PM Dhan Dhaanya Krishi Yojana Explained : भारत में खेती लाखों किसानों की आजीविका का मुख्य साधन है। इसके बावजूद देश के कई जिलों में किसानों को कम पैदावार, पानी की कमी, खेती के लिए कर्ज मिलने में परेशानी और फसल रखने के लिए गोदाम जैसी सुविधाओं की कमी का सामना करना पड़ता है। इन समस्याओं को दूर करने और खेती को अधिक लाभदायक बनाने के लिए केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना (PMDDKY) शुरू की है। इस योजना के तहत देश के 100 ऐसे जिलों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है, जहां कृषि विकास की काफी संभावनाएं हैं, लेकिन कई कारणों से किसान अपनी पूरी क्षमता के अनुसार उत्पादन नहीं कर पा रहे हैं। इस योजना का मकसद सिर्फ फसल की पैदावार बढ़ाना नहीं है, बल्कि किसानों को सिंचाई, भंडारण, कर्ज, नई तकनीक और बाजार जैसी जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराना भी है। आइए समझते हैं कि पीएम धन-धान्य कृषि योजना क्या है, इसके तहत क्या काम किए जा रहे हैं और इससे किसानों को किस तरह फायदा हो सकता है।
PM धन-धान्य योजना से किसानों को कैसे होगा फायदा? (तस्वीर-AI)
क्या है प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना?
प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना को 11 अक्टूबर 2025 को औपचारिक रूप से शुरू किया गया था। केंद्रीय कैबिनेट ने 16 जुलाई 2025 को इसे मंजूरी दी थी। यह योजना वित्त वर्ष 2025-26 से शुरू होकर 6 साल तक लागू की जाएगी। इस योजना के तहत देश के 100 ऐसे जिलों को चुना गया है, जहां कृषि उत्पादकता कम है और खेती से जुड़ी सुविधाओं को बेहतर बनाने की जरुरत है। कृषि उत्पादकता का मतलब है कि किसान एक निश्चित जमीन पर कितना अनाज या दूसरी फसल पैदा कर पाता है। उदाहरण के लिए, अगर दो किसान एक-एक हेक्टेयर जमीन पर खेती करते हैं, लेकिन एक किसान को दूसरे के मुकाबले काफी कम उपज मिलती है, तो उसके पीछे सिंचाई, बीज, मिट्टी की गुणवत्ता, तकनीक या खेती के दूसरे साधनों की कमी हो सकती है। इस योजना का उद्देश्य ऐसी समस्याओं को पहचानना और उनका समाधान करना है। यह योजना नीति आयोग के आकांक्षी जिला कार्यक्रम से प्रेरित है। इस कार्यक्रम की तरह इसमें भी पिछड़े क्षेत्रों की जरुरतों को समझकर विकास के काम करने पर जोर दिया गया है। हालांकि, पीएम धन-धान्य कृषि योजना का मुख्य ध्यान कृषि और उससे जुड़ी गतिविधियों पर है।
योजना शुरू करने की जरुरत क्यों पड़ी?
देश के कई हिस्सों में खेती आज भी बारिश पर निर्भर है। समय पर बारिश नहीं होने या सूखा पड़ने से किसानों की फसल खराब हो सकती है। वहीं, कुछ इलाकों में सिंचाई की सुविधा होने के बावजूद आधुनिक तरीकों का इस्तेमाल कम होता है। इससे पानी और दूसरे संसाधनों का सही उपयोग नहीं हो पाता। किसानों के सामने एक दूसरी बड़ी समस्या फसल कटने के बाद आती है। अगर उनके पास सुरक्षित गोदाम या भंडारण की सुविधा नहीं है, तो अनाज और दूसरी उपज खराब हो सकती है। कई बार किसानों को मजबूरी में अपनी फसल कम कीमत पर बेचनी पड़ती है। इसके अलावा, खेती के लिए समय पर कर्ज नहीं मिलना भी बड़ी परेशानी है। पैसे की कमी के कारण किसान अच्छे बीज, खाद, मशीनों और आधुनिक तकनीक पर खर्च नहीं कर पाते। इन समस्याओं का असर सीधे उनकी पैदावार और आमदनी पर पड़ता है। पीएम धन-धान्य कृषि योजना का उद्देश्य इन सभी परेशानियों को एक साथ दूर करने की दिशा में काम करना है। इसमें हर जिले की जरूरत के हिसाब से विकास की योजना बनाई जाती है, ताकि वहां के किसानों को वास्तविक लाभ मिल सके।
किन जिलों को योजना में शामिल किया गया है?
इस योजना के तहत 100 जिलों का चयन तीन प्रमुख आधारों पर किया गया है। पहला, वहां कृषि उत्पादकता कम हो। दूसरा, फसल सघनता कम हो। तीसरा, किसानों को कृषि ऋण कम मिलता हो। फसल सघनता का मतलब है कि एक साल में किसी जमीन पर कितनी बार फसल उगाई जाती है। उदाहरण के लिए, अगर किसान एक साल में सिर्फ एक फसल उगाता है, तो उसकी फसल सघनता उस किसान की तुलना में कम होगी, जो उसी जमीन पर दो या तीन फसलें उगाता है। जिलों का चयन करते समय राज्यों में खेती के कुल क्षेत्र और कृषि जोतों की हिस्सेदारी को भी ध्यान में रखा गया है। साथ ही, प्रत्येक राज्य से कम से कम एक जिले को शामिल करने का प्रावधान रखा गया है। इसका उद्देश्य यह है कि कृषि विकास का फायदा अलग-अलग राज्यों और क्षेत्रों तक पहुंचे। हर जिले की जलवायु, मिट्टी, पानी की उपलब्धता और फसलों की जरुरत अलग होती है। इसलिए सभी जिलों में एक जैसी योजना लागू करने के बजाय स्थानीय जरूरतों के हिसाब से काम किया जाएगा।
किसानों को क्या-क्या फायदे मिल सकते हैं?
1. खेती की पैदावार बढ़ाने में मदद:- योजना का पहला बड़ा लक्ष्य कृषि उत्पादकता बढ़ाना है। इसके लिए जिलों की जरूरत के अनुसार खेती के तरीकों में सुधार, बेहतर कृषि सुविधाओं और नई तकनीकों को बढ़ावा दिया जाएगा। किसानों को ऐसी फसलें उगाने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है, जो स्थानीय मिट्टी और मौसम के अनुकूल हों। इससे उपलब्ध संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल करने और खेती की पैदावार बढ़ाने में मदद मिल सकती है।
2. सिंचाई की सुविधाओं में सुधार:- पानी खेती की सबसे जरूरी जरुरतों में से एक है। जिन क्षेत्रों में सिंचाई की सुविधा कम है, वहां इसे बेहतर बनाने पर ध्यान दिया जाएगा। सूक्ष्म सिंचाई, स्प्रिंकलर और पानी का कुशल इस्तेमाल करने वाली तकनीकों को बढ़ावा देना भी इस दिशा में उपयोगी हो सकता है। इससे किसानों को बारिश पर निर्भरता कम करने और उपलब्ध पानी का बेहतर इस्तेमाल करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, वास्तविक लाभ इस बात पर निर्भर करेगा कि संबंधित जिले में कौन-से काम किए जाते हैं और वे कितने प्रभावी ढंग से लागू होते हैं।
3. फसल रखने के लिए गोदामों की सुविधा:- फसल तैयार होने के बाद उसे सुरक्षित रखना भी उतना ही जरूरी है, जितना उसे उगाना। योजना के तहत पंचायत और ब्लॉक स्तर पर फसल कटाई के बाद भंडारण की सुविधाएं बढ़ाने पर जोर दिया गया है। अगर किसानों को अपने आसपास गोदाम मिलते हैं, तो वे उपज को सुरक्षित रख सकते हैं। इससे फसल खराब होने का खतरा कम हो सकता है। किसानों को बाजार की स्थिति देखकर उपज बेचने का बेहतर अवसर भी मिल सकता है।
4. खेती के लिए कर्ज तक आसान पहुंच:- खेती में बीज, खाद, सिंचाई और मशीनों पर खर्च करना पड़ता है। इसलिए किसानों के लिए समय पर कर्ज मिलना जरूरी है। योजना का एक उद्देश्य अल्पकालिक और दीर्घकालिक कृषि ऋण तक पहुंच बेहतर बनाना है। अल्पकालिक कर्ज का इस्तेमाल किसान आमतौर पर एक फसल के मौसम में होने वाले खर्चों के लिए करते हैं, जबकि दीर्घकालिक कर्ज का उपयोग सिंचाई व्यवस्था या कृषि उपकरण जैसे बड़े निवेशों के लिए किया जा सकता है। इससे किसानों को अपनी जरूरत के हिसाब से वित्तीय सहायता पाने में मदद मिल सकती है। ध्यान रहे कि इस योजना के तहत हर किसान को सीधे एक निश्चित रकम मिलने की गारंटी नहीं है। लाभ संबंधित योजनाओं, उपलब्ध सुविधाओं और पात्रता के आधार पर मिलेगा।
5. फसल विविधीकरण और टिकाऊ खेती को बढ़ावा:- अगर किसान हर साल एक ही फसल उगाते हैं, तो उन्हें मौसम, कीट या बाजार में कीमत गिरने से नुकसान हो सकता है। फसल विविधीकरण का अर्थ है कि किसान अपनी जमीन और परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग फसलें उगाने पर विचार करें। इसके साथ ही टिकाऊ खेती पर भी जोर दिया गया है। इसमें पानी और मिट्टी का सही इस्तेमाल, प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण और खेती की लागत को नियंत्रित करने जैसे उपाय शामिल हो सकते हैं। इन तरीकों से लंबे समय में खेती को अधिक टिकाऊ बनाने में मदद मिल सकती है।
योजना को लागू करने के लिए क्या व्यवस्था की गई है?
पीएम धन-धान्य कृषि योजना को लागू करने के लिए जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर तीन स्तरीय व्यवस्था बनाई गई है। जिला स्तर पर जिला धन-धान्य कृषि योजना समिति काम करती है। इसकी अध्यक्षता जिला कलेक्टर या जिलाधिकारी करते हैं। यह समिति जिले की कृषि जरूरतों की पहचान करती है, विकास की योजना तैयार करती है और कामकाज की निगरानी करती है। राज्य स्तर पर राज्य धन-धान्य कृषि योजना समिति बनाई गई है, जिसकी अध्यक्षता मुख्य सचिव करते हैं। यह समिति जिलों की योजनाओं की समीक्षा करती है और उनके कार्यान्वयन पर नजर रखती है। राष्ट्रीय स्तर पर भी निगरानी और कार्यान्वयन के लिए समितियां बनाई गई हैं। इनका उद्देश्य यह देखना है कि योजना के तहत तय किए गए काम सही दिशा में आगे बढ़ रहे हैं या नहीं। इस व्यवस्था से जिलों की जरूरतों के अनुसार योजनाएं तैयार करने और उनके कामकाज की नियमित समीक्षा करने में मदद मिल सकती है।
क्या 100 नई योजनाएं शुरू की गई हैं?
इस योजना की एक खास बात यह है कि इसे कई मौजूदा सरकारी योजनाओं के साथ मिलाकर लागू किया जा रहा है। इसके तहत 11 मंत्रालयों और विभागों की 36 केंद्रीय योजनाओं के साथ-साथ राज्य सरकारों की योजनाओं और निजी क्षेत्र की साझेदारियों को भी जोड़ा गया है। इसे आसान भाषा में समझें तो सरकार का उद्देश्य हर काम के लिए एक नई योजना बनाने के बजाय पहले से चल रही योजनाओं और उपलब्ध संसाधनों का बेहतर तालमेल करना है। कृषि एवं किसान कल्याण विभाग इस योजना के कार्यान्वयन का नेतृत्व करता है। इसके लिए नीति आयोग, नाबार्ड, अन्य मंत्रालयों, विभागों और राज्य सरकारों के साथ समन्वय किया जाता है। जिलों की कार्य योजनाओं में यह तय किया जाता है कि कहां किस सुविधा की जरूरत है, कौन-सा काम किया जाएगा और उससे क्या परिणाम हासिल करने का लक्ष्य रखा गया है। इसके बाद संबंधित विभागों की वार्षिक योजनाओं में इन कार्यों को शामिल करने और जरूरी मंजूरियों तथा धनराशि की व्यवस्था करने की प्रक्रिया आगे बढ़ती है।
पहले साल में कितनी प्रगति हुई?
योजना के पहले साल में सभी 100 चयनित जिलों ने अपनी जिला कार्य योजनाएं तैयार कर ली हैं। इन योजनाओं के आधार पर कृषि विकास से जुड़े काम आगे बढ़ाए जा रहे हैं। योजना की प्रगति पर नजर रखने के लिए अक्टूबर 2025 के अंतिम सप्ताह में एक डैशबोर्ड शुरू किया गया था। नवंबर 2025 से जिलों की मासिक रैंकिंग भी शुरू हुई। योजना की निगरानी 36 योजनाओं से जुड़े कुल 121 संकेतकों के आधार पर की जाती है। इनमें 74 संकेतक यह बताते हैं कि कौन-से काम किए गए हैं, जबकि 47 संकेतक यह समझने में मदद करते हैं कि उन कामों से क्या नतीजे निकले। अगस्त 2026 तक सभी 100 जिलों ने कामकाज से जुड़े संकेतकों के आंकड़े जमा किए थे। वित्त वर्ष 2025-26 के लिए परिणाम संकेतकों के आंकड़े भी प्रस्तुत किए गए।
उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, इन 100 जिलों का औसत स्कोर अप्रैल 2026 में 18.85 था, जो अगस्त 2026 में बढ़कर 46.89 हो गया। यानी इसमें 28.04 अंकों का सुधार हुआ। यह योजना के निगरानी संकेतकों पर बेहतर प्रदर्शन का संकेत है। हालांकि, केवल इस स्कोर से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि किसानों की आय भी उतने ही अनुपात में बढ़ गई है। इसके लिए आय, पैदावार और खेती की लागत जैसे वास्तविक नतीजों का आकलन जरूरी होगा।
FPO संगम से किसानों को कैसे मिलेगा फायदा?
दिसंबर 2025 में पीएम-DDKY किसान उत्पादक संगठन (FPO) संगम का आयोजन किया गया था। इसमें 15 राज्यों और 33 चयनित जिलों के 72 से अधिक किसान उत्पादक संगठन शामिल हुए। किसान उत्पादक संगठन यानी FPO किसानों का ऐसा समूह होता है, जो मिलकर खेती से जुड़े काम करता है। इससे किसानों को बीज और दूसरी जरूरी चीजें खरीदने, उपज इकट्ठा करने, प्रसंस्करण करने और बाजार तक पहुंच बनाने में मदद मिल सकती है। इस आयोजन में प्राकृतिक खेती, तिलहन, मधुमक्खी पालन, संरक्षित खेती, सूक्ष्म सिंचाई, संस्थागत वित्त और डिजिटल कृषि जैसे विषयों पर चर्चा हुई। इसका उद्देश्य किसानों और उनके संगठनों को एक-दूसरे के अनुभवों से सीखने तथा कारोबार के नए अवसर तलाशने में मदद देना था।
महाराष्ट्र और राजस्थान में दिखी पहल
योजना से जुड़े प्रयासों के उदाहरण महाराष्ट्र के गडचिरोली और राजस्थान के जैसलमेर में भी सामने आए हैं। गडचिरोली में 800 किसान सदस्यों वाले एक FPO ने चावल प्रसंस्करण इकाई और 900 मीट्रिक टन क्षमता वाला गोदाम स्थापित किया। इससे स्थानीय स्तर पर चावल का प्रसंस्करण करने और उपज का बेहतर मूल्य हासिल करने की संभावनाएं बढ़ सकती हैं। वहीं, जैसलमेर में 1,236 किसान सदस्यों वाले एक FPO ने 2,000 एकड़ में एकीकृत कीट प्रबंधन पर आधारित जीरे की खेती और 500 एकड़ में सौर ऊर्जा से चलने वाली स्प्रिंकलर सिंचाई को अपनाया। इससे पानी का बेहतर उपयोग करने और खेती को अधिक कुशल बनाने में मदद मिल सकती है। ये उदाहरण बताते हैं कि स्थानीय जरूरतों के हिसाब से काम करने पर किसानों को खेती की तकनीक, भंडारण और बाजार से जुड़ने के बेहतर अवसर मिल सकते हैं।
क्या पीएम धन-धान्य योजना से किसानों की आय बढ़ जाएगी?
पीएम धन-धान्य कृषि योजना में किसानों की तरक्की की संभावनाएं हैं, लेकिन इसका पूरा फायदा तभी मिलेगा, जब योजनाओं को जमीन पर सही तरीके से लागू किया जाएगा। सिंचाई, गोदाम, कर्ज और बाजार की सुविधाओं में सुधार होने से किसानों की लागत घट सकती है और उपज का बेहतर मूल्य मिलने की संभावना बढ़ सकती है। हालांकि, किसानों की आमदनी पर मौसम, फसल की कीमत, खेती की लागत और बाजार की मांग जैसे कई दूसरे कारकों का भी असर पड़ता है। इसलिए योजना की सफलता का आकलन केवल बनाए गए गोदामों या दिए गए कर्ज से नहीं, बल्कि किसानों की पैदावार, आमदनी और जीवन में आए वास्तविक बदलावों से किया जाना चाहिए।
कुल मिलाकर, प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना का लक्ष्य 100 चयनित जिलों में खेती को मजबूत बनाना और किसानों के सामने मौजूद बुनियादी समस्याओं को दूर करना है। अगर योजना के तहत किए जा रहे प्रयास लगातार प्रभावी साबित होते हैं, तो इससे कृषि विकास को गति मिल सकती है और किसानों के लिए बेहतर आय के रास्ते खुल सकते हैं।
