प्रशांत महासागर में समुद्र का तापमान तेजी से बढ़ रहा है। दक्षिण अमेरिका के पेरू तट के पास समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से 8.9 डिग्री सेल्सियस तक अधिक दर्ज किया गया है, जबकि समुद्र के भीतर कुछ गहराई में तापमान सामान्य से 10.5 डिग्री सेल्सियस तक ऊपर पहुंच गया है। पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के कुछ हिस्सों में पिछले महीने समुद्र की सतह का तापमान औसत से 4 डिग्री सेल्सियस से अधिक रहा। समुद्र में बढ़ती यह असामान्य गर्मी अल नीनो (El Nino) के मजबूत होने के संकेत दे रही है। वैज्ञानिक संकेतों के मुताबिक, यह बदलाव दुनिया के मौसम को प्रभावित कर सकता है। आशंका है कि 2026 के अंत तक अल नीनो ऐतिहासिक रूप से मजबूत स्तर पर पहुंच सकता है और इसका प्रभाव 2027 की शुरुआत तक बना रह सकता है।
प्रशांत महासागर में तेजी से मजबूत हो रहा अल नीनो (सांकेतिक फोटो)
क्या है अल नीनो और प्रशांत महासागर में क्यों बढ़ रही है गर्मी??
अलनीनो प्रशांत महासागर में होने वाली एक प्राकृतिक जलवायु घटना है। इसमें भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्सों में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है। इस बदलाव का प्रभाव समुद्र और वायुमंडल के बीच होने वाली सामान्य गतिविधियों पर पड़ता है, जिससे दुनिया के अलग-अलग क्षेत्रों में मौसम बदल सकता है।
सामान्य परिस्थितियों में व्यापारिक हवाएं (Trade Winds) प्रशांत महासागर के गर्म पानी को पश्चिम की ओर धकेलती हैं। लेकिन अल नीनो के दौरान ये हवाएं कमजोर पड़ सकती हैं, जिससे गर्म पानी पूर्वी और मध्य प्रशांत में फैलने लगता है। इसका प्रभाव कहीं बारिश बढ़ने और कहीं सूखे की स्थिति के रूप में दिखाई दे सकता है।
समुद्र के तापमान के आंकड़े क्या बता रहे हैं?
अल नीनो की ताकत का आकलन करने के लिए वैज्ञानिक प्रशांत महासागर के अलग-अलग क्षेत्रों के तापमान पर नजर रखते हैं। इन्हीं में नीनो-3.4, नीनो-3 और नीनो-1+2 सूचकांक शामिल हैं। जिसमें नीनो-1+2 क्षेत्र दक्षिण अमेरिका के तट के सबसे करीब है।
- नीनो-3.4 सूचकांक: सामान्य से 2.1 डिग्री सेल्सियस अधिक।
- नीनो-3 सूचकांक: सामान्य से 3.0 डिग्री सेल्सियस अधिक।
- नीनो-1+2 क्षेत्र: सामान्य से 3.9 डिग्री सेल्सियस अधिक।
ये सूचकांक समुद्र की सतह के तापमान और उसके लंबे समय के औसत के बीच अंतर बताते हैं। इन तीनों सूचकांकों में एक साथ बढ़ोतरी इस बात का संकेत है कि प्रशांत महासागर में गर्मी बढ़ने के साथ समुद्र और वायुमंडल के बीच परस्पर क्रिया भी मजबूत हो रही है। इनका एक साथ बढ़ना अल नीनो के मजबूत होने का संकेत हो सकता है। समुद्र की गहराई में भी गर्मी असामान्य है। मध्य प्रशांत के कुछ हिस्सों में 25 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा गर्म पानी करीब 150 मीटर की गहराई तक फैला है। यह बताता है कि गर्मी केवल समुद्र की सतह तक सीमित नहीं है, बल्कि पानी की गहरी परतों में भी मौजूद है।
हवाओं और बादलों में क्या बदलाव हो रहे हैं?
समुद्र के तापमान के साथ वायुमंडलीय परिस्थितियां भी अल नीनो को मजबूत करने वाले संकेत दे रही हैं। भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के पास सतह पर पश्चिमी हवाओं का असर सामान्य से अधिक देखा गया है, जबकि वायुमंडल की ऊंची परतों में पूर्वी हवाओं से जुड़ी असामान्य परिस्थितियां बनी हुई हैं। मध्य व पूर्वी प्रशांत में बारिश और बादलों का निर्माण बढ़ा है। इसके विपरीत, इंडोनेशिया के ऊपर वायुमंडलीय संवहन (Atmospheric Convection) कमजोर बना हुआ है। ये बदलाव समुद्र और वायुमंडल के बीच होने वाली गतिविधियों में बदलाव को भी दिखाते हैं।
क्या 2026-27 में बन सकता है ऐतिहासिक अल नीनो?
अमेरिकी क्लाइमेट प्रेडिक्शन सेंटर के आधिकारिक पूर्वानुमान के अनुसार, अल नीनो के 2026 के अंत तक मजबूत होने और 2027 की शुरुआत तक बने रहने की संभावना है। 1950 के बाद दर्ज पिछले अल नीनो प्रकरणों से भी अधिक शक्तिशाली घटना बनने की संभावना सितंबर-नवंबर के लिए 54 प्रतिशत, अक्टूबर-दिसंबर के लिए 83 प्रतिशत और नवंबर-जनवरी के लिए 70 प्रतिशत बताई गई है। पूर्वानुमान में जनवरी-मार्च 2027 तक मजबूत से बहुत मजबूत अल नीनो बने रहने की संभावना 83 प्रतिशत से अधिक है।
दुनिया के मौसम पर क्या पड़ सकता है असर?
मजबूत अल नीनो दुनिया में बारिश और तापमान के पैटर्न को बदल सकता है। कुछ क्षेत्रों में सूखे का खतरा बढ़ सकता है, जबकि कुछ जगहों पर सामान्य से अधिक बारिश हो सकती है। तापमान, हवाओं और बारिश में बदलाव के कारण अलग-अलग क्षेत्रों में मौसम की परिस्थितियां प्रभावित हो सकती हैं। इसका प्रभाव खेती, पेयजल उपलब्धता और खाद्य उत्पादन पर भी पड़ सकता है। अगर किसी क्षेत्र में लंबे समय तक बारिश कम होती है, तो फसलों और जल संसाधनों पर दबाव बढ़ सकता है। वहीं, अत्यधिक बारिश वाले क्षेत्रों में बाढ़ और दूसरी मौसमी समस्याओं का जोखिम बढ़ सकता है। हालांकि, इसका प्रभाव हर देश और क्षेत्र में एक जैसा नहीं होगा। यह मौसम और भौगोलिक परिस्थितियों पर भी निर्भर करेगा। हर चरम मौसमी घटना के लिए केवल अल नीनो को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। लेकिन शक्तिशाली अल नीनो वैश्विक तापमान को भी प्रभावित कर सकता है, जिससे पहले से गर्म होती दुनिया में गर्मी की स्थिति और गंभीर हो सकती है।
भारत पर क्या पड़ सकता है असर?
भारत में अल नीनो को लेकर चिंता की एक प्रमुख वजह मानसून है। कई अल नीनो वर्षों में भारतीय मानसून कमजोर रहा है, लेकिन हर बार ऐसा होना जरूरी नहीं है। हिंद महासागर की स्थिति, स्थानीय मौसम प्रणालियां और अन्य जलवायु कारक भी मानसून को प्रभावित करते हैं। इसलिए मजबूत अल नीनो का मतलब यह नहीं है कि भारत में बारिश कम होगी ही, बल्कि इसके संभावित असर को समझने के लिए मौसम एजेंसियों के ताजा पूर्वानुमानों पर नजर रखना जरूरी है।
प्रशांत महासागर में बढ़ती गर्मी और अल नीनो के मजबूत होने के संकेत आने वाले महीनों में महत्वपूर्ण हो सकते हैं। लेकिन इसका वास्तविक असर किस क्षेत्र में कितना होगा, यह आगे की समुद्री और वायुमंडलीय परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।
