Jul 04, 2025

गुलज़ार के 10 मशहूर शेर: देर से गूंजते हैं सन्नाटे, जैसे हम को पुकारता है कोई

Suneet Singh

​रुके रुके से क़दम रुक के बार बार चले, क़रार दे के तिरे दर से बे-क़रार चले​

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​आंखों के पोछने से लगा आग का पता, यूं चेहरा फेर लेने से छुपता नहीं धुआं​

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​यादों की बौछारों से जब पलकें भीगने लगती हैं, सोंधी सोंधी लगती है तब माज़ी की रुस्वाई भी​

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​ये शुक्र है कि मिरे पास तेरा ग़म तो रहा, वर्ना ज़िंदगी भर को रुला दिया होता​

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​ख़ामोशी का हासिल भी इक लम्बी सी ख़ामोशी थी, उन की बात सुनी भी हम ने अपनी बात सुनाई भी​

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​यूं भी इक बार तो होता कि समुंदर बहता, कोई एहसास तो दरिया की अना का होता​

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​चूल्हे नहीं जलाए कि बस्ती ही जल गई, कुछ रोज़ हो गए हैं अब उठता नहीं धुआं​

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​एक सन्नाटा दबे-पांव गया हो जैसे, दिल से इक ख़ौफ़ सा गुज़रा है बिछड़ जाने का​

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​भरे हैं रात के रेज़े कुछ ऐसे आंखों में, उजाला हो तो हम आंखें झपकते रहते हैं​

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