Jan 02, 2026
पुराने समय में सोना, चांदी और कीमती रत्नों को तौलने के लिए रत्ती का इस्तेमाल होता था। “एक रत्ती, दो रत्ती” जैसे शब्दों से सोने और गहनों की कीमत तय की जाती थी।
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रत्ती असल में जंगलों में पाई जाने वाली एक खास फली के बीज थे। यह बीज लाल, काले और कभी-कभी सफेद रंग के होते हैं।
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रत्ती का मतलब बहुत छोटा या थोड़ी मात्रा होता है। यह मुहावरे जैसे “रत्ती भर भी लाज नहीं” या “रत्ती भर प्यार नहीं” में आज भी इस्तेमाल होता है।
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रत्ती के दानों का वजन लगभग बराबर होता था। इसी वजह से इन्हें प्राकृतिक तराजू की तरह उपयोग किया जाता था।
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रत्ती ने सिर्फ बीज होने के साथ-साथ तौलने की इकाई का रूप भी ले लिया। इस प्राकृतिक माप से कीमती धातुओं और रत्नों की खरीद-फरोख्त होती थी।
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रत्ती केवल माप नहीं, बल्कि भाषा और संस्कृति का हिस्सा भी बन गई। मुहावरों और आम बोलचाल में इसका इस्तेमाल होता रहा।
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छत्तीसगढ़ जैसे इलाकों के जंगलों में आज भी लाल, काली और सफेद रत्ती मिलती है। स्थानीय आदिवासी समुदाय इन्हें आभूषण बनाने और शादी जैसी परंपराओं में इस्तेमाल करते हैं।
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अलग-अलग जगह रत्ती को अलग नामों से जाना जाता है, जैसे कनकन, गुंजा, गेमची या बेमची।
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आधुनिक मानक के अनुसार, 1 रत्ती = 0.12125 ग्राम। इसे ग्राम में बदलकर कीमत तय की जाती है।
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आज भी कई जौहरी रत्ती के हिसाब से गहनों और रत्नों का वजन बताते हैं। यह आज भी ट्रेड और पारंपरिक गणना में प्रचलन में है।
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