Jan 24, 2026

वतन पर शायरी:वतन की रेत जरा एड़ियां रगड़ने दे, मुझे यकीं है कि पानी यहीं से निकलेगा

Suneet Singh

​रौशनी बांटता हूं सरहदों के पार भी मैं, हम-वतन इस लिए ग़द्दार समझते हैं मुझे​

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​पहलू में मेरे दिल को न ऐ दर्द कर तलाश, मुद्दत हुई ग़रीब वतन से निकल गया​

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​दिलों में हुब्ब-ए-वतन है अगर तो एक रहो, निखारना ये चमन है अगर तो एक रहो​

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​ग़ुर्बत की ठंडी छांव में याद आई उस की धूप, क़द्र-ए-वतन हुई हमें तर्क-ए-वतन के बाद​

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​कहां हैं आज वो शम-ए-वतन के परवाने, बने हैं आज हक़ीक़त उन्हीं के अफ़्साने​

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​दिल से निकलेगी न मर कर भी वतन की उल्फ़त, मेरी मिट्टी से भी ख़ुशबू-ए-वफ़ा आएगी​

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​लहू वतन के शहीदों का रंग लाया है, उछल रहा है ज़माने में नाम-ए-आज़ादी​

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​वतन की फ़िक्र कर नादां मुसीबत आने वाली है, तिरी बर्बादियों के मशवरे हैं आसमानों में​

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