Nov 22, 2025
वसीम बरेलवी के 10 शेर: आते आते मिरा नाम सा रह गया, उस के होठों पे कुछ कांपता रह गया
Suneet Singh
हर शख़्स दौड़ता है यहां भीड़ की तरफ़, फिर ये भी चाहता है उसे रास्ता मिले
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उसी को जीने का हक़ है जो इस ज़माने में, इधर का लगता रहे और उधर का हो जाए
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मैं बोलता गया हूं वो सुनता रहा ख़ामोश, ऐसे भी मेरी हार हुई है कभी कभी
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हमारे घर का पता पूछने से क्या हासिल, उदासियों की कोई शहरियत नहीं होती
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मैं ने चाहा है तुझे आम से इंसां की तरह, तू मिरा ख़्वाब नहीं है जो बिखर जाएगा
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झूट वाले कहीं से कहीं बढ़ गए, और मैं था कि सच बोलता रह गया
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वो मेरे घर नहीं आता मैं उस के घर नहीं जाता, मगर इन एहतियातों से तअल्लुक़ मर नहीं जाता
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शराफ़तों की यहां कोई अहमियत ही नहीं, किसी का कुछ न बिगाड़ो तो कौन डरता है
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जो मुझ में तुझ में चला आ रहा है बरसों से, कहीं हयात इसी फ़ासले का नाम न हो
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