बाद आकलन किया जाता है, जिससे किसानों को सहायता मिलने में देर हो सकती है। आधुनिक तकनीक और उपग्रह आधारित निगरानी का पर्याप्त इस्तेमाल इस देरी को कम करने में मदद कर सकता है।
दूसरी समस्या पानी के प्रबंधन से जुड़ी संस्थाओं के बीच बेहतर तालमेल की कमी है। सतही जल और भूजल का प्रबंधन अलग-अलग स्तरों पर होने से पूरे नदी बेसिन और क्षेत्र की जरुरतों को एक साथ समझना कठिन हो सकता है। इसके अलावा, सूखे के दौरान टैंकर भेजने और चारा उपलब्ध कराने जैसे इमरजेंसी उपायों पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है, जबकि संकट आने से पहले पानी बचाने की तैयारी उतनी ही जरूरी है।
ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों को बढ़ावा देने की जरुरत भी बनी हुई है। शुरुआती लागत अधिक होने के कारण छोटे और सीमांत किसान कई बार इन तकनीकों को अपनाने में कठिनाई महसूस करते हैं।
भारत को सूखे से बचाने के लिए क्या हैं स्थायी समाधान?
सूखे का स्थायी समाधान केवल अधिक बांध बनाने या संकट के समय टैंकर भेजने से नहीं निकलेगा। इसके लिए खेती, जल प्रबंधन और स्थानीय प्रशासन में एक साथ बदलाव करना होगा। सबसे पहले, फसलों का चुनाव स्थानीय जल उपलब्धता के हिसाब से किया जाना चाहिए। कम पानी वाले क्षेत्रों में बाजरा, ज्वार, दालों और तिलहनों जैसी फसलों को प्रोत्साहन दिया जा सकता है। इसके लिए किसानों को उचित मूल्य, सरकारी खरीद और बाजार तक पहुंच की गारंटी देने वाले उपाय जरूरी हैं।
दूसरा, प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के तहत 'पर ड्रॉप मोर क्रॉप' जैसे प्रयासों के जरिए ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई का विस्तार किया जाना चाहिए। इससे खेतों तक पानी अधिक कुशलता से पहुंचाया जा सकता है। साथ ही, उपग्रह आधारित निगरानी और मौसम संबंधी पूर्वानुमान का इस्तेमाल बढ़ाकर सूखे के शुरुआती संकेतों की पहचान की जा सकती है।
तीसरा, भूजल के इस्तेमाल पर स्थानीय स्तर पर निगरानी जरूरी है। ग्राम पंचायतें गांव के जल बजट तैयार कर सकती हैं, जिसमें यह आकलन किया जाए कि कितना पानी उपलब्ध है, कितना इस्तेमाल हो रहा है और कितना पानी बचाया जा सकता है। अटल भूजल योजना जैसे प्रयासों से सामुदायिक भागीदारी को बढ़ावा मिल सकता है।
इसके अलावा, पुराने तालाबों, बावड़ियों और जलाशयों की सफाई, वर्षा जल संचयन, चेक डैम का निर्माण और जलग्रहण क्षेत्रों का संरक्षण महत्वपूर्ण है। जल शक्ति अभियान जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से स्थानीय जल स्रोतों को पुनर्जीवित करने पर ध्यान दिया जाना चाहिए। एकीकृत जल प्रबंधन के लिए सतही जल और भूजल से जुड़ी योजनाओं के बीच बेहतर तालमेल भी जरूरी है।
पानी बचाने की तैयारी ही सूखे का असली जवाब
भारत में जल संकट का समाधान केवल अच्छी बारिश की उम्मीद करने से नहीं होगा। अल नीनो और जलवायु परिवर्तन जैसी घटनाएं मानसून को प्रभावित कर सकती हैं, लेकिन पानी की कमी को गंभीर संकट बनने से रोकना काफी हद तक हमारी नीतियों, खेती के तरीकों और जल संरक्षण की आदतों पर निर्भर करता है।
अगर देश को भविष्य में सूखे के असर को कम करना है, तो बारिश की हर बूंद को सहेजने, भूजल का संतुलित इस्तेमाल करने, पानी के अनुकूल फसलें उगाने और स्थानीय जल स्रोतों को बचाने पर जोर देना होगा। सरकार, किसानों और आम लोगों की साझा भागीदारी से ही जल सुरक्षा मजबूत हो सकती है। आज पानी बचाने के लिए उठाए गए कदम ही आने वाले वर्षों में खेती, खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बड़े संकट से बचाने में मदद करेंगे।
