भारत के पूर्व कप्तान सुनील गावस्कर ने सर गारफील्ड सोबर्स को याद करते हुए कहा कि बचपन में वह वेस्टइंडीज के इस महान क्रिकेटर को अपना आदर्श मानते थे और उन्हें आउट करने का सपना देखते थे। उन्होंने कहा कि महान ऑलराउंडर सोबर्स 'सभी के हीरो' थे। क्रिकेट इतिहास के सर्वकालीन महान खिलाड़ियों में शुमार सोबर्स का इस साल जुलाई में 89 वर्ष की आयु में निधन हो गया था।
सुनील गावस्कर
गावस्कर ने बॉम्बे जिमखाना में सोबर्स के जीवन और विरासत का जश्न मनाने के लिए आयोजित एक कार्यक्रम में कहा, "मेरे शुरुआती आदर्श असल में एमएल जयसिम्हा थे लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रोहन कन्हाई और सर गारफील्ड सोबर्स थे। यह बात कहते हुए मुझे थोड़ा अजीब लगता है लेकिन उन दिनों नेट्स में गेंदबाजी करने के लिए आपको नई गेंद दी जाती थी। कोई यह नहीं देखता था कि आप 22 गज की दूरी से गेंदबाजी कर रहे हैं या उससे थोड़ा आगे से। ब्रेबोर्न स्टेडियम में नेट्स पर गेंद काफी स्विंग होती थी और थोड़ा मूवमेंट भी मिलता था।"
गावस्कर ने कहा, "उस समय मुझे लगता था कि मैं अच्छा गेंदबाज हूं। मेरा एक ही सपना था। यह बताते हुए भी मुझे थोड़ा अजीब लगता है कि मैं रोहन कन्हाई को आउट करना चाहता था क्योंकि मैं अच्छी आउटस्विंग गेंदबाजी कर लेता था। मैं चाहता था कि कन्हाई मेरी गेंद पर विकेट के पीछे कैच आउट हों और फिर अगली ही गेंद पर गारफील्ड सोबर्स एलबीडब्ल्यू हो जाएं। यही मेरा सपना था।"
गेंदबाज के रूप में ज्यादा प्रभाव नहीं छोड़ पाने वाले गावस्कर आगे चलकर अपनी मजबूत तकनीक और धैर्य के दम पर क्रिकेट के महानतम बल्लेबाजों में शामिल हुए। उन्होंने कहा, "बेशक, मुझे अपने पहले टेस्ट में गेंदबाजी करने का मौका नहीं मिला और तभी मुझे एहसास हुआ कि गेंदबाजी बिल्कुल अलग चीज है।"
गावस्कर ने कहा, "इन दो महान खिलाड़ियों और भारतीय टीम के दूसरे दिग्गजों के दौर में होना अपने आप में खास था। मेरे आदर्श जयसिम्हा भी मेरे पहले दौरे पर वहां मौजूद थे। अजित वाडेकर और दिलीप सरदेसाई जैसे खिलाड़ी अविश्वसनीय थे।" गावस्कर ने दिसंबर 1966 में ब्रेबोर्न स्टेडियम में भारत के खिलाफ वेस्टइंडीज की ओर से सोबर्स को खेलते देखने का अनुभव भी साझा किया। इससे पहले उन्होंने 1958 में भी सोबर्स को खेलते हुए देखा था।
उन्होंने कहा, "1966 में मैं ब्रेबोर्न स्टेडियम के पवेलियन में था। मेरी उम्र 18 साल से कम थी और मुझे वहां नहीं होना चाहिए था क्योंकि क्रिकेट क्लब ऑफ इंडिया (सीसीआई) के नियमों के अनुसार 18 साल से कम उम्र के लोगों को पवेलियन में जाने की अनुमति नहीं थी।" गावस्कर ने कहा, ’’मुझे लगता है कि हमें उस समय वहां बनी बच्चों के दीर्घा के पास बैठने की अनुमति दी गई थी। वहीं हमने वह मैच देखा, जिसमें सर गारफील्ड ने इतने रन बनाए थे।"
इससे पहले 1958 में भारत दौरे पर आई वेस्टइंडीज की टीम के खिलाफ गावस्कर ने सोबर्स को नॉर्थ स्टैंड से खेलते हुए देखा था। उन्होंने कहा, "मैंने उन्हें गुलाम गार्ड की गेंद पर उन्हीं को कैच देते हुए देखा। गुलाम गार्ड बाएं हाथ के तेज गेंदबाज थे। उन्होंने बाउंसर फेंकी, सोबर्स ने हुक शॉट खेलने की कोशिश की और उनका बल्ला हाथ से छूट गया। गेंद हवा में गई और तेज गेंदबाज गुलाम गार्ड ने खुद ही कैच लपक लिया।"
गावस्कर ने कहा, "हम सभी इस बात से निराश थे कि वह सिर्फ 25 रन बनाकर आउट हो गए। भारतीय होने के बावजूद हम चाहते थे कि गैरी सोबर्स और रोहन कन्हाई खूब रन बनाएं। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। हालांकि, दूसरी पारी में जब गुलाम गार्ड ने एक और बाउंसर फेंकी तो गैरी सोबर्स ने गेंद को टेनिस कोर्ट के पार पहुंचा दिया। मुझे लगता है कि उन्होंने नाबाद 142 रन बनाए थे।"
इयान बिशप ने भी सोबर्स को किया सलाम
वेस्टइंडीज के पूर्व तेज गेंदबाज इयान बिशप ने भी क्रिकेट समितियों में सोबर्स के साथ काम करने के दौरान उनके स्नेहपूर्ण व्यवहार को याद किया। बिशप ने कहा, "मैंने उनके साथ कुछ क्रिकेट समितियों में काम किया था। वेस्टइंडीज के शुरुआती महान ऑलराउंडरों में शामिल लॉर्ड लियरी कॉन्स्टेंटाइन से लेकर आगे तक, आपसे पहले आए लोगों की उपलब्धियों के आधार पर ही आगे बढ़ते हैं। मुझे यकीन है कि सर गैरी ने भी ऐसा ही किया होगा।"
उन्होंने कहा, "क्रिकेट समिति की बैठकों के दौरान सर गैरी से बातचीत करने और उन्हें सुनने के बाद मुझे एहसास हुआ कि वह एक असाधारण इंसान थे। कुछ महीने पहले उनके निधन के बारे में सोचता हूं तो कई बार मेरी आंखों में आंसू आ जाते हैं क्योंकि एक खिलाड़ी के रूप में उनकी विरासत अपनी जगह है।"
(भाषा)
