दक्षिण दिल्ली के सत्या निकेतन में रविवार को ढह गई पांच मंजिला इमारत में लड़कों का एक पीजी (PG) भी संचालित हो रहा था। इस हादसे में सात लोगों की मौत हो गई। इमारत के गिरने के बाद इलाके में रहने वाले छात्रों के बीच आसपास की इमारतों की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ गई है। साथ ही यह सवाल भी खड़ा हुआ है कि आखिर इतने सारे छात्रों को इन पीजी में रहने के लिए मजबूर क्यों होना पड़ता है और यहां रहने वाले छात्रों को किन-किन समस्याओं से दो-चार होना पड़ता है...
कैसे गुजारा करते हैं सत्य निकेतन वाले इलाके में रहने वाले छात्र। (फोटो- PTI)
साउथ कैंपस के आसपास रहने की तलाश शुरू करने वाले ज्यादातर नए छात्रों को सत्या निकेतन के बारे में सबसे पहले जानकारी मिलती है। यहां की गलियां पीजी, मेस, दुकानों और कैफे से भरी हैं। मेट्रो स्टेशन और कई कॉलेज भी आसपास हैं। दूसरी ओर, कई कॉलेजों में हॉस्टल की सुविधा उपलब्ध नहीं है और जहां हॉस्टल हैं भी वहां सीटें सीमित हैं। ऐसे में छात्रों के पास रहने की जगह चुनने के लिए बहुत ज्यादा विकल्प नहीं बचते।
10 हजार से 25 हजार रुपये तक किराया
सत्य निकेतन में छात्रों के लिए उपलब्ध कमरों के किराये में काफी अंतर है। छात्रों के मुताबिक,बिना बालकनी और बेहद कम या बिल्कुल वेंटिलेशन वाले ट्रिपल या फोर-शेयरिंग कमरे के लिए करीब 10,000 से 12,000 रुपये प्रति बेड देने पड़ते हैं। बेहतर वेंटिलेशन या बालकनी वाला डबल-शेयरिंग कमरा करीब 15,000 रुपये या उससे अधिक का पड़ता है। वहीं,अगर छात्र अकेले रहना चाहता है तो सिंगल रूम का किराया करीब 25,000 रुपये तक पहुंच सकता है।माता-पिता को दिखाने के लिए सजा दिए जाते हैं PG
छात्रों का कहना है कि जिस समय वे पहली बार पीजी देखने जाते हैं, उस समय इमारत की वास्तविक स्थिति का अंदाजा लगाना आसान नहीं होता। इन्ही पीजी में रहने वाले एक छात्र रोशन ने कहा,"हर अकादमिक सत्र में पीजी की इमारतों को दोबारा रंग दिया जाता है। जब माता-पिता जगह देखने आते हैं तो इमारत नई और अच्छी तरह से रखरखाव वाली दिखाई देती है। अगर कमरे में बालकनी या थोड़ा वेंटिलेशन हो तो आप स्वाभाविक रूप से उस कमरे की ओर आकर्षित होते हैं। आपको लगता है कि यह अच्छी जगह है। लेकिन जब आप वहां रहने लगते हैं तो पता चलता है कि फ्रिज ठीक से ठंडा नहीं कर रहा,इंडक्शन काम नहीं करता और वॉशिंग मशीन भी खराब हो सकती है।"
एक कमरे में तीन से छह छात्र
कमरे साझा करने वाले छात्रों के लिए स्थिति और मुश्किल हो जाती है। उत्तराखंड के रहने वाले 18 वर्षीय अभिनव रमन सिन्हा आत्मा राम सनातन धर्म कॉलेज (Atma Ram Sanatan Dharma College) के प्रथम वर्ष के छात्र हैं। उन्होंने कहा, "कमरे बहुत छोटे होते हैं। एक कमरे में तीन लोग रह सकते हैं और कई बार ऐसी जगहों पर छह लोग भी रह रहे होते हैं, जहां इतने लोगों के रहने की जगह नहीं होती। आपको उसी छोटे से कमरे में पढ़ना है, सोना है और अपना सारा सामान भी रखना है।" छात्रों के मुताबिक, कमरे में जगह की कमी सिर्फ सुविधा का मुद्दा नहीं है। जब पढ़ाई, सोने और निजी सामान के लिए एक ही जगह का इस्तेमाल करना पड़े तो छात्रों की रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित होती है।
हवा और रोशनी के लिए भी ज्यादा पैसे
वेंटिलेशन भी पीजी चुनने में एक बड़ी चुनौती है। छात्रों का कहना है कि कुछ कमरों में इतनी कम हवा और रोशनी होती है कि वहां दिन और रात का अंतर महसूस करना मुश्किल हो जाता है। एक छात्र ने कहा, "अगर आप अलार्म नहीं लगाते हैं तो कभी-कभी आपको पता ही नहीं चलेगा कि दिन है या रात। कुछ कमरों में मुश्किल से वेंटिलेशन होता है। बालकनी वाले कमरे महंगे होते हैं। इसलिए जब आप तय करते हैं कि आपकी क्षमता के हिसाब से कौन सा कमरा ठीक है, तो हवा और रोशनी भी ऐसी चीजें बन जाती हैं जिनके लिए आपको ज्यादा भुगतान करना पड़ता है।"फ्रिज,इंडक्शन और गर्म पानी की समस्या
छात्रों का कहना है कि परेशानी सिर्फ कमरे तक सीमित नहीं है। पीजी में मिलने वाली बुनियादी सुविधाएं भी कई बार ठीक से काम नहीं करतीं। एक छात्र ने कहा, "फ्रिज कभी ठंडा करता है और कभी नहीं करता। इंडक्शन ठीक से काम नहीं करता। गर्म पानी के लिए कई बार हमें एक रात पहले बताना पड़ता है। और जब आप किसी चीज की शिकायत करते हैं तो पीजी वाले कहते हैं कि ब्रोशर में इसका जिक्र नहीं किया गया था।"
खाने की गुणवत्ता पर भी सवाल
अधिकांश पीजी में भोजन भी किराये की व्यवस्था का हिस्सा होता है। छात्रों का कहना है कि कई जगह उन्हें भोजन के लिए भुगतान करना ही पड़ता है, भले ही वे खाना खाएं या नहीं। प्रथम वर्ष के लॉ फैकल्टी के छात्र अभिषेक मिश्रा ने कहा, "इन सभी पीजी में खाने की गुणवत्ता बेहद खराब है। जब आप पहली बार आते हैं तो वे आपको बहुत अच्छा खाना परोसेंगे, लेकिन उसके बाद गुणवत्ता इतनी गिर जाती है कि कभी-कभी दाल में दाल तक नहीं मिलती, सिर्फ पानी होता है।"
मिश्रा ने कहा, "कभी-कभी आपको खाने में कोई कीड़ा या अन्य जीव भी दिखाई दे सकता है और उसके बाद आप खाना ही बंद कर देते हैं। लेकिन छात्रों के पास यह विकल्प नहीं होता कि वे सिर्फ कमरे की सुविधा लें और खाना न लें। भोजन अनिवार्य है। आप खाना खाएं या नहीं, आपको उसके पैसे देने पड़ते हैं।"
पांच मिनट की बारिश में सड़क बन जाती है जलमग्न
भोपाल की छात्रा सौम्या पाराशर ने कहा कि पीजी के बाहर की जिंदगी भी कई बार उतनी ही मुश्किल होती है। उन्होंने कहा, "पांच मिनट बारिश होती है और पूरी सड़क पर पानी बहने लगता है क्योंकि सड़क ढलान पर है। मंदिर के पास और पीजी के सामने पानी जमा हो जाता है। यही मेट्रो स्टेशन जाने का मुख्य रास्ता है, इसलिए पानी भर जाने के बावजूद हमें इसी रास्ते से जाना पड़ता है। इलाके में निर्माण कार्य भी चल रहा है और लगातार धूल जमा होती रहती है।"
छात्रों का कहना है कि इलाके में कई पीजी मेस में बैठने की उचित व्यवस्था भी नहीं है। ऐसे में छोटे कमरे साझा करने वाले छात्रों के पास खाने या कमरे से बाहर कुछ समय बिताने के लिए भी पर्याप्त जगह नहीं होती। अगर बारिश या जलभराव के कारण बाहर निकलना मुश्किल हो जाए तो पढ़ाई के लिए लाइब्रेरी जाने जैसे विकल्प भी प्रभावित होते हैं।
1973 के बाद बदला सत्य निकेतन
सत्या निकेतन में पीजी का कारोबार अचानक नहीं बढ़ा। दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा 1973 में साउथ कैंपस की स्थापना के बाद सत्या निकेतन और आसपास के इलाकों के मकानों में छात्रों को ठहराने का चलन तेजी से बढ़ा। श्री वेंकटेश्वर कॉलेज (Sri Venkateswara College), जीसस एंड मैरी कॉलेज (Jesus and Mary College) और आत्मा राम सनातन धर्म कॉलेज (Atma Ram Sanatan Dharma College) जैसे संस्थानों में पढ़ने वाले छात्रों के लिए यह इलाका धीरे-धीरे प्रमुख आवासीय केंद्र बन गया। समय के साथ कई घर व्यावसायिक किराये की संपत्तियों में बदल गए। छात्रों की संख्या बढ़ने के साथ मकानों में ज्यादा बेड और पार्टिशन बनाए जाने लगे ताकि एक ही इमारत में अधिक छात्रों को रखा जा सके। स्थानीय अनुमानों के मुताबिक अब सत्या निकेतन और उसके आसपास 200 से अधिक PG accommodations हैं।हॉस्टल की कमी से चलता है पूरा बाजार
छात्रों का कहना है कि सत्या निकेतन के पीजी बाजार के पीछे सबसे बड़ी वजह कॉलेज हॉस्टल की कमी है। सौम्या ने कहा, "हम तथाकथित टॉप 15 या 20 कॉलेजों में पढ़ रहे हैं। कॉलेजों को अपने हॉस्टल के बुनियादी ढांचे में सुधार और विस्तार करना चाहिए। बहुत कम कॉलेजों में हॉस्टल हैं और जहां हॉस्टल उपलब्ध भी हैं, वहां हर छात्र को कमरा नहीं मिल सकता। उदाहरण के लिए श्री वेंकटेश्वर कॉलेज में हॉस्टल की सुविधा काफी हद तक पात्रता और मेरिट के आधार पर सीमित है। अगर आप किसी दूसरे शहर से आने वाले नए छात्र हैं और आपको हॉस्टल नहीं मिलता, तो आपको पीजी ढूंढना ही पड़ता है।"पीजी छोड़ना भी आसान नहीं
एक बार पीजी में रहने के बाद अगर छात्र को जगह पसंद नहीं आती या सुविधाएं उम्मीद के मुताबिक नहीं मिलतीं, तो तुरंत दूसरी जगह जाना भी आसान नहीं होता। छात्रों को सिक्योरिटी डिपॉजिट देना पड़ता है। इसके अलावा नई जगह तलाशने, सामान शिफ्ट करने और दोबारा एडवांस देने की समस्या अलग होती है। इसलिए कई छात्र खराब सुविधाओं के बावजूद उसी पीजी में बने रहते हैं।
चुनाव के बाद छात्र संघ भी नहीं दिखता
छात्रों का आरोप है कि उनकी रोजमर्रा की समस्याओं को लेकर छात्र संगठन भी बहुत सक्रिय नहीं रहते। एक छात्र ने कहा, "चुनाव के आसपास छोड़ दें तो यूनियन मुश्किल से ही सक्रिय रहती है। वे एक महीने तक छात्रों को आकर्षित करने की कोशिश करते हैं, लेकिन चुनाव के बाद आपको कॉलेजों के आसपास वे दिखाई नहीं देंगे। 'May I Help You' काउंटर भी नजर नहीं आएंगे। इन समस्याओं के लिए छात्रों के पास जाने के लिए मुश्किल से कोई जगह है।"
