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सोलर सेक्टर में चीन की पाबंदी बनेगी भारत के लिए वरदान! वेफर और सेल निर्माण में मचेगी धूम

India Solar Manufacturing: चीन के नए सौर तकनीक निर्यात प्रतिबंधों से भारत को अपनी घरेलू वेफर और सेल निर्माण क्षमता मजबूत करने का बड़ा मौका मिला है, हालांकि इससे शॉर्ट-टर्म में कच्चे माल, मशीनरी की आपूर्ति बाधित हो सकती है।

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चीन के नए दांव से भारत को मिला मास्टरस्ट्रोक का मौका, सौर ऊर्जा में 'आत्मनिर्भर' बनने की ओर मजबूत कदम!

Photo : iStock

India Solar Manufacturing : चीन ने हाल ही में सौर ऊर्जा से जुड़े उपकरणों और तकनीकों के निर्यात पर पाबंदी लगाने का प्रस्ताव रखा है। चीन के इस कदम से भारत के घरेलू सौर विनिर्माण (सोलर मैन्युफैक्चरिंग) को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। हालांकि, इससे शुरुआती दौर में कुछ रुकावटें भी आ सकती हैं। चीन के वाणिज्य मंत्रालय और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने 16 अक्टूबर को अपनी 'निर्यात प्रतिबंधित तकनीकों की लिस्ट' में सौर पीवी विनिर्माण से जुड़ी 12 नई तकनीकों को शामिल करने का प्रस्ताव रखा है। इस प्रस्ताव पर हितधारकों से 15 नवंबर 2026 तक प्रतिक्रिया मांगी गई है।

किन तकनीकों पर है रोक का प्रस्ताव?

यह प्रस्तावित लिस्ट पॉलीसिलिकॉन, सिलिकॉन वेफर्स और सोलर सेल्स के निर्माण में इस्तेमाल होने वाली तकनीकों के साथ-साथ इनसे जुड़े मुख्य उपकरणों को भी कवर करती है। इन तकनीकों को प्रतिबंधित और नियंत्रित श्रेणियों में बांटा गया है। जेएम फाइनेंशियल की एक रिपोर्ट के अनुसार, यह विकास भारत के लिए सौर विनिर्माण क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने का एक मजबूत आधार तैयार कर सकता है, खासकर वैल्यू चेन के शुरुआती और ऊपरी हिस्सों (जैसे वेफर और इंजोट निर्माण) में। हालांकि, रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट किया गया है कि इसका मतलब यह नहीं है कि भारत में आने वाली सभी चीनी मशीनें या टॉपकॉन (TOPCon) उत्पादन लाइनें तुरंत पूरी तरह बंद हो जाएंगी।

भारत की चीन पर निर्भरता और शॉर्ट-टर्म चुनौतियां

न्यूज एजेंसी एएनआई के मुताबिक भारतीय सौर निर्माता अभी भी कई जरूरी चीजों के लिए चीन पर निर्भर हैं। इनमें विशेष उत्पादन उपकरण, औद्योगिक गैसें, रसायन, स्पेयर पार्ट्स, प्रोसेस सॉफ्टवेयर और कुशल इंजीनियर शामिल हैं। यही निर्भरता भारत के लिए निकट भविष्य में क्षमता विस्तार में एक बड़ा जोखिम बन सकती है। भारत में अभी तक अधिकांश ध्यान केवल सोलर मॉड्यूल असेंबली पर रहा है, जबकि भारत को अब पीछे की तरफ यानी बैकवर्ड इंटीग्रेशन (जैसे वेफर और सेल बनाना) की ओर तेजी से कदम बढ़ाने की जरुरत है। रिपोर्ट के अनुसार, सबसे बड़ा अवसर यहीं पर है, लेकिन यहीं पर तकनीकी और क्रियान्वयन की बाधाएं भी सबसे अधिक हैं।

लागत बढ़ने की संभावना और घरेलू बाजार पर असर

इस पूरी प्रक्रिया के दौरान नए सोलर प्लांट स्थापित करने की लागत बढ़ सकती है। अगर चीनी उपकरणों की आपूर्ति में देरी होती है या भारतीय कंपनियों को यूरोपीय देशों से महंगे उपकरण खरीदने पड़ते हैं, तो विनिर्माण लागत ऊपर जाएगी। इससे देश में सोलर सेल और मॉड्यूल के दाम बढ़ सकते हैं। अगर घरेलू कीमतें बहुत ज्यादा बढ़ती हैं, तो भारत सरकार दिसंबर 2026 के बाद 'एएलएमएम-2' (ALMM-II) के नियमों में और ढील दे सकती है। दूसरी ओर, चीन के निर्यातक तैयार सौर उत्पादों (सेल्स और मॉड्यूल्स) के दाम और कम कर सकते हैं, जिससे वे भारतीय डेवलपर्स को ज्यादा सस्ते और आकर्षक लग सकते हैं।

भारतीय कंपनियों के लिए आगे की राह

एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस बदलाव का सबसे ज्यादा फायदा भारत की उन कंपनियों को मिलेगा जो केवल बड़े पैमाने पर मॉड्यूल असेंबल करने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि जो कंपनियां तेजी से सोलर सेल, वेफर और इंगोट के उत्पादन की ओर बढ़ सकती हैं, वे इस बदलते वैश्विक व्यापार माहौल का सबसे ज्यादा लाभ उठा सकेंगी। भारत के पास अपनी घरेलू सप्लाई चेन मजबूत करने का यह सही मौका है, बशर्ते वह तकनीकी चुनौतियों से पार पाने में सफल रहे।

Ramanuj Singh
रामानुज सिंहauthor

रामानुज सिंह पत्रकारिता में दो दशकों का व्यापक और समृद्ध अनुभव रखते हैं। उन्होंने टीवी और डिजिटल—दोनों ही प्लेटफॉर्म्स पर काम करते हुए बिजनेस, पर्सनल फाइनेंस, शेयर बाजार, इनकम टैक्स, बैंकिंग, बुलियन और कमोडिटी मार्केट जैसे विषयों पर गहरी विशेषज्ञता विकसित की है। जर्नलिज्म में एमए की डिग्री और वर्षों के अनुभव से विकसित विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के साथ, रामानुज जटिल वित्तीय विषयों को सरल, विश्वसनीय और प्रभावी तरीके से पाठकों तक पहुंचाने के लिए जाने जाते हैं। अब तक वे 22,000 से अधिक स्टोरीज लिख चुके हैं।

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