UPI पेमेंट पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लागू करने के फैसले के बीच IIT बॉम्बे के प्रोफेसरों ने एक नई व्यवस्था का सुझाव दिया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि मर्चेंट UPI ट्रांजैक्शन पर MDR की दर 0.40% के बजाय 0.08% होनी चाहिए। इसके साथ ही पेमेंट सर्विस देने वाली कंपनियों को उनके काम के हिसाब से भुगतान करने और बैंकों को MDR से मिलने वाले राजस्व में हिस्सा देने की मौजूदा व्यवस्था खत्म करने की सिफारिश की गई है।
बैंकों को MDR से मिलने वाले पैसे पर क्यों उठाए सवाल? (Image Source: iStock)
IIT बॉम्बे के गणित विभाग के प्रोफेसर आशीष दास और RBI की पूर्व अधिकारी प्रज्ञा दास की रिपोर्ट का शीर्षक 'UPI at a Crossroads: Reintroducing the MDR' है। रिपोर्ट के मुताबिक, UPI देश का महत्वपूर्ण डिजिटल पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर है। इससे लोगों के लिए भुगतान करना आसान हुआ है और आर्थिक गतिविधियों की उत्पादकता भी बढ़ी है। ऐसे में MDR की व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए, जिससे UPI का इस्तेमाल करने वाले लोगों का भरोसा कमजोर न पड़े।
TPAP को 0.06% और PSP को 0.02% MDR देने का सुझाव
रिपोर्ट में MDR के बंटवारे का भी नया फॉर्मूला पेश किया गया है। इसके तहत थर्ड-पार्टी ऐप प्रोवाइडर (TPAP) को 0.06% और पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर (PSP) को 0.02% MDR देने की सिफारिश की गई है। PhonePe और Google Pay जैसे ऐप TPAP के उदाहरण हैं, जबकि PSP की भूमिका मुख्य रूप से बैंक निभाते हैं।
नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) ने TPAP के लिए 0.08% हिस्से का प्रस्ताव दिया था। इसके मुकाबले IIT बॉम्बे की रिपोर्ट में इस हिस्से को घटाकर 0.06% रखने की बात कही गई है। वहीं, PSP का हिस्सा 0.02% बनाए रखने का सुझाव दिया गया है। मौजूदा व्यवस्था में ट्रांजैक्शन जारी करने और प्राप्त करने वाले बैंकों को मिलाकर MDR से होने वाली कमाई का 70% हिस्सा मिलता है। रिपोर्ट के लेखकों ने इस व्यवस्था को खत्म करने की सिफारिश की है।
बैंकों को MDR से मिलने वाले पैसे पर क्यों उठाए सवाल?
रिपोर्ट के मुताबिक, बैंक अपने करंट अकाउंट और सेविंग अकाउंट (CASA) में जमा रकम पर अपेक्षाकृत कम ब्याज देते हैं। इससे उन्हें ब्याज के रूप में अच्छा मार्जिन मिलता है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि वित्त वर्ष 2025-26 में बैंकों ने CASA जमा से 4.85 लाख करोड़ रुपये से अधिक का नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIM) दर्ज किया।
लेखकों का तर्क है कि बैंकों को इस कमाई का एक हिस्सा UPI सिस्टम को चलाने और बेहतर बनाने पर खर्च करना चाहिए। रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि CASA जमाकर्ताओं को कम ब्याज मिलने के कारण बैंकों के पास बचने वाली रकम में से करीब 3%, यानी लगभग 15,000 करोड़ रुपये, डिजिटल पेमेंट सिस्टम के लिए इस्तेमाल किए जा सकते हैं।
रिपोर्ट में RBI और सरकार से बैंकों को UPI एक अनिवार्य सेवा मानने का निर्देश देने की भी सिफारिश की गई है। लेखकों ने इसकी तुलना कोर बैंकिंग सॉल्यूशन (CBS) से की है, जो आज बैंकिंग कारोबार के लिए जरूरी व्यवस्था बन चुकी है।
75,000 रुपये के UPI पेमेंट पर 300 रुपये की फीस पर सवाल
IIT बॉम्बे की रिपोर्ट में बड़े UPI ट्रांजैक्शन पर लगने वाले शुल्क को लेकर भी चिंता जताई गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, 75,000 रुपये या उससे अधिक के मर्चेंट UPI ट्रांजैक्शन पर 300 रुपये तक की फीस लगाने से यह सवाल उठता है कि क्या इतनी अधिक फीस उचित है।
लेखकों ने कहा कि RBI के नियमों के अनुसार, किसी सेवा के लिए लिया जाने वाला शुल्क मोटे तौर पर उस सेवा को उपलब्ध कराने की औसत लागत के अनुरूप होना चाहिए। रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि अगर UPI पर ट्रांजैक्शन की रकम के आधार पर फीस तय की जाती है, तो इसकी अधिकतम सीमा 40 रुपये प्रति ट्रांजैक्शन होनी चाहिए।
ऑनलाइन शॉपिंग पर डिजिटल पेमेंट फीस लगाने का प्रस्ताव
रिपोर्ट में ई-कॉमर्स कंपनियों से होने वाली ऑनलाइन खरीदारी पर 'डिजिटल पेमेंट फीस' लगाने की सिफारिश भी की गई है। इसके अलावा, क्रेडिट कार्ड से भुगतान पर लगने वाले MDR को कम करने का सुझाव दिया गया है। रिपोर्ट के लेखकों का कहना है कि UPI और क्रेडिट कार्ड की फीस व्यवस्था को एक जैसा मानने का कोई ठोस आधार नहीं दिखता। दोनों भुगतान प्रणालियों की लागत और कामकाज अलग हो सकते हैं। इसलिए UPI पर क्रेडिट कार्ड वाला MDR मॉडल लागू करने के बजाय अलग व्यवस्था तैयार की जानी चाहिए।
रिपोर्ट में ATM से मुफ्त निकासी की उदार सीमा पर भी दोबारा विचार करने की बात कही गई है। लेखकों के अनुसार, जब ग्राहकों के पास डिजिटल भुगतान के सुविधाजनक विकल्प मौजूद हैं, तो मुफ्त ATM निकासी की मौजूदा सीमा को बनाए रखने की उपयोगिता पर विचार किया जाना चाहिए। इसके साथ ही, डिजिटल पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर को बढ़ावा देने के लिए पेमेंट्स इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट फंड (PIDF) को जारी रखने की सिफारिश की गई है।
50 करोड़ रुपये से अधिक टर्नओवर वाले कारोबारियों के लिए UPI जरूरी करने का सुझाव
रिपोर्ट में कहा गया है कि जिन कारोबारियों का सालाना टर्नओवर 50 करोड़ रुपये या उससे अधिक है, उनके लिए UPI भुगतान का विकल्प उपलब्ध कराना अनिवार्य किया जाना चाहिए। इस सीमा के आधार पर बड़े कारोबारियों से शुल्क लेकर UPI इकोसिस्टम के संचालन और विकास के लिए राजस्व जुटाया जा सकता है।
लेखकों के मुताबिक, इस तरह की व्यवस्था से NPCI के प्रस्तावित MDR का लगभग 90% राजस्व जुटाया जा सकता है। रिपोर्ट में ऑनलाइन मर्चेंट UPI ट्रांजैक्शन पर उचित शुल्क लगाने की संभावना पर भी विचार करने को कहा गया है।
लेखकों ने चेतावनी दी है कि अगर MDR की व्यवस्था को मौजूदा प्रस्ताव के अनुसार लागू किया गया, तो इससे UPI के प्रति लोगों का भरोसा प्रभावित हो सकता है। उनका कहना है कि UPI से मिलने वाले लंबे समय के आर्थिक फायदे मर्चेंट ट्रांजैक्शन पर फीस लगाकर जुटाए जाने वाले अतिरिक्त राजस्व से कहीं अधिक हैं।
NPCI के MDR सर्कुलर में क्या कहा गया है?
NPCI ने 15 सितंबर 2026 को जारी सर्कुलर में चुनिंदा मर्चेंट UPI ट्रांजैक्शन पर MDR लागू करने की व्यवस्था बताई थी। इसके तहत 2,000 रुपये से अधिक के निर्धारित पर्सन-टू-मर्चेंट (P2M) ट्रांजैक्शन पर 0.40% MDR लागू होगा। यह शुल्क ग्राहकों के बजाय कारोबारियों को देना होगा। 75,000 रुपये या उससे अधिक के ट्रांजैक्शन पर MDR की अधिकतम सीमा 300 रुपये रखी गई है। हालांकि, एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को किए जाने वाले ट्रांसफर और ज्यादातर सामान्य मर्चेंट पेमेंट पर कोई शुल्क नहीं लगेगा।
रेलवे, टेलीकॉम, ईंधन और बीमा जैसी जरूरी सेवाओं के लिए 2,000 रुपये से अधिक के निर्धारित ट्रांजैक्शन पर 5 रुपये का फ्लैट शुल्क लागू होगा। वहीं, म्यूचुअल फंड निवेश और स्टॉक ब्रोकिंग जैसे कैपिटल मार्केट ट्रांजैक्शन पर 0.02% MDR का प्रावधान है, जिसकी अधिकतम सीमा 300 रुपये है।
NPCI का कहना है कि इस व्यवस्था का उद्देश्य डिजिटल पेमेंट इकोसिस्टम के लिए टिकाऊ कमाई का मॉडल तैयार करना है। हालांकि, IIT बॉम्बे के प्रोफेसरों की रिपोर्ट में सुझाया गया कम MDR और शुल्क की अधिकतम सीमा अभी एक प्रस्ताव है, इसे लागू हो चुका नियम नहीं माना जाना चाहिए।
