Apr 14, 2025

जब कोई रास्ता ना दिखे तो याद कर लें संस्कृत का ये श्लोक, हो जाएंगे सफल

Ritu raj

​उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगा:।​

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​“योगस्थः कुरु कर्माणि संगं त्यक्त्वा धनंजय ।​

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​सिद्धयसिद्धयोः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥”​

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​“उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।​

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​क्षुरासन्नधारा निशिता दुरत्यद्दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति॥​

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​ऐश्वर्ये वा सुविस्तीर्णे व्यसने वा सुदारुणे।रज्जवेव पुरुषं बद्ध्वा कृतान्तः परिकर्षति॥​

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​कण्ठे मदः कोद्रवजः हृदि ताम्बूलजो मदः।लक्ष्मी मदस्तु सर्वाङ्गे पुत्रदारा मुखेष्वपि॥​

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​जीवितं क्षणविनाशिशाश्वतं किमपि नात्र।​

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​जीविताशा बलवती धनाशा दुर्बला मम्।।​

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