May 23, 2026

पसीने पर शायरी: पसीने बांटता फिरता है हर तरफ सूरज, कभी जो हाथ लगा तो निचोड़ दूंगा उसे

Suneet Singh

​ये पसीना वही आंसू हैं जो पी जाते थे हम, 'आरज़ू' लो वो खुला भेद वो टूटा पानी​

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​न मैं समझा न आप आए कहीं से, पसीना पोछिए अपनी जबीं से​

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​आंखों का अर्क़ रौगन-ए-बादाम से बेहतर, आरिज़ का पसीना है गुलाब-ए-गुल-ए-अहमर​

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​हो गया मिट्टी अगर मेरा पसीना सूख कर, देखना मेरे दरख़्तों पर समर आ जाएगा​

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​मिला दिया है पसीना भले ही मिट्टी में, हम अपनी आंख का पानी बचा के रखते हैं​

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​अब इत्र भी मलो तो तकल्लुफ़ की बू कहां, वो दिन हवा हुए जो पसीना गुलाब था​

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​माथे पे पसीना क्यूं आंखों में नमी कैसी, कुछ ख़ैर तो ही तुम ने क्या हाल-ए-जिगर देखा​

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​वो जीवन आज की रात आ के बरसाती है दीवाली, पसीना मौत के माथे पे छलकाती है दीवाली​

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​आंखों का अर्क़ रौगन-ए-बादाम से बेहतर, आरिज़ का पसीना है गुलाब-ए-गुल-ए-अहमर​

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