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जब समंदर में जलने लगे थे 'तेल के जहाज', दुनिया भर में मचा हाहाकार...! क्या था 1980 का भयावह 'Tanker War'

What Was Tanker War: जब ईरान और इराक के बीच 1980 में युद्ध शुरू हुआ, तो शुरुआती सालों में यह जमीन पर लड़ा गया, पर फिर परिस्थितियां ऐसी बनीं कि 'टैंकर वार' की नौबत आ गई, क्या है यह मामला...

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क्या था 1980 का भयावह 'Tanker War'
Authored by: Ravi Vaish
Updated Apr 15, 2026, 11:57 IST

What Was Tanker War 1980: 'टैंकर वार' (Tanker War) जो 1980 के दशक में हुआ उसे आधुनिक समुद्री इतिहास का सबसे लंबा और विनाशकारी संघर्ष माना जाता है। यह असल में ईरान-इराक युद्ध ( Iran-Iraq War) का एक हिस्सा था, जिसने पूरी दुनिया की तेल आपूर्ति (Oil Supply) को संकट में डाल दिया था। यह संघर्ष मुख्य रूप से समुद्र में लड़ा गया, न कि जमीन पर टैंकों के माध्यम से इसलिए इसका नाम 'टैंकर युद्ध' तेल टैंकरों को निशाना बनाने के कारण लिया जाता है।

टैंकर वार की आग पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और पर्यावरण तक पहुंची। यह युद्ध के इतिहास में व्यावसायिक जहाजों पर किया गया सबसे बड़ा संगठित हमला था।

जान लें आखिर क्या था टैंकर वार? (What Was Tanker War)

1980 के दशक में हुआ 'टैंकर वार' (Tanker War) आधुनिक समुद्री इतिहास का सबसे लंबा और विनाशकारी संघर्ष माना जाता है। यह असल में ईरान-इराक युद्ध (iran iraq tanker war history) का एक हिस्सा था, जिसने पूरी दुनिया की तेल आपूर्ति को संकट में डाल दिया था। साल1980 में जब ईरान और इराक के बीच युद्ध शुरू हुआ, तो शुरुआती सालों में यह जमीन पर लड़ा गया। लेकिन 1984 आते-आते इराक ने महसूस किया कि वह ईरान को जमीन पर नहीं हरा पा रहा है। इराक ने ईरान की आर्थिक कमर तोड़ने के लिए उसके तेल टैंकरों पर हमला करना शुरू कर दिया। जवाब में ईरान ने भी खाड़ी देशों से गुजरने वाले टैंकरों को निशाना बनाया। इसे ही 'टैंकर वार' (Tanker War) कहा जाता है।

क्या था इस 'टैंकर वार' का घटनाकम- (Tanker War Timeline)-

ईरान-इराक युद्ध 1980 में शुरू हुआ

जब 1980 में ईरान-इराक युद्ध शुरू हुआ, तो शुरुआती सालों में लड़ाई जमीन और आसमान तक सीमित थी। लेकिन 1984 तक इराक के राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन को लगा कि जमीन पर वह ईरान को पूरी तरह नहीं हरा पा रहे हैं। तब इराक ने आर्थिक युद्ध (Economic Warfare) की रणनीति अपनाई। उन्होंने ईरान के मुख्य तेल टर्मिनल 'खर्ग द्वीप' (Kharg Island) और वहां से तेल लेकर निकलने वाले जहाजों पर हवाई हमले शुरू कर दिए। इराक का मकसद ईरान की कमाई के सबसे बड़े स्रोत (तेल) को खत्म करना था।

क्या था इस 'टैंकर वार' का घटनाकम

क्या था इस 'टैंकर वार' का घटनाकम

ईरान ने Strait of Hormuz में समुद्री बारूदी सुरंगें बिछा दीं

ईरान ने इस हमले का जवाब बहुत ही आक्रामक तरीके से दिया। उन्होंने चेतावनी दी-'अगर ईरान तेल नहीं बेच पाएगा, तो खाड़ी का कोई भी देश तेल नहीं बेच पाएगा।' ईरान ने उन देशों जैसे- कुवैत और सऊदी अरब के टैंकरों को निशाना बनाना शुरू किया जो इराक का समर्थन कर रहे थे। ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) में समुद्री बारूदी सुरंगें (Mines) बिछा दीं और अपनी छोटी लेकिन तेज रफ्तार नौकाओं से जहाजों पर हमले किए।

Strait of Hormuz बना 'मौत का जाल'

ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में बारूदी सुरंगें (Mines) बिछा दीं और छोटी तेज रफ्तार नावों से जहाजों पर रॉकेट दागने शुरू कर दिए। 1984 से 1988 के बीच करीब 546 व्यावसायिक जहाजों को निशाना बनाया गया और सैकड़ों नाविक मारे गए।

अमेरिका की एंट्री; 'ऑपरेशन अर्नेस्ट विल' ( US Operation Earnest Will)

जब कुवैत के टैंकरों पर हमले बढ़े, तो उसने अमेरिका (US) से मदद मांगी। अमेरिका ने अपने युद्धपोतों को इन टैंकरों की सुरक्षा में लगा दिया। यह द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिकी नौसेना का सबसे बड़ा सुरक्षा अभियान था। इसी दौरान अमेरिका और ईरान की नौसेना के बीच सीधी भिड़ंत भी हुई थी। 'ऑपरेशन अर्नेस्ट विल' (Operation Earnest Will) ईरान-इराक युद्ध के 'टैंकर युद्ध' वाले चरण के दौरान अमेरिका का एक नौसैनिक अभियान था। इसकी शुरुआत जुलाई 1987 में मुख्य रूप से कुवैत के उन तेल टैंकरों को सुरक्षा देने यानी एस्कॉर्ट करने के लिए की गई थी, जिन्हें नया झंडा दिया गया था; यह द्वितीय विश्व युद्ध के बाद का सबसे बड़ा नौसैनिक काफिला अभियान था। यह अभियान बारूदी सुरंगों वाले युद्ध (Mine Warfare) के लिए तैयार नहीं था, जो इस मिशन के सामने आने वाली मुख्य बाधाओं में से एक बन गया।

'टैंकर वार' ने उस दौर में लिख दिया नुकसान का बड़ा अध्याय

1980 के दशक के 'टैंकर वार' ने न केवल युद्ध लड़ रहे देशों को, बल्कि पूरी दुनिया को एक बड़े संकट में डाल दिया था। यह इतिहास में व्यावसायिक जहाजों (Commercial Ships) पर किए गए सबसे बड़े हमलों में से एक था।

व्यावसायिक जहाजों की भारी तबाही

यह इस युद्ध का सबसे प्रत्यक्ष और डरावना असर था। 1984 से 1988 के बीच लगभग 540 से अधिक कमर्शियल जहाजों को मिसाइलों, रॉकेटों और समुद्री सुरंगों (Mines) से निशाना बनाया गया। इनमें कई दुनिया के सबसे बड़े कच्चे तेल के टैंकर थे। कई जहाज पूरी तरह डूब गए और कई इतने खराब हो गए कि उन्हें दोबारा कभी इस्तेमाल नहीं किया जा सका।

जानमाल की बड़ी क्षति

इस समुद्री संघर्ष में एक अनुमान के मुताबिक 430 से कहीं अधिक बेगुनाह नाविक और चालक दल के सदस्य मारे गए।

'हवाई त्रासदी' ना भूलने वाली बड़ी घटना

इसी तनाव के चरम पर 1988 में एक अमेरिकी युद्धपोत ने गलती से ईरान के एक नागरिक विमान (Iran Air Flight 655) को मार गिराया था, जिसमें 290 लोग मारे गए थे।

पेट्रोल-डीजल का संकट; हिल गई थी ग्लोबल इकॉनामी

यह जंग दुनिया की 'तेल की नस' यानी होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में लड़ी जा रही थी, इसलिए इसका असर हर देश की जेब पर पड़ा।तेल की सप्लाई बाधित होने के डर से वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल आया।खाड़ी क्षेत्र से गुजरने वाले जहाजों का बीमा (Insurance) इतना महंगा हो गया कि शिपिंग कंपनियों के लिए व्यापार करना भारी हो गया था। वहीं दुनिया के कई हिस्सों में तेल की कमी महसूस की जाने लगी, जिससे बेतहाशा महंगाई बढ़ गई।

हजारों मछलियां और समुद्री पक्षी मारे गए

हजारों मछलियां और समुद्री पक्षी मारे गए

हजारों मछलियां और समुद्री पक्षी मारे गए (Eco-Disaster)

मिसाइल हमलों की वजह से जब विशालकाय टैंकर फटते थे, तो लाखों गैलन कच्चा तेल समंदर में फैल जाता था। फारस की खाड़ी का पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) बुरी तरह तबाह हो गया। तेल की मोटी परत की वजह से हजारों मछलियां और समुद्री पक्षी मारे गए, जिसका असर दशकों तक रहा।

आखिर 1988 को दोनों देश युद्धविराम पर हुए सहमत

जंग की यह विभीषिका लंबे समय तक जारी रही फिर जुलाई 1987 में प्रस्ताव 598 पारित किया गया, जिसमें तुरंत युद्धविराम (Ceasefire) की मांग की गई थी। पर शुरुआत में ईरान ने इसे मानने से इनकार कर दिया था, लेकिन युद्ध की बढ़ती तबाही और आर्थिक दबाव के कारण अंततः 20 अगस्त 1988 को दोनों देश युद्धविराम पर सहमत हो गए।

टैंकर वार (Tanker War) ने दुनिया को यह सिखाया कि होर्मुज स्ट्रेट (Strait of Hormuz) जैसे संकरे रास्ते कितने महत्वपूर्ण हैं। आज भी अगर वहां तनाव बढ़ता है, तो दुनिया को यही डर सताता है कि कहीं इतिहास खुद को दोहरा न दे और यही हालात अब वर्तमान में ईरान-अमेरिका के बीच जारी जंग में नजर आ रहे हैं।

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