Jun 08, 2025

मजरूह सुल्तानपुरी के 10 मशहूर शेर: जो घर को आग लगाए हमारे साथ चले..

Suneet Singh

​फ़रेब-ए-साक़ी-ए-महफ़िल न पूछिए 'मजरूह', शराब एक है बदले हुए हैं पैमाने​

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​बढ़ाई मय जो मोहब्बत से आज साक़ी ने, ये कांपे हाथ कि साग़र भी हम उठा न सके​

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​अब कारगह-ए-दहर में लगता है बहुत दिल, ऐ दोस्त कहीं ये भी तिरा ग़म तो नहीं है​

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​मैं कि एक मेहनत-कश मैं कि तीरगी-दुश्मन, सुब्ह-ए-नौ इबारत है मेरे मुस्कुराने से​

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​गुलों से भी न हुआ जो मिरा पता देते, सबा उड़ाती फिरी ख़ाक आशियाने की​

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​फिर आई फ़स्ल कि मानिंद बर्ग-ए-आवारा, हमारे नाम गुलों के मुरासलात चले​

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​अश्कों में रंग-ओ-बू-ए-चमन दूर तक मिले, जिस दम असीर हो के चले गुल्सितां से हम​

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​बहाने और भी होते जो ज़िंदगी के लिए, हम एक बार तिरी आरज़ू भी खो देते​

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​जला के मिशअल-ए-जां हम जुनूं-सिफ़ात चले, जो घर को आग लगाए हमारे साथ चले​

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