धार्मिक अल्पसंख्यकों का उत्पीड़न पाकिस्तान सरकार की नीति का हिस्सा, सिंधी अमेरिकी कार्यकर्ता का खुलासा

दुनिया
Updated Oct 23, 2019 | 08:45 IST | टाइम्स नाउ डिजिटल

religious persecution in america: सिंधी-अमेरिकी मानवाधिकार कार्यकर्ता फातिमा गुल का कहना है कि पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों का उत्पीड़न सरकार की नीति का हिस्सा है।

fatima gul
धार्मिक अल्पसंख्यकों का पाकिस्तान में होता है उत्पीड़न 

मुख्य बातें

  • सिंधी-अमेरिकी कार्यकर्ता फातिमा गुल का पाकिस्तान के बारे में खुलासा
  • 'धार्मिक अल्पसंख्यकों का उत्पीड़न पाकिस्तान सरकार की नीति का हिस्सा'
  • 'पाकिस्तान में बच्चों के खिलाफ यौन हिंसा के मामलों में करीब 33 फीसद की बढ़ोतरी'

वॉशिंगटन। पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के खिलाफ अत्याचार के मामले सामने आते रहते हैं। इस संबंध में इमरान खान की पार्टी के विधायक ने आवाज उठाई थी। इसके साथ ही दो हिंदू लड़कियों के धर्म परिवर्तन का भी मामला सामने आया था। अब इस विषय पर सिंधी अमेरिकी कार्यकर्ता फातिमा गुल ने पाकिस्तान सरकार पर निशाना साधा है। उन्होंने कहा कि अल्पसंख्यकों का उत्पीड़न पाकिस्तान सरकार के साइलेंट फीचर में से एक है।

फातिमा गुल ने कहा कि हिंदू, ईसाई, अहमदी, शिया और बलूचियों को लगातार निशाना बनाया जा रहा है और ये सब कुछ पाकिस्तान सरकार के इशारे पर हो रहा है। पाकिस्तान, दुनिया का एकलौता मुल्क है जहां पर अपने ही नागरिकों को प्रताड़ित करने का विधान बना हुआ है। गुल ने अमेरिका के हाउस पैनल के सामने इन बातों को रखा। 

महिलाओं के खिलाफ हिंसा के मामले में दुनिया में पाकिस्तान का 6 खतरनाक देशों में शुमार है। ह्यूमन राइट्स वाच की रिपोर्ट के मुताबिक बच्चों के साथ यौन हिंसा के मामलों में इजाफा हुआ है। पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में अकेले 141 केस दर्ज किए गए हैं। 2018 की पहली छमाही में एक हजार से ज्यादा हिंदू लड़कियों का अपहरण कर उन्हें इस्लाम धर्म में शामिल किया गया। पाकिस्तान में बच्चों के खिलाफ हिंसा के मामले में करीब 33 फीसद की बढ़ोतरी हुई है। 

फातिमा गुल ने कहा कि अगर आप इसी वर्ष 15 सितंबर की घटना को याद करें तो पाएंगे कि किस तरह से सिंध के घोटकी कस्बे में हिंदुओं के मंदिर, घरों और स्कूलों पर हमले किए गए। भीड़ ने हिंदू प्रोफेसर नोटन लाल के इशनिंदा का हवाला देते हुए घरों और मंदिरों को तबाह कर दिया। सबसे बड़ी बात है कि साक्ष्यों की कमी के बाद भी प्रोफेसर को हिरासत में रखा गया। 

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