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छठी पीढ़ी का फाइटर जेट बनाने में कौन मारेगा बाजी? इन देशों में लगी रेस, भारत ने भी दिखाई है दिलचस्पी

Sixth generation fighter jet of US F-45, GCAP and FCAS : अभी मौटे तौर पर तीन अलग-अलग प्लेटफॉर्मों पर छठवीं पीढ़ी का लड़ाकू विमान विकसित करने की तैयारी चल रही है। इसमें सबसे आगे अमेरिका है। अमेरिका के पास पांचवीं पीढ़ी का स्टील्थ फाइटर जेट F-35 पहले से मौजूद है।

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छठवीं पीढ़ी के फाइटर निर्माण में अमेरिका सबसे आगे। तस्वीर-X/@_TheTathya/@onlydjole
Written by: Alok Rao
Updated Apr 11, 2026, 06:55 IST

Sixth generation fighter jet of US F-45, GCAP and FCAS : तकनीक के दबदबे वाली इस दुनिया में चीजें बहुत तेजी से बदल रही हैं। आज तकनीक की दुनिया में बोलबाला ऑर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी, मशीन लर्निंग, क्लाउड कंप्यूटिंग, आर्टिफिशियल रियलिटी, क्वांटम कंप्यूटिंग और रोबोटिक्स का है। तकनीक के इन अलग-अलग रूपों एवं माध्यम में जिस देश की महारत होगी, वह देश उतना ही तेजी से नई-नई आधुनिक और कटिंग एज टेक्नॉलजी बनाएगा। रक्षा क्षेत्र में भी लेटेस्ट एवं कटिंग एज टेक्नॉलजी का खूब इस्तेमाल हो रहा है। नई तकनीक की बदौलत पांचवीं पीढ़ी के स्टील्थ फाइटर जेट से आगे जाकर छठवीं पीढ़ी का फाइटर जेट बनाने पर काम चल रहा है। छठवीं पीढ़ी का फाइटर जेट बनाने में एक तरह से कई देशों के बीच रेस लगी हुई है। इस रेस में कोई आगे निकलता दिख रहा है तो कोई पीछे छूट रहा है। छठवीं पीढ़ी के फाइटर जेट बनाने में कौन-कौन से देश लगे हुए हैं, यहां हम उनकी बात करेंगे। चीन पहले ही छठवीं पीढ़ी के अपने विमान का प्रोटोटाइप दुनिया को दिखा चुका है। अपने इस लड़ाकू विमान पर वह तेजी के साथ काम कर रहा है।

फ्रांस-जर्मनी, स्पेन का है FCAS प्रोजेक्ट

रिपोर्टों के मुताबिक अभी मौटे तौर पर तीन अलग-अलग प्लेटफॉर्मों पर छठवीं पीढ़ी का लड़ाकू विमान विकसित करने की तैयारी चल रही है। इसमें सबसे आगे अमेरिका है। अमेरिका के पास पांचवीं पीढ़ी का स्टील्थ फाइटर जेट F-35 पहले से मौजूद है। अब वह अपने छठवीं पीढ़ी के एयरक्राफ्ट F-47 पर काम कर रहा है। उसकी योजना 2028 में इसकी पहली उड़ान दुनिया के सामने लाने की है। दूसरा, छठवीं पीढ़ी का विमान तैयार करने का प्रोजेक्ट यूरोप के देशों के पास है। इसमें एक की अगुवाई फ्रांस कर रहा है, इस प्रोजेक्ट का नाम फ्यूचर कॉम्बैट एयर सिस्टम है (FCAS) है। इस प्रोजेक्ट में फ्रांस के अलावा जर्मनी और स्पेन हैं। तीसरा प्रोजेक्ट ब्रिटेन की अगुवाई में चल रहा है। ब्रिटेन के साथ इटली और जापान हैं। इनके इस प्रोजेक्ट का नाम GCAP है। पैसे और प्रोजेक्ट की टाइम लाइन को लेकर ब्रिटेन, इटली और जापान एक पेज पर हैं और इसमें वे आगे भी चल रहे हैं लेकिन फ्रांस की अगुवाई वाले FCAS प्रोजेक्ट में गतिरोध आ गया है और यह बहुत धीमी गति से आगे बढ़ रहा है।

छठी पीढ़ी के फाइटर जेट के लिए US की भारी फंडिंग

कुछ दिनों पहले ट्रंप प्रशासन में अपने वार्षिक रक्षा बजट में 40 प्रतिशत वृद्धि करने की बात कही। अगर कांग्रेस से इसकी मंजूरी मिल जाती है तो यह अमेरिका के रक्षा बजट में अब तक की यह सबसे बड़ी बढ़ोतरी होगी। अमेरिका का वार्षिक रक्षा बजट अभी करीब 900 अरब डॉलर की है, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इसे बढ़ाकर 1.5 खरब डॉलर करना चाहते हैं। खास बात यह है कि इस राशि का एक बड़ा हिस्सा छठवीं पीढ़ी के फाइटर प्लेन विकसित करने पर होगा। छठवीं पीढ़ी के विमान को लेकर अमेरिका आक्रामक तरीके से आगे बढ़ना चहता है। इस रक्षा बजट से F-47 के तेजी से विकास एवं उत्पादन पर जोर दिया जाएगा। रिपोर्टों में दस्तावेजों के हवाले से कहा गया है कि 2026 के रक्षा बजट में F-47 के लिए 2.5 अरब डॉलर की राशि मिली और इसके अलावा अतिरिक्त 900 मिलियन डॉलर भी उसे मिला। इस तरह से F-47 के लिए कुल करीब 3.5 अरब डॉलर की राशि आवंटित हुई।

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ड्रोन के साथ मिशन पर जाएगा यह लड़ाकू विमान

रक्षा बजट में इस वृद्धि को यदि मंजूरी मिल गई तो इस फाइटर जेट का निर्माण बोइंग करेगी और इस वित्तीय वर्ष के अंत तक उसे लगभग 8.5 अरब डॉलर की राशि मिल जाएगी। छठवीं पीढ़ी के विमान के निर्माण में फंड की अगर बात करें तो यूएस अन्य देशों से काफी आगे चल रहा है। अपने इस छठवीं पीढ़ी के फाइटर जेट की मार्केटिंग भी यूएस अभी से कर रहा है। यूएस ने बताया है कि उसका यह फाइटर जेट दुनिया का पहला ऐसा पायलट युक्त विमान होगा जो ड्रोन के साथ मिलकर अभियान चलाएगा और आधुनिक AI का इस्तेमाल करेगा। फाइटर प्लेन के कॉकपिट में बैठा पायलट मिशन के दौरान अपने साथ उड़ रहे ड्रोन को नियंत्रित करने के साथ-साथ इनका इस्तेमाल इंटेलिजेंस जुटाने, निगरानी करने, रिकॉनसा ऑपरेशन, दुश्मन के एयर डिफेंस को नष्ट करने, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर में कर सकेगा। यही नहीं, इस फाइटर जेट का तकनीक के स्तर पर ड्रोन के साथ इतना अधिक तालमेल होगा कि पायलट दुश्मन पर हमला करने के लिए उन्हें काफी दूर से कमांड दे सकेगा।

कॉम्बैट रेडियस 1,200 से ज्यादा नॉटिकल मील

छठवीं पीढ़ी का यह विमान स्टील्थ++ फीचर से लैस होगा। इसकी रफ्तार मैक (MACH) 2 यानी F-35, F-22 से दोगुनी होगी। रेंज में यह सुधार इस फाइटर प्लेन को बिना री-फ्यूलिंग कराए काफी दूरी तक उड़ान भरने में सक्षम बनाएगा। अभी की अगर बात करें तो F-35 का कॉम्बैट रेडियस 560-670 नॉटिकल मील की है, यह भी F-35A/C वैरिएंट पर निर्भर करता है। जबकि F-47 का कॉम्बैट रेडियस 1,200 से ज्यादा नॉटिकल मील रखा गया है। ईरान में एक F-35 के गिरने के बाद यूएस और शिद्दत से इस छठवीं पीढ़ी के विमान को विकसित करना चाहता है। बताया जा रहा है कि F-47 में नेक्स्ट जेनरेशन का XA-103 इंजन लगेगा जो कि इसे सुपीरियर थर्मल मैनेजमेंट देगा और दुश्मन की मिसाइलों से बचाएगा। अमेरिका की यह कोशिश है कि प्रशांत क्षेत्र में किसी तरह का टकराव या संघर्ष शुरू होने से पहले यह फाइटर प्लेन उसकी वायु सेना के बेड़े में शामिल हो जाए।

यूके, इटली-जापान के GCAP में भी आई तेजी

यूएस की तरह तो नहीं, लेकिन यूके, इटली-जापान के प्रोजेक्ट ग्लोबल कॉम्बैट एयर प्रोग्राम (GCAP) ने भी रफ्तार पकड़ी है। GCAP एजेंसी ने 686 मिलियन पाउंड (908 मिलियन डॉलर) का ठेका ब्रिटेन, इटली एवं जापान तीन देशों द्वारा गठित उपक्रम एजविंग को दिया है। डील के तहत जारी यह फंड छठवीं पीढ़ी के विमान की डिजाइनिंग एवं इंजीनियरिंग पर खर्च होगा। यह डील इस प्रोजेक्ट में त्रिपक्षीय भागीदारी को तेजी से आगे बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करता है। बताते चलें कि छठवीं पीढ़ी का GCAP फाइटर जेट विकसित करने के लिए यूके के BAE सिस्टम्स, इटली के लियानार्डो एवं जापान एयरक्राफ्ट इंडस्ट्रियल इन्हांसमेंट ने जून 2025 में एजविंग की स्थापना की।

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इस फाइटर प्लेन की डिजाइनिंग से लेकर इसे विकसित करने का पूरा दारोमदार इसी कंपनी पर है। उम्मीद है कि यह फाइटर जेट 2035 तक बनकर तैयार हो जाएगा। इस फाइटर प्लेन में कटिंग एज टेक्नॉलजी लगी होगी और संकट के समय यह विमान सभी सहयोगी देशों के काम आएगा। इस फाइटर जेट में रडार, मिसाइलें, बॉम्ब एवं अन्य सिस्टम प्रोजेक्ट के साझीदार देशों के लगेंगे। छठवीं पीढ़ी का यह फाइटर प्लेन जब बनकर तैयार हो जाएगा तो यह यूरोफाइटर टाइफून एवं मित्सुबिशी F-2 की जगह लेगा। खास बात यह है कि कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, स्वीडन, पोलैंड, भारत और जर्मनी ने भी इस प्रोजेक्ट का हिस्सा बनने की दिलचस्पी दिखाई है।

डिजाइन को लेकर फ्रांस-जर्मनी में गतिरोध

तो वहीं फ्रांस, जर्मनी एवं स्पेन का FCAS के शुरू होने में गतिरोध बना हुआ है। रिपोर्टों के मुताबिक इस फाइटर जेट का निर्माण शुरू करने में सबसे बड़ी अड़चन औद्योगिक प्रतिस्पर्धा, प्रोजेक्ट में हिस्सेदारी और इसके डिजाइन को लेकर आई है। इस बनाने को लेकर फ्रांस के डसाल्ट एविएशन और एयरबस में खींचतान है। हिस्सेदारी में गतिरोध होने के अलावा इसके डिजाइनिंग को लेकर भी मतभेद हैं। फ्रांस चाहता है कि छठवीं पीढ़ी के इस फाइटर प्लेन की डिजाइनिंग ऐसी हो कि जो एयरक्राफ्ट करियर से उड़ान भर सके और परमाणु हथियारों को लेकर जा सके। चूंकि जर्मनी के पास कोई एयरक्राफ्ट करियर युद्धपोत नहीं है, ऐसे में इस तरह के एयरक्राफ्ट की डिजाइनिंग में उसकी दिलचस्पी नहीं है। पिछले साल फ्रांस ने कहा कि वह इस प्रोजेक्ट के निर्माण में 80 फीसदी हिस्सेदारी चाहता है, यह बात भी जर्मनी को पसंद नहीं आई। इसके अलावा इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स को लेकर भी फ्रांस और जर्मनी के बीच बात बन नहीं पाई है।

ठंडे बस्ते में जा सकता है FCAS प्रोजेक्ट

इस प्रोजेक्ट की अनुमानित लागत करीब 100 अरब यूरो (116.85 अरब डॉलर) बताई गई है। कुछ दिनों पहले डसाल्ट एविएशन के सीईओ एरिक ट्रैपियर ने कहा कि इस बात कि संभावना बहुत कम है कि FCAS पर कोई सहमति बन पाएगी। एरिक ने कहा कि वह इस प्रोजेक्ट को संयुक्त रूप में आगे बढ़ाने के पक्ष में नहीं हैं। वह चाहते हैं कि इसे कोई एक देश ही बनाए। एरिक ने यह भी कहा कि लड़ाकू विमान विकसित करने की योग्यता, अनुभव एवं महारत फ्रांस के पास है न कि जर्मनी के पास। उन्हें कहा कि फ्रांस को पता है कि अकेले फाइटर प्लेन कैसे तैयार किया जा सकता है। यूरोफाइटर का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि इसे चार देशों ने मिलकर तैयार किया और इनमें से तीन देशों ने अमेरिका से F-35 खरीद लिए। उन्होंने कहा कि यह जरूरी नहीं कि संयुक्त उपक्रम हमेशा सफल हो। FCAS में जिस तरह से अवरोध सामने आ रहा है, उसे देखते हुए जर्मनी GCAP में शामिल हो जाए तो हैरानी नहीं होगी।

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