Apr 15, 2025
मिर्जा गालिब के 10 मशहूर शेर: दर्द मिन्नत-कश-ए-दवा न हुआ, मैं न अच्छा हुआ बुरा न हुआ
Suneet Singh
कहां मयख़ाने का दरवाज़ा ग़ालिब और कहां वाइज़, पर इतना जानते हैं कल वो जाता था कि हम निकले
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बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मिरे आगे, होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मिरे आगे..
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बस-कि दुश्वार है हर काम का आसां होना, आदमी को भी मुयस्सर नहीं इंसा होना
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क़र्ज़ की पीते थे मय लेकिन समझते थे कि हां, रंग लावेगी हमारी फ़ाक़ा-मस्ती एक दिन
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इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना, दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना
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कोई मेरे दिल से पूछे तिरे तीर-ए-नीम-कश को, ये ख़लिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता
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काबा किस मुँह से जाओगे 'ग़ालिब', शर्म तुम को मगर नहीं आती
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ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता, अगर और जीते रहते यही इंतिज़ार होता
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