May 11, 2025

मजरूह सुल्तानपुरी के 10 शेर: कुछ बता तू ही नशेमन का पता, मैं तो ऐ बाद-ए-सबा भूल गया

Suneet Singh

​कोई हम-दम न रहा कोई सहारा न रहा, हम किसी के न रहे कोई हमारा न रहा​

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​ऐसे हंस हंस के न देखा करो सब की जानिब, लोग ऐसी ही अदाओं पे फ़िदा होते हैं​

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​बहाने और भी होते जो ज़िंदगी के लिए, हम एक बार तिरी आरज़ू भी खो देते​

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​तिरे सिवा भी कहीं थी पनाह भूल गए, निकल के हम तिरी महफ़िल से राह भूल गए​

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​'मजरूह' क़ाफ़िले की मिरे दास्तां ये है, रहबर ने मिल के लूट लिया राहज़न के साथ​

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​जफ़ा के ज़िक्र पे तुम क्यूं संभल के बैठ गए, तुम्हारी बात नहीं बात है ज़माने की​

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​अब सोचते हैं लाएंगे तुझ सा कहां से हम, उठने को उठ तो आए तिरे आस्तां से हम​

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